शनिवार, 22 जनवरी 2011

संजय दानी की ग़ज़लें

तेरा मेरा ये जो रिश्ता है सनम,
बस इसी का नाम दुनिया है सनम।

इश्क़ की अपनी रिवायत होती है,
लैला मजनूं का ये तुहफ़ा है सनम।


ना करूंगा जग में ज़ाहिर तेरा नाम
,सच्चे आशिक़ का ये वादा है सनम।


हम हिफ़ाज़त ग़ैरों से कर लेंगे पर,
मुल्क को अपनों से ख़तरा है सनम।


बिकने को तैयार है हर इंसां आज,
कोई सस्ता कोई महंगा है सनम।


चांदनी फिर बादलों के साथ है,
चांद का दुख किसने समझा है सनम।


है चराग़ो के लिये मेरी दुआ,
आंधियों से कौन डरता है सनम।


दिल समन्दर की अदाओं का मुरीद,
बेरहम, साहिल का चेहरा है सनम।


इस जगह चोरी न करना इस जगह
,कोई अफ़सर कोई नेता है सनम।


मेरा पुस्तैनी मकां है उस तरफ़,
दिल लकीरों से न डरता है सनम।

दानी को  तुमने ख़ुदा माना है तो,
क्यूं ख़ुदा से अपने पर्दा है सनम।

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दिल रोया ना आंखें बरसीं,
तुम आये ना सांसें ठहरीं।

ख्वाबों पर भी तेरा बस है,
तनहाई में तू ही दिखती।

मिल जाये जो दीद तुम्हारी,
कल ईद हमारी भी मनती।

मजबूत सफ़ीना है तेरा,
जर्जर सी है मेरी कश्ती ।

मन्ज़ूर मुझे डूबना लेकिन,
दिल की नदियां है कहां गहरी।

सब्र चराग़ों सा रखता मैं,
ज़ुल्मी हवायें तुमसे डरतीं ।

अर्श सियासत की छोड़ न तू,
मर जायेगी जनता प्यासी ।

वादा तूने तोड़ा है पर,
तुहमत में है मेरी हस्ती ।

तेरा घर मेरा मंदिर है,
मेरी जान वहीं है अटकी।

रथ के दो पहिये हम दोनों,
दानी ही क्यूं आगे रहती।

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1 blogger-facebook:

  1. बिकने को तैयार है हर इंसां आज,
    कोई सस्ता कोई महंगा है सनम।


    Ye sher vishesh rup se achchha laga...

    उत्तर देंहटाएं

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