गुरुवार, 27 जनवरी 2011

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' के दोहे व कविताएँ

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दोहे

कैसे पग आगे धरे,लोकतंत्र का राज।

पग-पग पर बैठे मिले,शातिर सौदेबाज।।

 

दरकी गागर प्रेम की,सह घातों की मार।
रिश्तों की रिसती रही,बूँद-बूँद कर धार।।

 

खारा पानी क्या मिला,सरवर में इस बार।

वे भी पंछी उड़ ग ए, जो भी थे दो-चार।।

 

पेड़-पेड़ पर बहेलिए, डाल-डाल पर काग।

कोयल कैसे छेड़ती, अपने मन का राग।।

 

माली से इस बार भी, ऐसी हो गई चूक ।

कोयल की फिर से हुई बंद सुरीली कूक।।

 

किस चिड़िया के पर कटे, राही कौन उटंग।

दौड़ कुतूहल में पड़ी, भीड़ बजाती चंग।

 

कुछ की छूए आसमान तो, कुछ की डोरी तंग।

पेंच भिड़ाते हम रहे,लुटती रही पतंग।।

 

भीतर-बाहर इस तरह, भरी लालसा-रेत।

उर्वर से ऊसर हुए ,संबंधों के खेत।।

 

सुनना सबसे कठिन है, कहना है आसान।

कथा-पँवारा कह थका, कब कोई इंसान।।

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कविता

 

यह नपुंसक घालमेल है

अभी-अभी हमारी नींद पर से

गुज़र गई है

मालगाड़ी धड़धड़ाते हुए

और,

हम सुपरफास्ट में बैठे-बैठे

उबासी ले रहे हैं

उसके गुज़रने से

पूरे एक घंटे पहले से

खड़ी है

और,

बाद का पता नहीं कि-

कब तक विश्राम की अवस्था में रहे

जस की तस, ठस की ठस

 

हाँ,

बीच-बीच में गैस छोड़ कर

अपने ज़िंदा रहने का सबूत

ज़रूर दे देती है

तन-मन से जर्जर

बूढ़ों की तरह

ठंडी आह भर लेती है

 

ऐसे में,

ठहरी हुई ज़िंदगी से भी

सर्द लगती है

अपनी यह सवारी गाड़ी

वह भी सुपरफास्ट

या तो माल बहुत मँहगा हो गया है

या फिर,

इंसान इतना सस्ता

कि,

उसे जब चाहो,जहाँ चाहो

रोक लो,उतार दो, धकिया दो,

मौका लगे थपड़िया दो

 

कभी-कभी बिना बेल्ट,

बिल्ले और डंडे के भी

बंदूक तो बहुत बड़ी चीज़ होती है साहब

आम आदमी तो सींक से और कभी-कभी तो छींक से भी

काँप उठता है

शायद सब व्यवस्थापक

यह भाँप गये हैं कि-

इनमें से कोई उठापटक करेगा भी तो

अपनी ही बर्थ या सीट

या ठसाठस भरे

जनरल कोच की गैलरी से लेकर शौचालय तक

अपना ही साथ छोड़ रही

दाईं या बाईं टाँग पर

काँख-कूंख के खड़ा रहेगा

या लद्द से बैठ जाएगा

 

या फिर,

अपनी ही टाँगों की

अदला-बदली कर लेगा

या यह भी हो सकता है कि,

गंदे रूमाल से नाक साँद

साँस लेने के बहाने

उतर कर बैठ जाए

बगल वाली पटरी पर

बीड़ी सुलगाए, पुड़िया फ़ाड़

मसाला फ़ाँके, तंबाकू पीटे

सिग्नल झाँके

नजर की कमजोरी के कारण

तड़ाक से उठे

फिर सट्ट से बैठ जाए

 

यों ही हजारों हजार कान

तरसतें रहें हार्न को

पर, गर्द-गुबार भरे

दो-चार कानों पर

नही रेंगती जूँ तो नही ही रेंगती

पहले भी

इसी तरह चलती रही है

हमारी व्यवस्था की बैलगाड़ी

अपने टूटे-फ़ूटे पहियों की

कर्ण कटु खटखट के साथ

 

लेकिन लोग,

फिर भी नही पालते झंझट

नहीं उलझते अपने शुकून से

व्यवस्था भी नहीं चाहती

उलझना किसी से

या छीनना शुकून किसी का

 

वह, यह भली भाँति जानती है कि

क्या दे पाएगा रेलवे को

यह नंगा, दुलंगा, दुटंगा आदमी

दो रुपए किराया बढेगा

तो दो महीने चिल्लाएगा

और,

समय मूँगफ़ली-सा फ़ूटकर

बोलते-बतियाते

चुक जाएगा

 

सो, रोक लेते हैं

यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ

बन जाएगा

ड्राइवर और गार्ड का ओवर टाइम

और,

आम आदमी के पास

वैसी ही है इफ़रात टाइम

वह करेगा भी क्या

उसको बचाके

लकड़ियाँ तो बची नहीं है

जो घर जाके अलाव तापेगा

बैठा रहे शुकून से

ऊपर छत है नीचे फ़र्श

दिल्ली में जाने कितने

रैन बसेरे ढह गए

उससे तो अच्छा ही है

बैठे रहना किसी ट्रेन में

 

पुरसुकूँ,

बदनों के ताप से

तापते रहें परस्पर अलाव

सेंकते रहें

दिनोंदिन ठंडे पड़ते जा रहे

देह के साथ-साथ

सोच,चिंतन, मनन, मन

पानी रहित बेसिन,

फ्लश रहित शौचालय

गनीमत है कि,

नीचे वाला पाइप नहीं टूटा

वरना,

पंद्रह रुपए का रेलनीर

बहाना पड़ता मुफ़्त में

शर्म के मारे स्वाति की बूँद-सा

टपक भी जाता है बीच-खूच

उससे एकाध बूंद पानी

 

और,

धोखा भी दे देता है

ऐनवक्त पर कभी-कभी

अपनी लोकप्रिय सरकारों की तरह

फिर भी यही सोचकर कि,

कुछ तो हया-शर्म बची है इसमें

वरना सरकारों में तो यह भी नहीं

'पाइप टूटी तो क्या हुआ

पड़ी रहने दो जस की तस

पशु कौन-सा प्रच्छालन करते हैं?

कहाँ का नगर निगम सप्लाई देता है उन्हें

कुत्ते तो पानी के नाम तक से डरते हैं

 

डरो तुम भी डरो थोड़ा-सा

जब सारा का सारा पानी पी जाएँगे

अगस्त्य-से प्यासे उद्योग

तब तुम भला क्या धोओगे?

पता है?

पानी की,

वैसे और अभी से

कितनी किल्लत है देश में

 

और,

तुम्हारा ही कौन-सा पानी बचा है?

सबका सब मर ही तो गया है'

यह कह कर मुस्कुरा ही देता है

गले-गले तक कपड़ा ठुँसाए

मुँह बंद पाइप

और,

मैं भी चोरों-सा दबे पाँव

लौट आता हूँ अपनी बर्थ पर

लेट जाता हूँ यह सोचते हुए कि

हो सकता है कभी बदले व्यवस्था

कभी बदलें अपना स्वभाव

 

कुत्ते-सी नाक फड़फड़ाते

नींद में भी डंडा फटकाते

जी.आर.पी या सी.आर.पी.एफ वाले

या फिर उनसे भी तेज नाक वाले टी. टी.

इनके साथ-साथ बेजान गाड़ी,ड्राइवर और गार्ड

स्टेशन मास्टर,

भैंस की तरह पड़े- पड़े

या घोड़ों की तरह खड़े-खड़े

सोते, सुसुआते,बड़बड़ाते

या फिर,

धमाकेदार खर्राटे भरते

उदार लोकतंत्र के सहनशील नागरिक

यानी यात्री

इन सब में आप को

जो अद्भुत तालमेल दिखता है

वह कुछ और नहीं

बस रेलमपेल है

जनता और व्यवस्था का

नपुंसक घालमेल है।


-डाक्टर गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' 

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