सोमवार, 17 जनवरी 2011

रामरक्षा मिश्र विमल की कविता - सर्जना प्यार का मृगछौना है, पाल लो

सर्जना प्यार का मृगछौना है,पाल लो
*डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

pyar (Custom)

रात के अँधियारे में
सन्नाटा जब शोर करने लगता है
स्पंदन शून्यता की ओर बढ़ जाता है
तब अचानक प्रकट होती है सर्जना
और चुपके से कह जाती है कानों में कुछ
फिर तो वायरस से भरी जिंदगी
स्वतः फार्मेट हो जाती है
और फागुन व सावन के
क्लियर पिक्चर डिस्प्ले होने लगते हैं
पतझड़ और वसंत की संवेदना पर
कनखी से मुस्कराते नैन शरमा जाते हैं अब
और हम कंफिडेंस के साथ
कह सकने की स्थिति में होते हैं
कि यह आदमी है और यह मशीन |

जब सामने का हर आदमी अधूरा लगने लगता है
मन संकल्प ‐ विकल्पों में
उलझता खीझता रहता है
जीवन डोर पर से पकड़ ढीली पड़ने लगती है
तब नवीन चेतना से भर देती है सर्जना |

सर्जना समझाती है
फूलों की भाषा
समुद्र की हलचल
नदी की काँपती नाचती उछलती
और गिरती पड़ती लहरों की धुन
मधुलुब्ध भौंरों की गुन‐गुन
पहाड़ों का चिंतित मन
और बूढ़े बरगद का
शांत और गंभीर वदन |

सर्जना पतंग की डोर है , छोड़ो मत
सर्जना नसीब का आईना है , तोड़ो मत
सर्जना नाव की पतवार है , सँभाल लो
सर्जना प्यार का मृगछौना है , पाल लो |

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ram raksha vimal
संपर्क ‐
द्वारा‐बी.एन.विश्वास , 772 , घोषपाड़ा रोड , उत्तरायन , पो. बंगाल एनमेल
, जिला ‐ 24 परगना (नार्थ) प.बं. पिन ‐ 743122
            email : ramraksha.mishra@yahoo.com

2 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , इस रचना की ख़ूबसूरती भावपक्छ तो है ही उसमें अंग्रेजी के बोलचाल के शब्द चार चांद लगा रहे हैं, बधाई।

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