सोमवार, 24 जनवरी 2011

राजीव श्रीवास्तवा की कविता - क्यों इतना उदास है!

क्यों इतना उदास है!

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काले घने बादलों में भी चमकती एक आस है,

हर रात के बाद दिन आता है ये हमें विश्वास है,

सूखी हुई निर्जीव धरा पे भी निर्मल बूंदें बरसती है,

उजड़े वीराने चमन में भी मोहक कोयल चहकती है,

आज जिसे तू हार मान कर बैठा दुखी निराश है,

उसी हार में जीत छुपी है,फिर क्यों तू इतना उदास है!

 

मन के माने हार ,और मन के माने जीत है,

हार-जीत तो जीवन के अंग है,यही जग की रीत है,

मत बहा आंसू ,मत खुद को यू लाचार कर,

हारी बाजी जीत जाएगा बस खुद को तैयार कर,

जो आज तुझे हारा मान कर ,खुद पे इतराते हैं ,

वो ये शायद नहीं जानते की काले बादल ही बारिश लाते हैं!

 

तो चल जुटा ले सारी हिम्मत,एक बार फिर वार कर,

मंज़िल तुझको खुद तलाशेगी बस तोड़ा इंतजार कर,

आज तेरी परीक्षा की घड़ी है,आज तेरी आज़माइश है,

यही सोच कर आगे बढ़ की हर चीज़ मे गुंजाइश है,

प्रभु भी उसकी मदद करते जो ,करता सच्चा प्रयास है,

फिर तू क्यों दुखी बैठा है,और क्यों इतना उदास है!

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

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