शनिवार, 29 जनवरी 2011

गोविन्द शर्मा की बाल कहानी - गजराज सरजू

haathi

सुरगढ़ के राजा गजानंदसिंह के राज्‍य में घोड़ों से भी ज्‍यादा हाथी थे। वह वर्ष में एक बार हाथी मेला भी आयोजित करते थे। इस मेले में हाथियों की कई तरह की प्रतियोगिताएं होती थी। सर्वश्रेष्‍ठ रहने वाले हाथी को ‘गजराज' की उपाधि मिलती थी। गजराज बनने का मतलब होता था, हाथी के लिये वर्षभर के खाने का इंतजाम राजा की ओर से होता। हाथी के महावत को भी इनाम में नकद राशि मिलती थी।

इस बार के मेले में ‘सरजू' नाम के हाथी की धूम थी। यह पहली बार ही इस मेले में आया था। इसके महावत बिरजू ने हाथी को हृष्‍टपुष्‍ट बनाने और प्रशिक्षित करने में पूरे वर्ष मेहनत की थी। इसी का परिणाम था कि सरजू आखिरी परीक्षा के लिये चुने गये इन हाथियों में शामिल हो गया था। सभी को उम्‍मीद थी कि इस बार बिरजू का सरजू ही गजराज बनेगा।

आखिरी परीक्षा- दौड़ के लिये सभी हाथी एक कतार में खड़े थे। सभी को तोप के गोले की आवाज का इंतजार था। क्‍योंकि तोप चलने की आवाज के साथ ही हाथियों को दौड़ना शुरू करना था।

इस परीक्षा के समय स्‍वयं राजा गजानंद सिंह उपस्‍थित थे। राजा, रानी और राजकुमार एक ऊंचे मंच पर बैठे थे। उनसे थोड़ा नीचे एक और मंच बना था। उस पर राज्‍य के सामंत, सेठ और अधिकारी बैठे थे। उनसे नीचे दौड़ने के स्‍थान के दोनों तरफ बल्‍लियां लगाकर जन साधारण के खड़े होने की जगह बनाई हुई थी। हाथियों की यह दौड़ देखने बहुत लोग आये थे। सभी को गजराज को देखने की उत्‍सुकता थी। सबसे ज्‍यादा जोश में थे महावत। इन दस हाथियों के महावतों में हर कोई यही सोच रहा था कि उसका ही हाथी गजराज बनेगा। पर सभी आशंकित भी थे और जीत के लिये मन ही मन प्रार्थना भी कर रहे थे। बिरजू सोच रहा था- उसका सरजू गजराज बन गया तो खूब पैसे मिलेंगे। उनसे अपने टूटे घर की जगह नया घर बना लूंगा, अपने लिये एक खेत भी खरीद लूंगा।

तोप से गोला छूटा, महावतों ने इशारा किया और हाथी दौड़ने लगे। लोगों ने भी आवाजें करके और तालियां बजाकर हाथी दौड़ का स्‍वागत किया। देखते ही देखते सरजू सभी से आगे निकल गया। लोग ‘सरजू' ‘सरजू' चिल्‍लाने लगे। सरजू आम लोगों की भीड़ के पास से गुजर रहा था कि अचानक उसके कदम रूक गये। भीड़ में खड़े एक आदमी को उसने ध्‍यान से देखा। वह उसका महावत बिरजू नहीं था। फिर भी वह दौड़ को छोड़कर उसकी तरफ बढा। इतने में दूसरे हाथी आगे निकल गये। यह देखकर लोग हैरान रह गये। ‘अरे, यह क्‍या हुआ?' के अलावा उनके मुंह से कुछ नहीं निकल रहा था। बिरजू तो जैसे बेहोश हो गया था।

सरजू इस सबसे बेखबर उधर बढा, जिधर गांव के लोग खड़े थे। हालांकि दौड़ के रास्‍ते और उनके बीच लकड़ी की मजबूत बल्‍लियां थी, फिर भी कुछ लोग डर कर पीछे हट गये। सरजू सीधा वहां खड़े एक आदमी के पास गया। बल्‍ली के ऊपर से उसने अपने सूंड को बढा कर उस आदमी का सिर, कंधा और हाथ छूने लगा। ऐसा लगा, जैसे वह उसे दुलार रहा है, किसी बात के लिए उसे धन्‍यवाद दे रहा है। उस आदमी ने अपने हाथ से उसका सूंड सहलाया और थपकी दी।

इसके बाद सरजू फिर दौड़ने के स्‍थान पर आकर दौड़ने लगा। अब तक दूसरे हाथी काफी आगे निकल गये थे। बहुत पीछे दौड़ते सरजू पर अब लोग हंस रहे थे। यह सब नजारा राजा ने भी देखा। राजा गजानंद सिंह हैरान थे कि सबसे आगे सरजू था, फिर वह अचानक रूका क्‍यों? वह भीड़ में खड़े उस आदमी के पास क्‍यों गया?

दौड़ में प्रथम आये हाथी के लिए गजराज की घोषणा राजा के मुंह से सुनने की सभी प्रतीक्षा में थे। राजा ने इसकी घोषणा न करके अपने सैनिकों को भेजकर भीड़ में खड़े उस आदमी को बुलाया। उससे पूछा- तुम कौन हो? यह हाथी रूक कर तुम्‍हारे पास क्‍यों आया?

उसने कहा, “महाराज, पहले तो मैं खुद ही नहीं समझा कि यह हाथी मेरे पास क्‍यों आया है। क्‍योंकि मैं न तो इसका मालिक हूं और न महावत। मैं तो एक वैद्य हूं। गांव में रहता हूं। गरीबों और जानवरों का इलाज करता हूं। फिर मुझे याद आया। कई साल पहले जड़ी बूटियों की खोज में मैं एक जंगल में गया था। वहां एक गड्‌ढे में हाथी का एक बच्‍चा घायल पड़ा था। मैंने गड्‌ढे में उतर कर उसके घावों पर दवा लगाई थी। दो तीन दिन तक उसके घाव पर दवा लगाने से वह ठीक होने लगा था। उसके बाद मैं चला आया। हो न हो, वह बच्‍चा ही यह हाथी है। मैंने तो इसे नहीं पहचाना, लगता है इसने मुझे पहचान लिया और मुझे धन्‍यवाद देने आया था। मुझे खुशी के साथ अफसोस भी हो रहा है। मेरे कारण यह दौड़ से बाहर हो गया और गजराज कहलाने से रह गया।”

राजा ने पूछा, “तुम वैद्य हो तो वहां जनसाधारण में क्‍यों खड़े थे? मेरे राज्‍य के दूसरे वैद्य तो वहां मंच पर सामंतों- अधिकारियों के साथ बैठे हैं।”

“महाराज, मैं गांव के गरीबों का और जानवरों का इलाज करता हूं। अमीरों का इलाज करने वाले वैद्य हमें अपने से छोटा समझते हैं। हम उनके बराबर कैसे बैठ सकते हैं?”

यह सुनकर राजा को आश्‍चर्य हुआ। राजा ने कहा, “कम पैसे लेकर गांव वासियों और मूक पशुओं का इलाज करने वाला छोटा कैसे हुआ? यदि हमारी राजधानी के वैद्यों की यह सोच है तो बहुत गलत है। आज के बाद तुम लोग अपने को छोटा मत समझना। राजा का इलाज करने वाला राज वैद्य कहलाता है तो गांव में चिकित्‍सा करने वाला वैद्यराज कहलायेगा। जाओ, तुम उस मंच पर बैठो।”

राजा की यह घोषणा सुनकर राजवैद्य और नगर के दूसरे वैद्यों को अपनी सोच पर शर्म महसूस हुई। वे आगे आकर उस वैद्य को अपने साथ मंच पर लेकर गये। लोगों ने इस पर काफी देर तक राजा की जय के नारे लगाए।

राजा ने हाथियों की तरफ देखा और बोले- दौड़ में प्रथम आने वाला हाथी ही गजराज कहलाने का अधिकारी है। पर सरजू को भी हारा हुआ कैसे कहा जाये? भला करने वाले का अहसान मानना तो मानवीय गुण है। मनुष्‍यों में यह गुण कम होता जा रहा है। पर पशु कहलाने वाले हाथी में अभी यह गुण जिंदा है। उसने अहसान प्रकट करने के लिए जीतहार की परवाह भी नहीं की। इसलिए मैं इस बार दो हाथियों को गजराज की उपाधि देता हूं, एक सरजू को और एक प्रथम रहने वाले को.... इसके बाद तो लोगों ने इतने जोर से तालियां बजाई और नारे लगाए कि राजा के आगे की बात किसी को सुनाई ही नहीं दी।

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गोविन्‍द शर्मा

ग्रामोत्‍थान विद्यापीठ

संगरिया- 335 063 (राज.)

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  1. बहुत सार्थक और सही न्याय को दर्शाती सुन्दर बोध कथा। धन्यवाद।

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