शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य संग्रह : सच का सामना

सच का सामना

(व्यंग्य-संकलन)

डॉ. आर.वी. सिंह

(रामवृक्ष सिंह)
आर.वी.सिंह/R.V. Singh
ईमेल/email- rvsingh@sidbi.in


1. बिहारी और सवाई राजा जयसिंह यदि अब होते

2, शराब और किताब

3. डेंगू-प्रसारी मादा मच्छर से मुलाकात

4. कसम का टोटका

5. सच का सामना

6. हाथी का शौक

7. बापू लोगों की बपौती

8. अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

9. स्वाइन फ्लू का डर

10. क से कछुआ ख से खरगोश

11. ईमानदारी से कहूँ तो..

12. चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ

13. अपना घर

14. कार्यालय में कर्मयोग

15. कबाड़ हमारे मन में है

16. मैंनू की (मुझे क्या)

17. हिन्दी बोले तो...


बिहारी और सवाई राजा जयसिंह यदि अब होते

कुछ लोगों की कमी हमेशा खलती है। सतसइया के दोहरे रचने वाले कविवर बिहारी ऐसे ही लोगों में से एक हैं। बिहारी ने अपने युग में विभिन्न प्रकार की नायिकाओं, उनके सौन्दर्य और श्रृंगार-लीलाओं का बड़ा ही मार्मिक, माँसल और हृदय-ग्राही वर्णन किया है। यदि अपने वातावरण से उन्हें काव्य-रचना की कुछ भी प्रेरणा मिली तो मेरा विनम्र मत है कि वे मध्यकाल के जिस परिवेश में पैदा हुए, जिए और दिवंगत हुए, उसकी अपेक्षा आज का परिवेश उनके लिए बड़ा ही अनुकूल है। यही बात उनके प्रश्रय दाता सवाई राजा जयसिंह के विषय में भी सच है। अगर राजा जयसिंह इस युग में हुए होते तो कली ही सौं बंधने के लिए उनको बिहारी का उलाहना न सुनना पड़ता, क्योंकि स्टेरॉयड पोषित खाद्य-सामग्रियों के सेवन और सूचना क्रांति के प्रभाव वश दुनिया जहान की लाखों कलियाँ अल्प वय में ही अलियों को बाँधने की योग्यता पाने लगी हैं। संसार में लाखों लोलिताएँ आ गई हैं। अपने भारत में ही एज ऑफ कन्सेन्ट की अवधारणा जन्म ले चुकी है, जिसके अनुसार 16 वर्ष की किशोरी संसर्ग की अनुमति देने में सक्षम है। मणिपुर राज्य में तो यह मात्र 14 वर्ष है। ऐसे में बिहारी को अपना अली कली ही सों बंध्यो वाला दोहा बदलना पड़ता।

इसी प्रकार बिहारीजी के अधिकांश दोहों के वर्ण्य विषय भी बदल गए होते। मसलन बिहारी ने बतरस के लालच में नायिका (राधा) द्वारा नायक (कृष्ण) की बाँसुरी छिपा देने की कल्पना की है। अब बाँसुरी बजाने से कोई नायिका नहीं रीझती। और नायक बाँसुरी नहीं, मोबाइल की रिंगटोन बजाता है। अलबत्ता बतरस का लालच आज भी है, जिसके कारण नायक-नायिका रात-दिन मोबाइल से चिपके रहते हैं। मजे की बात तो यह है कि नायक-नायिका परस्पर ही नहीं, बल्कि एक ही समय कई-कई नायक-नायिकाओं से बतरस के मजे लेते रहते हैं। दुनिया की कुछ मोबाइल कंपनियों ने तो इसे ही अपना यूएसपी बना लिया है और वे बकायदा इस प्रवृत्ति को पोषित-पल्लवित कर रहे हैं। ये कंपनियाँ चाहती हैं कि एक लड़की चार-चार लड़कों से एक साथ दोस्ती करे और सबको रात-दिन बतरस में सराबोर किए रहे। इसके लिए ये कंपनियाँ रात के समय की जानेवाली बातचीत के बहुत कम दाम लेती हैं। ज़ाहिर है कि उस समय यानी रात को पूरी पृथ्वी पर बतरस की उद्दाम तरंगों की सुनामी आ रही होती है। बिहारी होते तो लिखते-

बतरस लालच बाल ने घंटी लई बजाय। रैन-दिवस चर्चा करी, तबहुँ न जिया अघाय।

नायिकाओं के सौन्दर्य-दर्शन के लिए बिहारी ने अपने समकालीन, पारंपरिक भारतीय समाज में कितनी कोशिश की होगी, कितनी ताक-झांक की होगी! यह सहज ही कल्पनीय है। उस समय की नायिका दबी-ढंकी, छुई-मुई-सी रहती थी। यदि बिहारी आज के युग में अस्तित्वमान होते तो सौन्दर्य के महासागर में डुबकी लगा-लगाकर, सौन्दर्य सुधा पी-पीकर छक गए होते। उनके ज्ञान-वर्द्धन के लिए उदारमना राजा जय सिंह उन्हें देश-विदेश में आयोजित होनेवाली विभिन्न सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में देश-विदेश की सुन्दरियों का सौन्दर्य निहारने के लिए टूर पर भेजा करते। और फिर बिहारी को इतना तजुर्बा हो जाता कि सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के आयोजक उन्हीं को जज बना दिया करते कि आओ पंडितजी, आप को सौन्दर्य के बहुत ऐंगल मालूम हैं। सो आप ही बताओ कि कौन-सी सुन्दरी सबसे सुन्दर है। अपने समय में तो बिहारी को ज्यादा से ज्यादा पालकी या घोड़े की सवारी मिली होगी, जिससे वे दूर-दराज की जगहों पर नहीं जा पाते रहे होंगे। किन्तु आधुनिक युग में उनके अनुभव-जगत के विस्तार की अकूत संभावनाएं उपलब्ध हैं। बिहारी ने तो कहा ही था- समय समय सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोय। यातायात के साधनों की प्रचुरता और राजा साहब के प्रायोजन में किए गए सौन्दर्य-शोधी दौरों से उनकी यह प्रपत्ति स्वतः सिद्ध हो जाती। हमारा दावा है कि नाओमी कैंपबेल जैसी अश्वेत सुन्दरियों को देख लिया होता बिहारी ने तो और भी नायाब दोहे रचे होते। ये हिन्दी साहित्य का दुर्भाग्य है कि बिहारी सौन्दर्य की दृष्टि से बड़े ही संकुचित युग में पैदा होकर निकल लिए।

सच कहें तो बिहारी के जिन दोहों को साहित्य की अमूल्य निधि कहकर उद्धृत किया जाता है और जिनमें रस-निष्पत्ति की परिकल्पना की गई है, वे सब के सब आज के रससिक्त वातावरण में बस रसाभास के उथले नमूने बनकर रह गए हैं। कहाँ आज की नायिका का उद्दाम सौन्दर्य और कहाँ बिहारी की नायिका का बहनजी वाला बनावटी रूप-विन्यास। आज यदि बिहारीजी जीवित होते तो टेलीविज़न विज्ञापनों, विभिन्न उत्पादों के मुद्रित कार्टनों और पोस्टरों पर छपी नारी-आकृतियों को देखकर ही ऐसे-ऐसे दोहे लिख जाते कि उनको अशर्फियाँ बांट-बांटकर सौन्दर्य-पिपासु सवाई राजा जय सिंह खुद भिखारी हो गए होते।

हर दोहे पर एक अशर्फी ईनाम में देने पर राजा जयसिंह के यहाँ आयकर विभाग वाले छापा मार देते और उनसे जवाब तलब करते कि साहब इन अशर्फियों पर खुद आपने कर चुकाया है या नहीं और बिहारीजी को अशर्फी बाँट रहे हैं उस पर टीडीएस काटा है या नहीं। नतीजतन बाँटी गई अशर्फियों का हिसाब-किताब रखने के लिए राजा जयसिंह को पूरा अमला रखना पड़ता।

हमें पूरा यकीन है कि सवाई राजा जय सिंह ने विदेश से एक बढ़िया दूरबीन मँगाकर बिहारी को दे रखी होगी कि ये दूरबीन लेकर आस-पास के किसी ऊँचे पेड़ या अरावली पर्वत की चोटी पर बैठ जाओ और वहीं से आँख गड़ा-गड़ाकर इधर-उधर ताक-झाँक करो। जैसे ही किसी नायिका का नाखून या उंगली दिख जाए, उसपर तड़ से दोहा लिख दो। यदि अच्छा लिख दिया तो शाम को सुनाकर अशर्फी ले जाना। अब ऐसा कुछ भी जुगाड़ करने की जरूरत नहीं है। चाहे कहीं बैठ जाओ। चाहे सड़क किनारे या पार्क में, चाहे जुहू-चौपाटी, चाहे चर्च गेट या इंडिया गेट, चाहे बोटॉनिकल गार्डन या विक्टोरिया मेमोरियल। दिल्ली के किसी कॉलेज या पब्लिक स्कूल में भी बैठ सकते हैं। न हो तो गोवा के समुद्र तट पर चले जाएँ। नायिकाएं ऐसी-ऐसी वेशभूषा में सामने आतीं कि बिहारी शर्म से आँखें बंद कर लें और अपनी पगड़ी या गमछा उनकी ओर बढ़ाकर कहें कि बच्ची ये कपड़ा लो और जरा अपना बदन तो ढांप लो। चंद्रबदन, मृगलोचनी नायिकाओं ने बिहारी के भाई केशवदास को बाबा कहकर उनका उपहास किया था। हर दोहे पर अशर्फी पाने वाले बिहारी यदि अधेड़ या बूढ़े भी होते तो उन्हें डरने की जरूरत नहीं पड़ती। वे अच्छे से अच्छा फेश्यल कराते और बालों में बढ़िया डाई लगाकर हमेशा छैल-छबीले और युवा ही नज़र आते। इसलिए नायिकाएं उनको बाबा तो कतई नहीं कहतीं, किन्तु बदन ढांपने की सलाह पर जरूर उनकी लानत-मलानत करते हुए कहतीं- हाउ मीन! हाउ डेयर यू टेल अस लाइक दिस।

यह भी जरूरी नहीं कि नायिकाओं के बदन ढाँप लेने मात्र से उनके बदन की बारीकियाँ बिहारी को पुकार-पुकार कर अपनी ओर ताकने-झांकने और दोहों में आंकने का निमंत्रण न देतीं। हिप हगर जीन्स, चुस्त पजामियाँ और अंग-प्रत्यंग का रेशा-रेशा उभारते वस्त्र, अधोवस्त्र। जहाँ देखो, जिस नायिका को देखो ऐसे ही कपड़े पहने दिखती है। जो भी देखता है बस देखता ही रह जाता है। तिय लिलार बेंदी दिए अगणित बढ़त उदोत लिखने वाले बिहारी को लिखने के लिए कितनी सामग्री आज उपलब्ध है, कैसे कहें! अब बेंदी और महावर जैसी वाहियात चीज पर लिखने की जरूरत नहीं है। बिहारी की तिय अब कैसे-कैसे मोहक कपड़े पहनती है- क्या तो अंगिया और क्या ब्लाउज, क्या नाभिदर्शना साड़ी, क्या जीन्स और क्या टॉप, क्या पैंट और क्या कैपरी, क्या स्कर्ट, क्या टी-शर्ट। तिय को सुन्दर से सुन्दर कपड़े डिजाइन करने, सिलने, बेचने और पहनाने वालों का एक पूरा उद्योग पनप गया है। ऐसेसरीज का भी अरबों का मार्केट है। अब लोग खाने पर कम और सौन्दर्य प्रसाधनों पर सबसे ज्यादा खर्च करते हैं। बड़े-बड़े उद्योगपतियों की तिय लोग तो पेरिस और मिलान जाती हैं कपड़े खरीदने। बिहारी दद्दा को मलाल था कि उनका गंधी गंवार को इत्र बेच रहा था और गंवार उसे चाटकर मीठा बता रहा था। कारण यह कि वह जमाना ही भुखमर्रों का था। अब देखें लोग किस-किस तरह के इत्र-फुलेल, सेंट और डिओडरेंट लगाते हैं। बिहारी होते तो पगला जाते। उनको तो पूरा सौन्दर्य-बोध ही बदल जाता।

तिसपर ढेरों जिम, ब्यूटी पार्लर और सौन्दर्य-सलाहकार। तिय की देहयष्टि कितनी कमनीय हो गई है! फिर चाहे वह तिय बारह बरस की हो या बहत्तर की। बिहारी की तिय तो शायद सिर के बाल कटवाने की सोच भी नहीं सकती थी, आज तो हर उम्र की तिय कई-कई स्टाइलों में बाल कटवाती है। लिलार पर बेंदी अब आउट डेटेड बात हो गई। अब न बेंदी है न बिछिया, न ही छागल और महावर बची। हाँ तरह-तरह के स्प्रे, लिप स्टिक, फाउंडेशन, हेयर कलर और न जाने कैसे-कैसे प्रसाधन जरूर आ गए हैं, जिनको यदि बिहारी की तिय देख भी ले तो बेहोश हो जाए। और मिस्सी, महावर, बेंदी लगाने वाली बिहारी की तिय को यदि आज की तिय देख ले तो इस अहसास से ही जल-भुन जाए कि ऐसी ही बहनजी टाइप तिय का वर्णन करने पर कैसे कोई राजा-महाराजा अशर्फियाँ लुटा सकता है।

बिहारी के लिए सचमुच बड़ी उर्वर और संभावना शील विषय-वस्तु का यह स्वर्ण युग है। बेचारे सौन्दर्य-अनुसंधित्सु बिहारी! समय से पहले आकर चले गए। यदि इन्सानी जिन्दगी का एक्शन रीप्ले हो सके तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि हे भगवन आपके कोई-कोई अवतार तो बड़े रसिकता-युक्त रहे हैं। आप जरूर कविवर बिहारी की पीड़ा को समझेंगे। इसलिए यदि हो सके तो कोई टिप्पस लगाकर बिहारी दद्दा को फिर से भारत भेज दीजिए। चाहे सवाई राजा जयसिंह को न भेजिए तो भी चलेगा । उनके तो ढेरों विकल्प हैं, क्योंकि बिहारी दद्दा को प्रश्रय देनेवाले बहुत से फिल्म प्रोड्यूसर, पीत-पत्रकार, नव धनाढ्य सौन्दर्य-प्रेमी मिल जाएँगे। पर बिहारी तो एक ही थे। वैसे भी उनकी करोड़ों तिय यहाँ सज-धज कर ढकी-अधढकी अवस्था में अपने सच्चे कद्रदान का इंतजार कर रही हैं। यदि उनकी कीमत अदा करनेवाला सच्चा कद्रदान मिल जाए तो वे वार्डरोब माल फंक्शन के बहाने या किसी शराब कंपनी के कैलेंडर अथवा नामी पत्रिका के कवर पर छपनेवाली फोटो खिंचवाने के लिए अनढकी होने को भी तैयार बैठी हैं। बिहारी दद्दा के यहाँ दुबारा आने का तो केस बनता है बॉस।

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शराब और किताब

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डेंगू-प्रसारी मादा मच्छर से मुलाकात

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कसम का टोटका

इधर पूरे भारत में सतर्कता जागरुकता सप्ताह मनाया जा रहा है। सतर्कता आयोग को डर था कि हाल में देश के चुनिंदा खवैयों ने जिस तरह जमकर खाया-पिया है, उनकी नकल करके और यथा राजा तथा प्रजा के मुहावरे का अनुसरण करके लोग खाने-पीने के त्यौहार यानी दिवाली तथा उसके आगे-पीछे कहीं कुछ ज्यादा ही खा-पी न बैठें। इसलिए उन्होंने समय रहते यह सप्ताह ही मना लिया और सप्ताह की शुरुआत में ही लोगों को कसम खिला दी कि हम न तो कुछ खाएंगे न पिएँगे।

वैसे कसम बड़े काम की चीज है। इसे खाते ही आदमी बड़ी से बड़ी चीजें और रकमें उदरस्थ कर जाता है और डकार भी नहीं लेता। गोया कसम न हुई हाजमे का चूरन हो गया। कसम खाओ और पीछे जो कुछ खाया-पिया है उसे पचाओ। कसम खाओ और आगे के गरिष्ठ से गरिष्ठ भोजन को भी पचा जाने लायक सामर्थ्य अपने मोटे पेट में पैदा कर लो।

जो लोग कसम तोड़ने से बहुत डरते और घबराते हैं उनकी तसल्ली के लिए बता दें कि कसमें और वादे तो तोड़ने के लिए ही होते हैं। वह कसम ही क्या जो तोड़ी न गई। कसम तोड़कर खा-पी लीजिए। न अल्ला मियाँ नाराज होंगे, न भगवान बुरा मानेंगे। बस जैसे ही उनका डर सताए, खाए-पिए में से थोड़ा-सा हिस्सा उनके यहाँ भी भिजवा दीजिए। दुनिया का बड़े से बड़ा भगवान और खुद अल्ला मियाँ चापलूसी पसंद हैं। उनको चढ़ावा चढ़ा दीजिए, गलती की माफी माँग लीजिए, कान पकड़कर उट्ठक-बैठक लगा लीजिए, बस पीछे का किया-धरा सब माफ हो जाएगा। जब-जब कसम टूटे, बस यही जरा-सा टोटका आपको करना है।

वैसे बताते चलें कि उत्तर भारत की अधिसंख्य विवाहिता महिलाओं ने इसी सप्ताह के दौरान एक दिन वाकई न कुछ खाया, न पिया और अपने-अपने सुहाग की रक्षा के लिए करवा चौथ का व्रत रखा। काश कि अपने देश में नैतिकता, सच्चाई और ईमानदारी की रक्षा के लिए देश के वे सब मरदुए भी ऐसा ही व्रत ले लेते, जिनको जनता के खून-पसीने से कमाए हुए करोड़ों-अरबों रुपये खाते-पीते न भगवान का डर सताता है न अल्लाह का खौफ।

तो हम कह रहे थे कि आजकल देश में सतर्कता जागरुकता सप्ताह मनाया जा रहा है। इस दौरान सभी सरकारी दफ्तरों पर बड़े-बड़े भड़कीले बैनर टाँग दिए गए हैं, जो चीख-चीखकर सदाचार, ईमानदारी और सत्य-निष्ठा अपनाने का आह्वान तथा ऐलान कर रहे हैं। सरकारी दफ्तर में जिनका काम फँसा है, ऐसे आम आदमी बड़ी हसरत से इन बैनरों को देखते हैं और बड़े रहस्यवादी तरीके से मुस्कराकर आगे निकल जाते हैं। अपने तंत्र में भ्रष्टाचार की कहानी के बारे में ही शायद छह सौ साल पहले कबीर साहब ने कहा था-अकथ कहानी प्रेम की कछू कही ना जाय।

इधर अपने प्यारे यूपी में ग्राम पंचायतों के चुनाव हुए। बड़े-बड़े दिग्गज लोग ग्राम प्रधान बनने को लालायित थे। अपने आस-पास के घरों में काम करनेवाली बाइयाँ, निर्माणाधीन मकानों में काम कर रहे मजदूर-मिस्त्री, पेंटर-प्लंबर सब महीने भर के लिए गायब हो गए। पड़ोस में रहनेवाले प्रिंटर महोदय को कई प्रधान-प्रत्याशियों ने एक खास तरह का आर्डर दिया-ऐसे लिफाफे बनवा दीजिए, जिसमें पाँच-पाँच सौ के नोट आसानी से रखे जा सकें। कुछ समझे? कबीर की अकथ प्रेम-कहानी का अनुगमन करते हुए बहुत से गाँवों में पुरुषों ने अपनी बीवियों को प्रधानी का चुनाव लड़वाया। नाम बीवी का होगा, काम होगा या नहीं-पता नहीं, दाम उनके पति लोग पैदा करेंगे। अपना ये प्रांत पैदा करने में आगे है। चाहे पैसे हों या बच्चे।

स्वास्थ्य और सतर्कता दोनों विभागों के लोग कोशिश कर रहे हैं कि इस प्रवृत्ति पर कुछ अंकुश लगे। लेकिन दुनिया का ये सबसे बड़ा दोआबा बड़ा संभावनाशील और उर्वर है। इकबाल मियाँ को हैरत होती थी कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। गोकि रहा है दुश्मन दौरे-जमां हमारा। हम मरजिउवा हैं। रक्तबीज हैं। हमारी हस्ती कैसे मिटेगी? सबसे बड़ी शिफा तो हमारे गंगा जल में है। बड़ी से बड़ी बुराई पर थोड़ा सा गंगा जल छिड़क दो। वह पवित्र हो जाएगी, अच्छाई में बदल जाएगी। एक बुराई का सिर काटते ही सौ और बुराइयाँ हमारे भीतर उठकर खड़ी हो जाती हैं। फिर भी हम एक महान परंपरा के वारिस हैं। हमारे सामने बापू के तीन बंदर बैठे हैं, जो लगातार बताते रहते हैं- बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो। हमारे मन में आता है कि हम चौथे बंदर बन जाएँ और हर आते-जाते से कहें- तुम्हारी खैरियत इसी में है कि बुराई की ओर से पीठ फेर लो और चुपचाप चलते बनो। नहीं तो कोई गोडसे तुम्हारे सीने में गोलियाँ उतार देगा।

ये हिप्पोक्रैसी ही हमारा सबसे बड़ा जीवन-दर्शन है, सबसे बड़ा युग-सत्य है। एक पल कसम खाओ, दूसरे पल भूल जाओ। बुराई के पाँव दबाओ, क्योंकि उसके तले तुम्हारी गर्दन दबी है और बकौल प्रेमचंद जिन पैरों तले अपनी गर्दन दबी हो, उनको सहलाने में ही भलाई है।

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सच का सामना

आजकल सच का बड़ा बोलबाला है। जिसे देखो सच बोलकर हरिश्चंद्र बनने पर आमादा है। खुद तो खुद, लोग-बाग दूसरों से भी सच उगलवाने पर उतारू हैं। इसमें सबसे पहले गाज गिरती है पति या पत्नी पर। अब यह बात अपने देश में कौन नहीं जानता कि विवाह जीवन का बहुत बड़ा समझौता है? ऐसा समझौता जिसमें बहुत-सी बुराइयों पर मिट्टी डालनी पड़ती है। सच कहें तो समझौते सब होते ही ऐसे हैं- दो कदम आप चलिए, दो हम चलते हैं। ऐसे ही जिन्दी कट जाएगी। हमारी दो बुराइयाँ आप न देखिए, दो हम आपकी अनदेखी करते हैं। इससे प्रेम या कम से कम प्रेम का मुगालता बना रहेगा। लेकिन इधर पता नहीं लोगों को क्या बीमारी लगी है कि वे आपस में भी एक-दूसरे का सच उगलवाने में जुटे हुए हैं। खैर, सच उगलवा लो, लेकिन उसे सहने का माद्दा भी तो रखो। क्योंकि सच तो उस विषैले नाग की तरह है जो एक बार अपनी बांबी से निकल आया तो फिर न जाने कितने लोगों को डसकर धराशायी कर देगा। इसीलिए अपने यहाँ कहा भी है- न ब्रूयात् सत्यं अप्रियं।

हम भी क्या करें, सच बोलने और बुलवाने की संक्रामक बीमारी एक दिन हमारे घर में भी घुस गयी। एक दिन जरा फुरसत में थे तो पत्नी ने पकड़ लिया। बोलीं - आज बड़ी फुरसत है, बिजली आ नहीं रही, टीवी-केबल सब बंद है। कल राष्ट्रीय छुट्टी रही, जिसके कारण आज पेपर भी नहीं आया। आइए टाइम पास करने के लिए सच का सामना खेलते हैं। हम सकपका गए। पत्नी को भी कैसा खतरनाक खेल सूझा। सच और अपने पास! अपन के राम सरकारी तंत्र में काम करने की क्वार्टर सेंचुरी मार चुके हैं और सत्यनिष्ठा को हजारों बार औँधे मुँह गिरते देखा है, जलील होते, बेआबरू होकर अपने कूचे से निकलते देखा है। हालांकि हर साल सतर्कता जागरूकता सप्ताह में सत्यनिष्ठा की कसम खाते हैं, पर शापित हैं झूठ का साथ देने को। सच की आँख में आँख डालकर उसका सामना हम कैसे कर सकते हैं? बहुत कोशिश की कि पत्नी की इस जिद से किसी तरह पीछा छुड़ा लें, किन्तु वे तो पूरी तरह आमादा ही हो गयीं सच का सामना खेलने के लिए।

मरता क्या न करता? झख मारकर हमें हथियार डालना पड़ा। लेकिन हम भी कोई कम घाघ नहीं हैं। हमने लेडीज फर्स्ट की रट पकड़ ली और पत्नी को विवश कर दिया कि पहले वे हमारे सवालों का सामना करें। विवश होकर पत्नी को सहमत होना पड़ा। हमने बड़े धांसू-धांसू सवाल पूछे, अच्छा हुआ कि हमारे पास कोई पोलीग्राफ मशीन नहीं थी, वरना उस दिन हमारे वैवाहिक जीवन का शीराजा बिखर जाता और न जाने क्या से क्या हो जाता। हमारे कुछ सवालों की बानगी तो देखें- अच्छा तुम बताओ कि हमारे मुँह से सुबह-सुबह जो पायरिया की बदबू आती है, उसके कारण कभी तुम्हारे मन में यह विचार नहीं आता कि इस आदमी को फिनाइल की पूरी बोतल पिला दूँ ताकि इसकी बदबू हमेशा के लिए खत्म हो जाए? ये बताओ कि रात-दिन पान खाने से सड़े हुए, मेरे काले-काले दाँत देखकर क्या तुम्हारे मन में कभी यह खयाल आया है कि सिल-बट्टे से इसकी सारी बत्तीसी झाड़ दूँ, ताकि जिन्दगी भर के लिए ऐसे गंदे दाँतों को सहने का झंझट ही खत्म हो जाए? अच्छा ये बताओ कि मेरे शरीर से आनेवाली पसीने की बदबू से क्या कभी तुम्हें मितली नहीं आयी है? जब मैं दफ्तर से लौटकर बदबू मारते मोजे से पैर निकालता हूँ और वैसे ही गंधाता हुआ पूरे घर में, यहाँ तक की बिस्तर में भी घुस जाता हूँ तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि ऐसे सड़ांध में पके औघड़ का तो दुनिया में न होना ही बेहतर है? हमें पक्का विश्वास था कि इन सवालों के जवाब तो पत्नी सही-सही दे ही देंगी। यों सवाल तो बहुत-से हो सकते थे लेकिन हमें लगता है कि क्या गड़े मुरदे उखाड़ें? अपनी ही पत्नी को झेंपने पर विवश करना क्या अच्छा लगेगा? इसलिए हमने पत्नी से ऐसे सवाल नहीं पूछे जिनके लिए शास्त्रकारों ने वर्जना की है- न ब्रूयात् सत्यं अप्रियं।

पत्नी ने भी हमसे रियायत की। प्रश्न बड़ी ज्वलंत समस्याओं पर आधारित थे, किन्तु उन्होंने हमारे मनभावन उत्तर दिए। चापलूसी सबको पसंद है। हम पत्नी के जवाबों की लक्षणा-व्यंजना में नहीं गए। अभिधा में ही समझ लिया। यही सुकर और व्यावहारिक लगा। भारतीय महिला, वह भी बेचारी घरेलू महिला। माताजी और बूढ़ी ददिया ने शादी में विदाई करते हुए हिदायत देकर भेजा- जिय बिन देह नदी बिन बारी, तैसेहिं नाथ पती बिन नारी, दहेज और दावत के बाद लगभग लुट चुके बाप ने समझाया-पति के घर डोली उतरती है और वहाँ से अरथी ही उठती है।, बच्चे पंख निकलते ही घोंसला छोड़कर उड़ चुके हैं और अपनी दुनिया में रमे हुए हैं। कुल मिलाकर पति का ही आसरा। उस पति को कैसे नाराज़ कर सकती हैं? इसलिए उन्होंने भी मुरव्वत दिखाते हुए ऐसे सवाल पूछे, जिनके उत्तर हम सहजता से दे पाएँ, जैसे- आप ये बताएँ कि आपको दफ्तर ज्यादा अच्छा लगता है या घर? हमने कहा दफ्तर। पत्नी को हैरानी हुई, तफ्सील माँगी गई तो हमने तपाक से कहा- वहाँ हमारी पूरी खातिर तवज्जो होती है। गरमियों में दिन भर ए.सी. चलाओ, सर्दियों में हीटर। बिजली के बिल की कोई चिन्ता नहीं। कंप्यूटर मॉनीटर पर किसी की निगाह न जाती हो तो दिन भर इंटरनेट की मनमाफिक वेबसाइट खोले बैठे रहो। चाहे वीडियो गेम खेलो। साथियों से गप्पें मारो। महिला सहकर्मी यदि सुदर्शना हों और लिफ्ट देती हों तो फ्लर्ट करो। इधर-उधर फोन मिलाकर रिश्तेदारों-नातेदारों से बातें करो, टेलीफोन बिल तो सरकार भरेगी। हमें उससे क्या? दफ्तर में मन न लगे तो आस-पास किसी पार्क में जाकर मूँगफली फोड़ो, सेल में घूम आओ। पास में कोई मॉल हो तो वहाँ जाकर आँखें सेंक आओ। घर में ये सब कहाँ! पत्नी को हमारी बेबाकी अच्छी लगी। फिर पत्नी ने बड़ी हिम्मत करके पूछा- अच्छा ये बताइए कि मैं आपको अच्छी लगती हूँ या पड़ोसिन? हमने इस मामले को गोल कर दिया और बिहारी के दोहे की एक लाइन सुना दी- समय-समय सुन्दर सबै, रूप-कुरूप न कोय। पत्नी खुश हो गईं- चलो किसी समय तो मैं भी अच्छी लग ही जाती हूँ। मन ही मन सोचा होगा कि तुम ही कौन से कामदेव हो?

ऐसे ही सच का सामना खेलते-खेलते हम अपने कल्पना लोक में चले गये और सोचने लगे कि यदि नियोक्ता अपने प्रतिष्ठान के लिए कर्मचारियों की भर्ती हेतु साक्षात्कार लेते समय चुपके से उसकी सीट के नीचे या कुर्सी के किसी हिस्से में पोलीग्राफ मशीन फिट करा दे और कर्मचारी के मन की बातें जान सके तो क्या होगा? मसलन संघ लोक सेवा आयोग में देश के चुनिंदा प्रशासनिक पदों पर साक्षात्कार के समय उम्मीदवार बड़े आदर्शपरक उत्तर देकर नियुक्ति पा लेते हैं। यदि पोलीग्राफ मशीन से उनके मनोभाव जाने जा सकें तो क्या हो? एक बानगी देखें:

प्रश्न : आप प्रशासनिक सेवा में क्यों आना चाहते हैं?

उम्मीदवारः देश-सेवा के लिए (सत्यान्वेषी यंत्रः अरे बुढऊ, ये भी कोई पूछने की बात है? हम आना चाहते हैं, अपने वारे-न्यारे करने के लिए। करोड़ों रुपये पीटने के लिए। सेवा-वेवा तो खाली तुमको पागल बनाने के लिए कह रहे हैं। तनख्वाह छुएँगे नहीं। देश को लूटकर अपना घर भरेंगे)।

प्रश्न : वर्षा कम होने से देश को क्या नुकसान है?

उम्मीदवारः फसलें कम होंगी और किसान को बहुत कष्ट होगा (सत्यान्वेषी यंत्र- तभी तो मजा आएगा। खूब सारी सरकारी मदद आएगी। विश्व बैंक से सहायता मिलेगी। नेता, ठेकेदार, अफसर और गैर सरकारी संगठन सब मिलकर उसकी बंदरबाँट करेंगे। हम होंगे इस सारी लूट के केंद्र में।)

यदि इसका उलटा कर दें, यानी कि सत्यान्वेषी यंत्र प्रश्नकर्ता की सीट में फिट कर दें तो क्या स्थिति निर्मित होगी? एक बानगी देखें:

उम्मीदवार एक सुदर्शना और सुन्दर देहयष्टि वाली युवती है। वह जैसे ही साक्षात्कार-कक्ष में प्रवेश करती है, सबकी बाँछें खिल उठती हैं। साक्षात्कर्ता उसका स्वागत करता हैः आइए-आइए, बैठिए (सत्यान्वेषी यंत्रः वाह! क्या माल है! ऐसी सुन्दर लड़की अपनी जिन्दगी में आ जाए तो अपनी ऐश हो जाए। लाइफ बन जाए।)

उम्मीदवारः जी , धन्यवाद।

साक्षात्कर्ताः आपकी क्वालिफिकेशन क्या है? क्या कोई अनुभव है? (सत्यान्वेषी यंत्रः आपके मेज़रमेंट्स क्या हैं? इतनी सुन्दर देहयष्टि वाली लड़की होकर भी क्या आप अभी तक डेट पर नहीं गई हैं? इंटरव्यू के बाद क्या आप मेरे साथ डेट पर जाना पसंद करेंगी?)

उम्मीदवारः बी.एस.सी.। एम.बी.ए.। अनुभव नहीं है।

साक्षात्कर्ताः अच्छा-अच्छा। अनुभव नहीं है तो भी कोई बात नहीं। (सत्यान्वेषी यंत्रः मन तो नहीं मानता कि अनुभव नहीं है। पर नहीं है तो अच्छा ही है।)

यानी आप सोच भी नहीं सकते कि कैसी-कैसी विकट स्थितियाँ पैदा होंगी। लोग एक-दूसरे के मन की बातें जान लेंगे तो उनका आपस में उठना-बैठना मुश्किल हो जाएगा। एक जगह मिलजुलकर काम करना और साथ रहना कठिन हो जाएगा। बॉस को पता चल जाएगा कि जो अधीनस्थ उसे रोज सुबह नमस्कार करता है, खींसें निपोर-निपोरकर हर बात में हाँ में हाँ मिलाता है, दरअसल उसके मन में बॉस के लिए ढेरों गालियाँ भरी होती हैं। वह रात-दिन प्रार्थना करता है कि बॉस किसी तरह निपट जाए तो इसका पद मुझे मिल जाए। इसी प्रकार अधीनस्थों को भी पता चल जाएगा कि बॉस तो हमें बस पागल बनाता है। किसी तरह अपना काम निकलवाता है। टीन-एजर लड़के जिस सुदर्शना प्रौढ़ा पड़ोसिन को आंटी-आंटी कहकर आदर दिखाते नहीं थकते, उसे लड़कों के असली मनोभाव पता लगेंगे तो वह भला क्या सोचेगी? और उसके सोचने के विषय में अगर उसके पति को पता लगेगा तो उस बेचारे अंकल पर क्या बीतेगी? हे राम! सब गड़बड़ झाला हो जाएगा। पूरी समाज-व्यवस्था का शीराजा बिखर जाएगा। ऐसे घर-फोड़ू सच से तो अपना झूठ ही सही।

किसी पुरानी हिन्दी फिल्म का एक मशहूर रोमांटिक गीत है- पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही। सच कहें तो इस झूठ में बड़ी ताकत है। दुनिया के करोड़ों जोड़े जिन्दगी भर किसी और की यादों में खोए रहते हैं लेकिन रोज-मर्रा का सारा कारोबार पति या पत्नी के साथ पूरा करते हैं। करोड़ों लोग फैंटेसी की दुनिया में रहते हैं और अपने पसंदीदा हीरो-हीरोइन की कल्पना करके ही दैनंदिन के काम निपटा लेते हैं। रूमानियत अपने-आप में झूठ है, फरेब है, कोरी कल्पना है। लेकिन रूमानियत से शून्य संसार की कल्पना करना भी असंभव है। तर्कवादियों के तईं भगवान का अस्तित्व अपने-आप में सबसे बड़ी रूमानी कल्पना है। उनकी दृष्टि में ईश्वर की परिकल्पना ही सबसे बड़ा झूठ है। लेकिन अंततः प्रायः हर आदमी अपने दिल की तसल्ली के लिए भगवान की शरण में जाता है। दिल के बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है। ये सुन्दर संसार छोड़ने का मन नहीं करता। मृत्यु शाश्वत सत्य है। इस सुन्दर, चित्र-विचित्र दुनिया को छोड़कर जाना तो पड़ेगा ही। फिर हम झूठ का सहारा लेते हैं और दिल को बहलाते हैं- ऊपर बिग बॉस यानी भगवान के घर में इससे भी सुन्दर संसार है, जिसका नाम है स्वर्ग। अच्छे-अच्छे काम करो- तुम्हारी देह के मर जाने पर भी तुम नहीं मरोगे- न म्रियते जायते वा। बल्कि इस मृत्युलोक से भी सुन्दर, ऐशो-आराम वाली दुनिया में डेपुटेशन पर भेजे जाओगे। भगवान ने स्थायी नियुक्ति पर बुला लिया तो सीधे बैकुंठ धाम। और यदि इस जन्म में उतने अच्छे काम नहीं कर पाए, सी.आर. में अच्छी एंट्री कराकर, बॉस को खुश करके स्वर्ग की सीट नहीं बुक करा पाए तो अपने कर्मानुसार चौरासी लाख योनियों में से किसी न किसी योनि में जन्म पाकर फिर से इसी दुनिया में आओगे। तुम्हारा पुनर्जन्म होगा। मृत्यु नामक वीभत्स सच्चाई की विभीषिका से डरा-सहमा हमारा दिल इस कोरी गप्प से बहल जाता है। तर्कवादी गालिब कहता है- हमको मालूम है जन्नत की हकीकत।

इधर टेलीविजन महाराज दूर से दर्शन कराने के बजाय माइक्रोस्कोपिक हो गए हैं और लोगों के निजी जीवन की एक्स रे मशीन की भूमिका में आ गए हैं। टीवी चैनल वाले कैमरा और माइक्रोफोन लिए-लिए लोगों के बेडरूम में जा घुसे हैं। सब कच्ची-पक्की बातें सार्वजनिक हो रही हैं। कामदेव और रति की अस्थि-मज्जा-युक्त कमनीय काया में छिपी अंतड़ियों में भरा मल-मूत्र सबके सामने उजागर हो गया है। मस्तिष्क में भरा कचरा बाहर आकर बदबू मारने लगा है। अति परिचय होने के कारण अब उनके प्रति अनादर की भावना जन्म लेने लगी है। ये तो होना ही था। ग्राम-वासिनी दादी अम्मा की कहावत है- पहनी ओढ़ी मेहरी, लीपी पोती देहरी- सबको अच्छी लगती है। मेहरिया को जरूरत से ज्यादा उघाड़ो मत और देहरिया को भली-भांति लीप-पोतकर रक्खो। जिन्दगी में कुछ तो भरम रहने दो। ज्ञानी लोग इसी को माया कहते हैं। लाख झूठा और छलावा सही लेकिन माया का आवरण है तो जिन्दगी खूबसूरत है। माया के आवरण को हटाओ मत। झूठी माया के पीछे ऐसा भयानक सच छिपा बैठा है, जिसकी झलक मिलते ही, गश खाकर गिर पड़ोगे।

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हाथी का शौक

अपने देश में हाथी रखना, हाथी पालना और हाथी पर चलना सदियों से ही बड़े गर्व की बात समझी जाती रही है। हजारों वर्षों से हिन्दुस्तान और हाथी का साथ रहा है। राजा-महाराजा अपनी सेना में हाथियों का लंबा-चौड़ा दस्ता भी ज़रूर रखते थे। हाथी रखने से उनको बड़े फायदे थे। जैसे किसी सिरफिरे कवि ने यदि उनके मनोनुकूल कविता नहीं लिखी तो हाथी के नीचे कुचलवा दो। यदि किसी प्रतिद्वद्वी राजा या सामंत का फाटक लाख खुलवाने पर भी नहीं खुल रहा तो हाथी से टक्कर मारकर खुलवा दो। ऊँचे हाथी पर लदे हौदे में बैठा राजा पैदल तो क्या घुड़सवार सैनिकों की पहुँच से भी दूर रहता था। हाँ, उसकी पहुँच में सभी रहते थे। जब चाहे वहाँ से भाला फेंककर या तीर मारकर जिसे चाहे टपका दे। हाथी मदमस्त सत्ता का प्रतीक था। वह सूंड़ घुमाता जिधर निकल जाता उधर ही हाहाकार मच जाता। ह से हाथी, ह से हाहाकार। जिसके चाहे खेत में घुस जाओ और सारी फसल तहस-नहस कर डालो, खेत के खेत गन्ने खा जाओ, हरे-भरे पेड़ों की टहनियाँ तोड़ डालो और कोई रास्ते में आए तो उसे कुचल डालो।

बरसों यही क्रम चलता रहा। तभी यूनान से अलेक्जेंडर आया। उसके पास हाथी नहीं थे। बल्कि थे घोड़े। ये घोड़े बड़े फुर्तीले थे। हाथी राम को अगल-बगल से कोंच दिया। जब तक हाथी राम घूमें तब तक फुर्ती से दूसरी ओर निकल लिए। अलेक्जेंडर के घोड़ों ने पोरस के हाथियों को खूब छकाया। वह पहला मौका था जब हाथी को अपनी सीमाओं का अहसास हुआ। हाथी जब बौखलाकर पलटे तो खुद पोरस के पैदल सैनिक उनके पैरों तले रौंदे गए।

इसके बावज़ूद भारत में हाथी के प्रति मोह बराबर बना रहा। यहाँ हर बड़ा आदमी एक न एक दिन हाथी हस्तगत करने की तमन्ना लिए जीता आया है। शायद इसी हसरत का परिणाम था कि गाँवों में छोटे-मोटे ज़मींदार भी हाथी रखते थे। यदि बड़ा, फुल साइज हाथी रखने की कूवत न हो तो वे मिनिएचर हाथी रखकर ही अपनी हसरत पूरी कर लेते। इसे गाँवों में लोग मकुनिया हाथी कहते थे। हाथी रखना शान की बात थी, फिर चाहे वह मकुनिया हाथी ही क्यों न हो।

कुछ लोगों की औकात हाथी तो क्या एक ठीक-ठाक भैंसिया या गइया रखने की भी नहीं थी। सो उन्होंने सोचा कि यदि हस्तगत न कर सकें तो स्वयं हाथी ही क्यों न बन जाएँ! हाथी जो खाए खूब, अपनी मस्ती में- सत्ता के मद में चूर रहे और जिधर चाहे, उधर सूंड़ झुलाता चलता चला जाए। अपना स्वार्थ देखे, अपना काम निकाले और बाकी दुनिया पर उसकी कारगुजारियों से क्या गुजर रही है, इसका बिलकुल भी खयाल न करे। इसीलिए लोगों ने मुहावरा चलाया- हाथी निकल जाता है, कुत्ते भौंकते रहते हैं। यानी हाथी ऐसा जीव है, जो किसी की परवाह नहीं करता। वह निरंकुशता का प्रतीक है, वह शाही शान-बान का प्रतीक है। हाथी हस्तगत करना, उसे पालना और उसकी देखरेख टेढ़ा काम था। उसके बनिस्बत खुद हाथी बन जाना बहुत आसान था। इसीलिए अपने देश में बड़े-बड़े महानुभाव लोग हाथी बनना पसंद करते हैं। वह भी स्लेटी नहीं, सफेद हाथी।

उधर दिल्ली में एक विश्वविद्यालय है, जिसकी डिग्री पर हाथी की तस्वीरें छपी रहती हैं। हाथी वाली डिग्री की पूरे देश में बड़ी पूछ है। देश के कोने-कोने से विद्यार्थी हाथी छाप डिग्री लेने के लिए दिल्ली आते हैं।

यह स्थापित सत्य है कि अपने देश के कई राजनेता और हाकिम-हुक्काम, मय पुलिस वालों के, अपनी खुराक और शाह-खर्ची में हाथी को भी मात करते हैं। चूंकि नेता लोगों, बड़े-बड़े हाकिम-हुक्मरान, पदाधिकारियों आदि का नाम सम्मान से लेना चाहिए, और दुष्टों-दानवों को सबसे पहले प्रणाम करने की अपने यहाँ परंपरा रही है, इसलिए ऐसे महानुभावों को सीधे-सीधे हाथी कहने के बजाय, बड़ी इज्जत से सफेद हाथी कहा जाता है। काले को सफेद कर देने से बुरी चीज़ भी अच्छी समझी जाने लगती है। सफेदी के प्रति हमारा हमेशा से आग्रह रहा है। इसीलिए देश के कुछ बेहद बुरे लोग झक सफेद कपड़े पहनते हैं। यहाँ तक कि कइयों के तो जूते भी सफेद होते हैं। दाँत चाहे न होते हों। हाथी की फितरत और आदतों के साम्य की दृष्टि से देखें तो कायदे से तो हर राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न हाथी होना चाहिए, क्योंकि शाहखर्ची का अपवाद शायद ही कोई राजनेता हो। इसी प्रकार ज्यादातर महकमों को फीलखाना कहा जाना चाहिए, क्योंकि उनकी खुराक भी अच्छी-खासी होती है। लेकिन अपनी दूरंदेशी दिखाते हुए अपने देश के एक खास दल ने इस चिह्न को लपक लिया है। सदियों तक खाने-पीने और ऐश करने की उनकी मंशा में किसी को शक-ओ-शुबह न रहे, इसलिए देश के उक्त दल ने अपना प्रतीक ही हाथी करा लिया है। जहाँ देखो वहीं हाथी की मूर्तियाँ लगवाई जा रही हैं। ये हाथी बड़े कीमती हैं और इनके निर्माण व संस्थापना से जो भी जुड़ा है वही महान हो गया, धनवान हो गया।

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बापू - लोगों की बपौती

बापूजी के आश्रम में बैठे हुए मैं बड़ी तल्लीनता से उनके प्रवचन सुन रहा था। उनकी ज्ञानप्रद बातें सीधे मेरे दिल में उतर रही थीं। आँखें टकटकी लगाए उन्हीं को निहार रही थीं। बापू जमीन से लगभग छह-सात फीट की ऊँचाई पर बने शीशे के घर में बैठे थे। उनके सामने ज़मीन पर एक तरह का नो-मैन्स ज़ोन था। उस नो-मैन्स जोन में दो-तीन वीडियो कैमरे लगे थे, जो प्यारे बापूजी की हर भाव-भंगिमा, हर शब्द, श्वास-निश्वास को रिकॉर्ड कर रहे थे। हजारों दूसरे श्रद्धालुओं की भांति मैं भी स्वयं को बड़ा सौभाग्यशाली अनुभव कर रहा था। बापू के साक्षात् दर्शन जो हो गए थे! तभी पीछे से किसी कैमरे का फ्लैश चमका। सामान्य-सी बात थी। उत्सुक भक्तगण अपने पूज्य, आदरणीय जनों की फोटो नहीं खींचते क्या? लेकिन बापूजी को यह हरकत नागवार गुजरी। वे आक्रोश में आ गए। तुरन्त फतवा जारी किया- "उसका कैमरा छीन लो। रील निकाल लो।" प्यारी-प्यारी बातें करनेवाले बापू जी, लोगों को क्षमा, दया और सद्भावना की शिक्षा देनेवाले बापूजी का यह नया रूप मेरे सामने था। मेरी आस्था थोड़ी-सी डिग गई। इस प्रकरण पर कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। लेकिन मैं तो साहित्यिक होने के नाते केवल इतना कहूँगा कि बापूजी रचनात्मकता और कला-सृजन के विरुद्ध हैं। उनकी फोटो चाहिए? काउंटर से खरीद लो। जैसी फोटो बापूजी की स्वेच्छा से प्रचारित होती है, उनके कैलेंडर पर छापी गई है, बस उसी से संतोष करो। अपनी रुचि का प्रदर्शन करने, अपने कैमरे से, अपने इच्छित ऐंगल से फोटो खींचकर ज्यादा श्यांणा बनने की चेष्टा न करें। अपनी ओर से कुछ नया न सोचें। जैसा आश्रम में उपलब्ध है, बस उसी को बिना किसी आपत्ति के, यथावत स्वीकार कर लें तो बापू खुश। यदि आपने अपनी ओर से रचनात्मकता दिखाने की कोशिश की तो बापूजी कुपित हो जाएंगे और बहुत संभव है कि आपको कोई शाप-वाप ही दे डालें। उस दिन के बाद से अपन बापूजी के आश्रम नहीं गए। बापूजी के शिष्य और भक्तगण इस बात के लिए हमारी लानत-मलानत कर सकते हैं, लेकिन बापूजी ने कैमराधारी उन सज्जन के साथ-साथ हमारा भी दिल तो तोड़ ही दिया है। साथ ही हमें डर है कि यदि आधी-अधूरी आस्था लेकर कभी हम उनके सामने चले गये और अंतर्यामी बापू को हमारी डिगी हुई आस्था का आभास भी हो गया तो कोई अनिष्टकारी घटना भी हमारे साथ घट सकती है। इससे तो बेहतर है कि भइया दूर ही रहो इस पचड़े से।

इस दुनिया में भक्त का दायित्व है भगवान की हर बात को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना। न शंका करो, न अपना दिमाग लगाओ। बापू जो कुछ कहते हैं, बस मानते जाओ। सोचने का काम बापू पर छोड़ दो, तुम तो बस उनका अनुसरण करो। बापूजी कहते हैं कि जो निगुरा हो, यानी जिसने किसी गुरु से विधिवत दीक्षा न ली हो, उसके घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए। क्यों? क्योंकि निगुरे के घर का पानी मूत्र-तुल्य होता है। हाँ, किसी वनचारी गाय का मूत्र चाहे पी लो। गोमूत्र अमृत-तुल्य है। गाय का गोबर तो और भी उत्तम है। जितना खा सको, खाओ। गोबर खाओ, गोमूत्र पियो। उससे तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर सुधर जाएँगे। सारे पाप धुल जाएँगे। पेट और दिमाग, दोनों के कीड़े साफ हो जाएँगे। सब आधि-व्याधियाँ दूर हो जाएँगी। बस इतना ध्यान रहे कि निगुरे के घर का पानी न पीना। निगुरे का छुआ हुआ कुछ भी खाया या पिया तो गए काम से। गोया निगुरे के हाथ में साइनाइड है जिसके संपर्क में आने से वस्तुएं विषाक्त हो जाती हैं। और यदि आपने एक बार दीक्षा ले ली तो? आठों याम बापू की भक्ति करो। किसी और का ध्यान-व्यान करने की कोई ज़रूरत नहीं। बस बापू को भजो। अव्वल तो उन्हीं को भगवान मानो और यदि किसी दूसरे को मानने की जरूरत भी आन पड़े तो अपने बापू को सबसे ऊँचा वाला भगवान समझो। यदि किसी हाड़-माँस वाले को भगवान मानने का जी न करे तो इतना तो मान ही लो कि बापूजी भगवान और आपके बीच के एजेंट हैं।

बापू लोगों का पूरा बल अधिक से अधिक लोगों को शिष्य बनाने पर रहता है। अपने देश की सरकार कितने जतन करने के बाद भी देश के सभी बच्चों को गुरुजी के पास पढ़ना-लिखना सीखने नहीं भेज पाई है। क्या-क्या उपाय नहीं किए गए! कौन-सा टोटका छोड़ा है? कभी मुफ्त वर्दी और कापी-किताब, कभी मोटा वजीफा तो कभी दोपहर का भोजन और कभी पुष्टाहार। इधर कुछ राज्य सरकारों ने स्कूल जानेवाली बालिकाओं को मुफ्त साइकिलें बांटी हैं। लेकिन निरक्षरता है कि देश से जाने का नाम ही नहीं लेती। जबसे बापू लोगों की महिमा अपनी समझ में आई है बार-बार हमारा दिल कहता है कि यदि देश में दो-चार सौ ढंग के बापू हो जाएँ और राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की बागडोर बापूजी लोगों के हाथ में दे दी जाए, तो बस कुछ ही दिनों में देश से निरक्षरता दूर हो जाए। देश की सारी अनपढ़, निरक्षर जनता बापू लोगों से दीक्षा लेकर साक्षर हो जाए। बापूजी हर निगुरे को सगुरा कर दें। क्योंकि जो निगुरा है, उसके जैसा पतित और घटिया इन्सान तो बकौल बापूजी कोई होता नहीं और बैकुण्ठ-कामी इस देश में कौन खुद को घटिया, पतित और स्वयं बापू व बापू-भक्तों के लिए अस्पृश्य कहलाना चाहेगा? किन्तु हमारी इस मनोकामना में एक बहुत ही गहरी विसंगति है, जो अधिकतर बापू लोगों के स्वयं निरक्षर भट्टाचार्य होने के कारण उपजी है। सच्चाई यह है कि अव्वल तो ज्यादातर गुरु लोग, खुद बहुत बड़े गुरु-घंटाल यानी निरक्षर होते हैं और जो इस देश के परम सौभाग्य से तथा अपने लाखों भक्तों के पुण्य-प्रताप से थोड़ा पढ़े-लिखे होते भी हैं उनकी रुचि किसी को पढ़ना-लिखना सिखाने में कतई नहीं होती। देश की चालीस-पैंतालीस प्रतिशत अनपढ़ जनता पढ़ना-लिखना सीख जाए, इस तरह का कोई सुविचार इन बापू लोगों के मन में कभी भूले से भी नहीं आता। बस उनकी तो एक ही साध है, किसी तरह लोगों के मन में बिठा दो कि निगुरे के घर का पानी भी मूत्र-तुल्य है। जो निगुरा है, उसे अस्पृश्य और समाज-बाह्य समझो। यह बापू लोगों का नया समाजशास्त्र है। इसीलिए अपना मत है कि बापूजी नैतिकता, आध्यात्मिकता, लोकाचार आदि के स्तर पर कोई रचनात्मक बातें नहीं करते।

हाँ, एक मामले में उनकी रचनात्मक सोच बिलकुल अद्भुत और श्लाघ्य है। वह है जैविक रचनाधर्मिता। बच्चों की आमद पर किसी भी प्रकार की रोक लगाने के बापूजी बहुत विरोधी हैं। बच्चे जितने पैदा कर सकें, करते जाएँ। भ्रूण-हत्या तो क्या, गर्भ-निरोध भी न करें। कारण बिलकुल स्पष्ट है। शिष्यों-प्रशिष्यों की संख्या बढ़ाने का एक बहुत बड़ा उपाय यही तो है। जितनी अधिक आबादी होगी, उतने ही अधिक शिष्य-प्रशिष्य होंगे। जितने अधिक शिष्य-प्रशिष्य होंगे, उतना ही अधिक पुजापा और चढ़ावा चढ़ेगा। उतना ही अधिक प्रसाद मिलेगा। बापू का जनाधार बढ़ेगा तो जाहिर है बापू का भंडार भी भरेगा और बढ़ेगा। बापू लोगों के तईं जानवरों और आदमियों में कोई खास अंतर नहीं है। भेड़ों में एक आदत होती है। जिधर एक भेड़ चल देती है, उधर ही सब की सब चल पड़ती हैं। यही स्थिति अनपढ़ इन्सानों की होती है। एक जिधर गया उधर ही सब के सब हो लेंगे- चल पढ़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर। बापू लोगों को भीड़ चाहिए। भीड़ और भेड़ में बस एक मात्रा का अंतर है। इस बात को बापू लोग खूब जानते हैं। ऐसी भेड़ों का आवाहन करके, उनकी बलि चढ़ाने वाले भेड़ियों की कोई कमी नहीं। इसीलिए गाहे-ब-गाहे सुनने में आता है कि अमुक-अमुक पंथ के साधु लोग अमुक स्थान पर गलत हरकतें करते पकड़े गए, अमुक बापू ने अमुक अपराधी को प्रश्रय दिया और अमुक बापू के आश्रम में अमुक गोरखधंधा पकड़ा गया।

प्रसंगवश, यदि किसी पाठक की बापू-भक्ति को इस लेख से ठेस पहुँची हो तो वह हमें निगुरा और इस नाते अज्ञानी समझ के माफ करे।

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अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

आरंभ में ही बताते चलें कि यह कोई महिलावादी लेख नहीं है। बस हम तो यह बताना चाहते हैं कि सरकारी दफ्तरों में बिटिया होने का क्या मतलब है। सच बात यह है कि हमारे मातहत एक मोहतर्मा हैं, जो दफ्तर को मायका समझती हैं। जब चाहे आओ, जब चाहे जाओ। जब चाहे न आओ। बस इतने से परिस्थिति-साम्य के कारण हमने यह आकांक्षा की कि हे भगवान हमें अगर फिर से इन्सान का जन्म दो (वैसे तो हम अपनी तल्ख बयानी के कारण इतने शाप पा चुके हैं कि इन्सान का जन्म अब मिलना मुश्किल ही है और जिसका इमकान है उसकी चर्चा करके हम पाठक को शर्मसार नहीं करना चाहते) तो बिटिया ही करना- सरकारी दफ्तर को मायका समझने वाली बिटिया।

आप कहेंगे कि हम इतने तीखे-तुर्श क्यों हो रहे हैं? बात दरअसल यह है कि दफ्तरों में बिटिया रानी की मौज ही मौज है। यदि क्लास थ्री में हुईं तब तो कहना ही क्या!

तो हमारी विभागीय बिटिया एक दिन हमारे पास आईं और बोलीं- सर आज मुझे तीन बजे घर जाना है। मैंने अपने मन में कहा- ये कौन सी नई बात है। रोज चार बजे जाती हो आज तीन बजे चली जाओगी। मैं कुछ नहीं बोला। अपने काम में जुटा रहा। उस तरफ ध्यान देने का मतलब है आधे घंटे उसकी चक-चक, बक-बक सुनो, हाँ में हाँ मिलाओ, खींसें निपोरो और जब वह खुद ही मेहरबानी करके चली जाए तो फिर से अपने काम का सिरा पकड़ो। जरूरी नहीं कि उसकी कोरी बकवास सुनने के बाद तत्काल सिरा मिल ही जाए। उसमें घंटा -दो घंटा भी लग सकता है। इसलिए बेहतर है कि उसे तूल ही न दो और अपने काम में जुटे रहो।

वो जैसी आई थी, वैसी ही चली गई। यह कोई नई बात तो है नहीं। वो जैसी आती है, रोज वैसी ही जाती है। उससे कोई काम नहीं कराना चाहता। पाँच मिनट में पूरा होनेवाले काम को वह एक घंटा में करती है और इतनी गलतियाँ छोड़ देती है, जिन्हें सुधारने में आधा घंटा और लग जाता है। इसलिए कोई उससे काम नहीं कराना चाहता। इसलिए यही सच है कि वो जैसी आती है, वैसी ही- बिना कोई तिनका तोड़े चली जाती है।

तो उस दिन वह तीन क्या पौने तीन ही बजे चली गई। बाद में पता चला कि उसे रात को अपने पति और बच्चे को साथ लेकर संस्था के हॉलिडे होम जाना था-सैर सपाटे पर। अब हमें समझ आया कि पिछले कुछ दिनों से वह फोन पर इतनी बातें किस संदर्भ में करती थी। कभी इस मौसी तो कभी उस मौसी। कभी इस होटल तो कभी उस एजेंट के पास। जब देखो फोन पर उसकी चख-चख चलती ही रहती। पहले उसने हॉलीडे होम की बुकिंग कराई, फिर एजेंट से ट्रेन की टिकटें, फिर घूमने के लिए कपड़े -जूते- चप्पल आदि खरीदे। फिर ब्यूटीशियन के यहाँ जाकर अपना हुलिया सुधरवाया। और घंटों दफ्तर के फोन पर अपने दूर-दराज के रिश्तेदारों को अपने सैर पर जाने की खुशखबरी सुनाई । इस सब में थकान तो हो ही जाती है। इसलिए थकान उतारने के लिए उसका हॉलीडे होम जाना बनता है। हमें उससे ढेरों सहानुभूति हो आई।

बिटिया दफ्तर के काम बिलकुल नहीं करतीं। मायके आने पर बेटी को काम करना भी नहीं चाहिए। यहाँ भाई हैं, भौजाई हैं। कई नौकर-चाकर हैं। बिटिया मायके आती है आराम करने, ससुराल की थकान उतारने, सेहत सुधारने। बिटिया मायके आती है गप्पें मारने। इधर-उधऱ घूमने, घर-घर जाकर सबका हाल-चाल लेने। बच्चे हैं तो उनको बिटिया अपनी अम्मां के हवाले कर देती है। वही उनकी पॉटी कराए, वही नहलाए-धुलाए। और यदि बिटिया को पूर्व जन्म के पुण्य-प्रताप से कहीं अच्छा घर और वर मिल गया हो तो कहना ही क्या। फिर तो पूरा मायका उसका जन्म-जन्मान्तर का गुलाम हो जाता है।

इसलिए जब तक भारत में पैदा हों, हे ईश्वर बिटिया हों और सरकारी नौकरी में हों।

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स्वाइन फ्लू का डर

जब से स्वाइन फ्लू नाम की नई बला ईजाद हुई है हमारे दांपत्य जीवन में प्रेम का पुनर्जागरण हो चला है। अब कदम ब कदम पत्नी को हमारी सलामती की चिन्ता सताने लगी है। आज घर से निकल रहे थे तो उन्होंने नाक-मुँह ढाँपने वाली एक नकाब हमें थमाई और बोलीं कि इसे पहन लीजिए तो आप सुरक्षित रहेंगे। हम उनकी बात पूरी तरह समझे नहीं और मासूमियत से बोल बैठे- "हम कोई ऐश्वर्या राय थोड़े ही हैं जो शहर के शोहदे हमारा चेहरा देखते ही पीछे-पीछे चल पड़ेंगे। न ही ऐसे गोरे-चिट्टे हैं जो धूप से संवला जाएँगे।" पत्नी को हमारी ठिठोली अच्छी नहीं लगी। वे संजीदा हो आईं- "पूरी दुनिया में स्वाइन फ्लू फैला है। आपने देखा नहीं टीवी पर कैसे लोग नकाब लगाए फिर रहे हैं। कल दो घंटे लाइन में लगी रही, तब जाकर ये नकाब मिली है। अब आप अधिक बहस मत कीजिए और चुपचाप नकाब पहनकर ऑफिस जाइए।"

हमने नकाब ट्राई की। उसे लगाने के बाद आईने में देखा तो हमें अपने गाँव में गेहूँ की गहाई की याद हो आई। जब छोटे थे तो बैलों से गहाई होती थी। गहाई में जुते बैल फसल के दाने न खाएं, इसके लिए उनके मुँह पर नकाब कस दी जाती थी। अपनी भी हालत कुछ-कुछ वैसी ही हो गई थी। हमारे मन में एक सद् विचार आया- दुनिया भर में जो लोग हर समय चरते रहने के कारण मोटापा बढ़ाए घूम रहे हैं और मोटापा-जनित रोगों के कारण मरने के कगार पर पहुँच चुके हैं, उनकी पत्नियाँ या पति यदि उनको ऐसे ही जबरदस्ती नकाब पहना दें तो कितनी जिन्दगियाँ बच जाएँ!

खैर, शाम को जब लौटे तब तक हमारी नकाब बेकार हो चुकी थी। अब हमें एक और नयी नकाब की दरकार थी। ऐसा ही डॉक्टरों का मत था, टीवी पर भी यही बताया जा रहा था। जैसे कभी सावित्री ने सत्यवान को मौत के मुँह से वापस निकाला था, उसी तरह हमारी पत्नी भी हमें मौत के मुँह से निकालने पर आमादा थीं। वे हमारे लिए दूसरी नकाब लाने को बाहर निकलने ही वाली थीं कि हमने उन्हें रोक लिया- "घर के दीगर खर्चे काट कर तुम मेरे लिए नकाब दर नकाब खरीद रही हो, क्या यह उचित है? वैसे ही इतनी महँगाई है। अरहर की दाल देखो, चिकन से भी महँगी हो गई है और तुम हो कि नकाब के आगे कुछ सोच ही नहीं रहीं।.."

महँगाई की बात का पत्नी पर कुछ असर हुआ। वे हमारे सामने बैठ गईं और हमारी ओर सवालिया मुद्रा में देखने लगीं। जैसे हमने महँगाई का मुद्दा उठाकर उनकी पति-निष्ठा पर ही सवाल दाग दिया हो।

हमारे तरकश में अभी ढेरों तीर थे, जिन्हें हम एक-एक कर निकालने वाले थे- "अच्छा ये बताओ, स्वाइन फ्लू को अपने देश में आए कितने दिन हुए हैं?"

"हुए होंगे एक-दो महीने।" पत्नी ने अनमना-सा उत्तर दिया।

"एक-दो महीने भी नहीं हुए और हम उससे घबरा गए। क्या तुम जानती हो कि हम जिन बसों में आते-जाते हैं, उनमें सफर करने वाले ज्यादातर लोगों के मुँह से पायरिया की बास आती रहती है। पसीने से हमेशा तर ब तर रहने वाले उनके शरीर बदबू मारते रहते हैं। कोई हर दम नाक खोदता रहता है तो कोई हर समय पान-गुटखा, तम्बाकू-खैनी चबा-चबाकर इधर-उधर थूकता रहता है। ये सब सहकर भी हम जैसे सुरुचि-संपन्न लोग अभी तक जिन्दा बचे हैं या नहीं?" हम कहे जा रहे थे और पत्नी हमारे एक-एक शब्द पर घृणा के गटर में डूबती जा रही थीं।

"अब आप चुप भी करेंगे..?" पत्नी ने अरुचि से कहा।

"नहीं आज हम अपनी बात पूरी करना चाहते हैं...जरा सुन लो। सरकार ने सार्वजनिक रूप से बीड़ी-सिगरेट पीने पर रोक लगाने वाला कानून बना दिया है, किन्तु उसका पालन कोई नहीं करता। जिसे देखो धकाधक जहरीला धुआँ उगले जा रहा है। .. हमारे-तुम्हारे जैसे मासूम लोग इसी गंदगी में जीने को विवश हैं।"

"और सुनोगी? दगड़ू गोल-गप्पेवाले के आगे-पीछे भीड़ लगाए लोग कितने चाव से, चटकारे ले-लेकर, लार टपका-टपकाकर, गड़प-गड़प गोलगप्पे खाते हैं। कभी किसी ने जाकर देखा है कि ये गोलगप्पे पुराने शहर की किन गंदी गलियों में बनते हैं? वहीं नाली में मल-मूत्र बहता रहता है और बगल में गोलगप्पा निर्माण का काम होता रहता है। दगड़ू जिस हाथ से नाक साफ करता है, उसी को पानी में डुबाकर गोलगप्पा परोसता है। ...कोई मरा है आज तक दगड़ू के गोलगप्पे खाकर?"

पत्नी को लगा कि हम उनके गोलगप्पा-प्रेम पर कटाक्ष कर रहे हैं। वह कुछ बोलतीं इससे पहले ही हमने अगला गोला दाग दिया- "जिस लिफ्ट और सीढ़ी से हम चौथी मंजिल तक रोज आते-जाते हैं, कभी उस लिफ्ट या सीढ़ी की दीवारें देखीं हैं? दुनिया में उससे गंदी जगह की कल्पना करना भी कठिन है।"

पत्नी हमारी बात से सहमत दिखीं तो हमारा उत्साह और भी बढ़ गया- "और बताएं? ..अभी कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ा कि एक बड़ी सरकारी कॉलोनी में पानी की ऊँची टंकी की सफाई करते समय उसमें एक नर कंकाल मिला। उसका सारा माँस-मज्जा पानी में घुलकर कब का लोगों के पेट में पहुँच चुका था। ..कोई मरा ऐसा पानी पीकर?"

पत्नी ने बड़ी मुश्किल से अपनी उबकाई रोकी। हमें लगा कि देश के आजकल के हालात पर हमने कुछ ज्यादा ही तब्सरा कर डाला। इसलिए हमने अपनी वार्ता की दिशा बदली- "अपने देश में जातिवाद, संप्रदायवाद, प्रांतवाद, भाषावाद.. यानी जो चीजें हम-तुम सोच भी नहीं सकते, उन सब को वाद-विवाद की जड़ बनाकर हर समय वितंडावाद मचा रहता है। लोग आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। पूरा समाज अपनी सारी ऊर्जा ऐसे ही बेसिर-पैर के कामों में नष्ट करता रहता है।.. इसके बावजूद हम अभी तक जिन्दा हैं कि नहीं?"

पत्नी को बड़ा संतोष हुआ कि इतने विकट समाज में हम जैसे भले लोग, अपनी राह जानेवाले सीधे-सरल लोग अभी जिन्दा बचे हुए हैं। उन्होंने मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया और सामने लगी बजरंग बली की फोटो की ओर देखकर हाथ जोड़ लिए।

अब हमें पूरा यकीन हो चला कि अब हम अपनी बात की क्रक्स तक पहुँच सकते हैं- "क्या तुम जानती हो कि अपने देश में सौ में से छब्बीस लोग ऐसे हैं जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं। उनको खाने के लिए दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं होती। स्वाइन फ्लू उनका क्या बिगाड़ लेगा? वे तो बेचारे खुद स्वाइन यानी सुअर की तरह जीते हैं। न रहने को साफ-सुथरा घर, न शौच जाने की समुचित व्यवस्था, न खाने को भोजन न पहनने को कपड़े। दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी ऐसे ही जीती है।"

पत्नी की आँखें नम हो आईं। हमें भूख से बिलबिलाते मियाँ चार्ली चैप्लिन याद आ गए, जो अपना चमड़े का जूता उबालकर खाने की तैयारी में हैं। अगले दिन पत्नी ने फिर एक नयी नकाब हमें थमा दी। लेकिन हम जानते हैं कि अबकी यह नकाब स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए नहीं दी गई है। वे चाहती हैं कि हम अपना मुँह बंद रखें, क्योंकि सच बोलने के बजाय चुप रहना इस देश में सबसे निरापद है और सत्य संभाषण करके जान गँवाने की संभावना स्वाइन फ्लू के संक्रमण से मरने की तुलना में लाखों गुना अधिक है।

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क से कछुआ ख से खरगोश

कई दशक बाद सूखा पड़ा और तालाब की तलहटी में दरारें पड़ गईं तो कछुआ जंगल में निकल आया। इस उम्मीद में कि हो सकता है कहीं जंगल के किसी कोने में कोई जलाशय अभी भरा हो, या नदी में ही अभी पानी बह रहा हो। रास्ते में उसे अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी खरगोश का लकड़पोता मिल गया। उसने कछुआ दादा को हिकारत से देखा और चलताऊ सा प्रणाम किया- "कछुआ दादा, प्रणाम। और कैसे हैं?"

"खुश रहो बच्चे। मैं तो ठीक हूँ। तुम बताओ? और सब घर-परिवार में कुशल मंगल?" कछुए ने बड़े शान्त स्वर में कहा।

"हाँ सब ठीक हैं.. बाकी तो आप जानते ही हैं.. छोटा-मोटा रोग तो लगा ही रहता है" खरगोश बच्चा ने कहा और वहीं पास में उगी मुलायम घास कुतरने लगा। फिर उसे न जाने क्या सूझी कि वह बरसों पुराना प्रसंग ले बैठा- "अच्छा, कछुआ दादा! आप क्या सचमुच मेरे पूर्वजों से दौड़ जीत गए थे?"

"हाँ, बिलकुल। इसमें तुम्हें शक है क्या?" कछुए ने बेबाकी से उत्तर दिया।

"नहीं। शक तो नहीं है। लेकिन आप तो इतने दिन से अभी तक जिन्दा हैं, जबकि आपके समय के और उनके बाद के भी मेरे तो कितने ही पूर्वज स्वर्ग सिधार गए। हमारी कितनी पुश्तें गुजर गईं और आप हैं कि अभी जिए जा रहे हैं। आपकी दीर्घायु का क्या राज है?" खरगोश ने मासूमियत से पूछा।

"देखो, मैं हूँ ठंडे खून का प्राणी। धीरे-धीरे चलता हूँ। धीरे-धीरे साँस लेता हूँ। मुझे कोई काम करने की जल्दी नहीं है। इसलिए मेरा सारा तंत्र धीरे-धीरे अपनी क्रियाएँ करता है। उसमें न घिसावट होती है, न कोई रोग जल्दी लगता है। हार्ट अटैक वगैरह का तो सवाल ही नहीं।" कछुआ दादा ने तफसील से बात बताई।

"तो क्या हमारी कौम के लोग अपनी तेजी के कारण जल्दी मर जाते हैं?"

"और नहीं तो क्या? जल्दी-जल्दी सारा काम करने के कारण तुम्हारी कौम के लोगों के दिल की धड़कन तेज हो जाती है, उनके मस्तिष्क और दिल पर बहुत दबाव रहता है। काम चाहे जल्दी निपटा लेते हों लेकिन शरीर के अंगों पर उसका असर भी पड़ता है। और ज्यादा फुदक-फुदक कर चलने-फिरने के कारण तुम लोग सबकी निगाह में भी रहते हो। शेर-चीते हों या कुत्ते और लोमड़ी। सबकी निगाह तुम्हारे ऊपर रहती है। जरा सा मौका मिला नहीं कि वे लपक लेते हैं।"

"बात तो आपकी ठीक है दादाजी। अभी कुछ देर पहले मैं ही भेड़िये का निवाला बनते-बनते बचा।"

"इधर अपन को देखो। धीरे-धीरे खरामा-खरामा चलते हैं। कहीं पहुँचने की कोई जल्दी नहीं। सुस्त रफ्तारी के कारण किसी की निगाह में जल्दी नहीं आते। यदि इधर कोई खतरनाक जानवर आ भी जाए तो धीरे से अपने चारों पैर और मुंडी खोल में समेट लेते हैं और पड़ रहते हैं चुपचाप। जानवर सोचता है कि कोई चिकना पत्थर या चट्टान पड़ी है। वे हमारी ओर ध्यान भी नहीं देते। हाँ कई बार कुत्ते जरूर टांग उठाकर हमारी पीठ गंदी कर जाते हैं।.. लेकिन ये तो दुनिया है। देखो। ये सब तो लगा ही रहता है।" कछुए ने दार्शनिक अंदाज में कहा।

"ये बात आपकी बिलकुल सही है। आराम से रहो और कोई जटिल समस्या सामने आ जाए तो अपने खोल में दुबक जाओ। सारी दुनिया से अपने आपको काट लो। अधिक से अधिक क्या होगा? कोई बिगड़ा दिल जानवर अपनी नित्य-क्रिया ही तो कर जाएगा पीठ पर। किन्तु जान तो बची रहेगी।" खरगोश ने कछुआ दादा की हाँ में हाँ मिलाई।

कछुआ समझ रहा था कि खरगोश-बच्चा उसकी खिंचाई कर रहा है, लेकिन किसी बात पर उत्तेजित होना तो उसे आता ही नहीं था। इसलिए वह धीरे से बोला-"अब तुम चाहे जो समझो बच्चे। अपना तो यही जीवन-दर्शन है।"

"सुना है, आजकल आपकी प्रजाति के जीवों की इन्सानी घरों में बड़ी पूछ है। लोग छोटे-छोटे कछुए अपने घरों में पालने लगे हैं।" खरगोश ने कछुए से जिज्ञासा की।

"चीन आदि देशों में कछुए को बड़ा शुभ माना जाता है। फेंग-शुई में हमारा बड़ा महत्त्व है। चीनी लोग मानते हैं कि जिस घर में कछुआ रहता है वहाँ समृद्धि और सुख-शान्ति रहती है। उस घर के लोग दीर्घायु होते हैं।" कछुए ने अपनी सीमित जानकारी का पिटारा खोला।

"बात सच्ची है। कछुआ रखने वाले लोगों पर कछुए के जीवनदर्शन का कुछ तो असर पड़ता ही होगा। यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को लड़ने-झगड़ने और किसी तरह के वाद-विवाद का मौका ही न दे, अपने काम से काम रखे और बाहरी दुनिया से स्वयं को बिलकुल अछूता रखे तो उसके ऊपर भला कौन-सी आपदा आ सकती है? न उसका रक्तचाप बढ़ेगा, न कोई संक्रमण होगा, न दिल की कोई बीमारी होगी, न मस्तिष्क की। ऐसे घर में सुख-शान्ति तो रहेगी ही।" खरगोश अब गंभीर हो चला था।

"ऐसा नहीं है कि इन्सान तुम्हारी जीवन-शैली का अनुसरण नहीं करते। सच्चाई तो यह है कि हर इन्सान पहले तुम्हारी तरह बड़ा सरपट दौड़ता है। बचपन और जवानी में उसकी गति देखने लायक होती है। फटाफट एक के बाद दूसरी उपलब्धि हासिल करता है। लेकिन जैसे ही उसे कोई मुकाम हासिल हो जाता है, वह अपने चारों ओर एक मोटा खोल बना लेता है और फिर उसी खोल में घुसकर बिलकुल हमारी जीवन-शैली अपना लेता है। फिर वह किसी दूसरे के बारे में सोचता भी नहीं। उसे अपने अलावा और किसी से कोई मतलब नहीं रह जाता। अपने खोल में वह होता है और उसके निजी स्वार्थ होते हैं। ...मस्त राम मस्ती में आग लगे बस्ती में।" कछुए ने अपनी बात जारी रखी।

"हाँ, ये बात तो सही है। " खरगोश बच्चा चरर-चरर, कुतुर-कुतुर घास चरने में व्यस्त हो गया और वृद्ध कछुआ पानी के नये स्रोत की तलाश में आगे बढ़ चला।

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ईमानदारी से कहूँ तो..

हमारे एक पड़ोसी हैं जो हर बात पर कहते हैं- ईमानदारी से कहूँ तो..। यानी ये उनका तकिया कलाम है। उनका यह तकिया कलाम सुन-सुनकर जब हमारे कान पक गए तो एक दिन हमने उनसे जिरह करने की ठान ली। फिर क्या था! उस दिन पहली ही मुलाकात में जैसे ही वे बोले- ईमानदारी से कहूँ तो, कि मैंने उन्हें दबोच लिया। "क्या यार, भाई जी! ईमानदारी से कहूँ तो ..ईमानदारी से कहूँ तो! आपको ईमानदारी कहीं मिली है? कहीं देखा है आपने ईमानदारी को? पहचानते हैं उसे? तो आप उससे कहने कहाँ जाएँगे? कैसे पहचानेंगे? बताइए कहाँ रहती है ईमानदारी? उसका पता-ठिकाना कुछ मालूम है? या ऐसे ही ख्वाहिश लिए जीते हैं कि ईमानदारी से कहूँ तो..?"

पड़ोसी बेचारे सकते में आ गए। उन्होंने मुझ जैसे शान्त-चित्त व्यक्ति से ऐसी आक्रामक प्रतिक्रिया और उससे भी धांसू प्रश्नों की उम्मीद ही नहीं की थी। अचानक हुई पृच्छाओं की इस बौछार से वे आतंकित हो उठे। सिर खुजलाते जाते और सोचते-सोचते बोलते जाते- "ईमानदारी कहाँ मिलेगी? किससे पूछूँ? अव्वल तो लोग यही नहीं बूझ पाएँगे कि ईमानदारी होती क्या बला है? कई सदियों से ऐसी किसी शै का नाम तक सुनने में नहीं आया है। एक बार चीनी विद्वान फाह् यान या फिर ह्वेन सांग ने उसे भारत में देखा था। उन दिनों इफरात थी उसकी। इतनी प्रचुर मात्रा में मिलती थी कि लोग घरों पर ताले तक नहीं लगाते थे। चारों ओर ईमानदारी ऐसे दिखती थी जैसे आजकल लोगों की जेब में मोबाइल दिखते हैं। फिर अचानक कलिकाल डिक्लेयर हो गया और अपमान के डर से या जाने किस कारणवश ईमानदारी ऐसे ही लुप्त हो गई जैसे कभी धरती से डायनासोर लुप्त हो गये थे। बाबा तुलसीदास के समय में भी उसका कहीं अता-पता नहीं था। ईमानदारी के न रहने से चोरों-उचक्कों का बोलबाला हो चला था। इसलिए बाबाजी ने तो साफ-साफ लिख भी दिया- भूमि चोर भूप भए। पता नहीं क्या गड़बड़ झाला हो गया? या तो जमीन चुरानेवाले राजा बन गए या राजा लोग जमीन चुराने का कारोबार करने लगे। लेकिन ऐसा इसलिए हुआ कि ईमानदारी सिरे से ही गायब हो गई थी।"

पड़ोसी का असमंजस देखकर हमें खुद पर कोफ्त हुई कि ये हमने उन्हें किस आफत में डाल दिया। बेचारे बेईमानी के बजबजाते गटर में आकंठ डूबा होने के बावज़ूद ईमानदारी को सहज ही पा लेने का सपना देखते हैं तो देखते रहें। यदि उनके सौभाग्य से ईमानदारी कहीं टकरा गई तो कह देंगे उससे जो भी कहना होगा। अब हमें क्या हक था कि उनसे सीधे-सीधे पूछ बैठे कि कहीं देखी है ईमानदारी? प्रायश्चित के तौर पर मन हुआ कि ईमानदारी को खोजने में उनकी थोड़ी मदद कर दें। लिहाजा हम भी जुट गए ईमानदारी के अनुसंधान में। जैसे मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक होती है, वैसे ही अपनी बुद्धि घूम-फिरकर साहित्य में ही जाकर अटक जाती है। उसी को खोदने-कुरेदने में पिल पड़े। तभी हमें कुछ याद आया, और हम बोलने लगे-

"अरे भाई जी! हमें लगता है कि पिछली सदी में भी ईमानदारी कहीं से प्रकट हो गई थी। हमारे राष्ट्र-पिता महात्मा गाँधी के साथ उसके रहने के भी प्रमाण मिलते हैं। इसीलिए उनका इतना मान था। सारी दुनिया उनका लोहा मानती थी। उनके पास ईमानदारी थी, इसके पक्के प्रमाण हैं।" पड़ोसी सज्जन को कुछ आशा बंधी। उनका कुम्हलाया मुख कुछ खिल आया। हमें अच्छा लगा। ईमानदारी से कुछ कहने की इच्छा रखनेवाला आदमी जीवित बचा रहे यही काफी है। फिर वह बदस्तूर मुस्कुराए भी, यह तो बिलकुल ही दुर्लभ घटना है। बिल्कुल ऐसे जैसे हेली के धूमकेतु के पृथ्वी की ओर आने की घटना। लेकिन दूसरे ही क्षण वे गहन उदासी में डूब गए- "अमां यार! गाँधीजी के पास ईमानदारी रही होगी तो रही होगी। उससे हमें क्या लाभ? हमारी तात्कालिक समस्या तो यह है कि अब वो कहाँ है? कोई बता दे तो हम जाके उससे कहें।"

हम फिर इतिहास में गोता लगाने लगे। वहीं से, गहरे ही गहरे, कभी साहित्य में भी हो आते। कभी इतिहास तो कभी साहित्य। हमारी मुश्किल यह थी कि इतिहास भी हमें साहित्य जैसा ही लगता था। हर इतिहासकार अपने हिसाब से चीजों की मीमांसा करता है। एक ही ढाँचे को कोई मस्जिद लिखता है तो कोई मंदिर। कोई-कोई उसी को बौद्ध विहार लिखता है। अजीब उलझन थी। साहित्य और इतिहास की इसी उठा-पटक में ईमानदारी न जाने कब शहीद हो गई- पता ही नहीं चला। तभी हमारे दिमाग की बत्ती जल गई और हमने उछलकर कहा- "अरे भाईजी! सुनिए! वो पिछली सदी में एक कवि हुए हैं- भवानी प्रसाद मिश्र। कुछ लोग उनको भवानी भाई भी कहते थे।"

पड़ोसी को आशा की किरण दिखी। वे हमारे एकदम करीब आ गए और लगभग मनुहार करते हुए बोले- "हाँ-हाँ! उनके घर में रहती है क्या ईमानदारी? या उन्होंने कोई नक्शा-वक्शा छोड़ा है ईमानदारी के गाँव का?"

हमें पड़ोसी के भोलेपन पर ढेर सारा प्यार उमड़ आया। कवि और नक्शा? हाँ "नक्शा" शब्द का क निकाल दो तो सत्य के कुछ निकट पहुँचा जा सकता है। लेकिन यह कहकर हम पड़ोसी महोदय के मन में कवियों के लिए उमड़े सद्भावों का गला नहीं घोटना चाहते थे। इसलिए हमने तुरन्त उनकी पृच्छा का समाधान कर देना ही उचित समझा- "नहीं भाईजी! ईमानदारी का नक्शा तो वो नहीं छोड़ गए। लेकिन अपनी "गीत फरोश" शीर्षक कविता में उन्होंने ये जरूर लिखा था कि- लोगों ने तो बेच डाले ईमान।"

"धत् तेरे की।" पड़ोसी सज्जन ने निराशा में पैर पटकते हुए कहा। "बेच डाले ईमान! अरे तो किसी ने खरीदा तो होगा, यार ईमान और ईमानदारी को।"

ईमानदारी की खोज में बेतरह परेशान और लगभग उन्मत्त हो चुके अपने उन पड़ोसी महोदय के सामने से खिसक लेने में ही हमें समझदारी लगी। हम वहाँ से पतली गली से निकल लिए, लेकिन धीरे-से एक मित्रवत समझाइश देकर- "भाईजी, ईमानदारी को खोजने में अपना टाइम खोटा करने का कोई लाभ नहीं होगा। अब तो ईमानदारी को भूल जाने में ही समझदारी है।"

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चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ

रचनाकार में यह व्यंग्य यहाँ पढ़ें - चलो थोड़ा भ्रष्ट हो जाएँ

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अपना घर

अब हम अपने घर में आ गए हैं। झिलमिल सितारों के आँगन और रिमझिम बरसते सावन वाले अपने घर में। कितना सुन्दर सपना-अपना घर। किसी ने कहीं कहा है- मूर्ख लोग मकान बनवाते हैं, समझदार लोग उनमें रहते हैं। प्रायः हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति इस कहावत से वाकिफ है। फिर भी प्रायः हर पढ़ा-लिखा और अक्सर अनपढ़ व्यक्ति भी, एक अदद मकान बनवाने की ख्वाहिश अपने सीने में दबाए रहता है। मकान न सही, फ्लैट ही सही। चुनांचे ये गुनाहे बेलज्जत करने की इच्छा हर किसी में होती है। इस गुनाहे बेलज्जत में लोगों की मदद करने के लिए सरकार भी खूब नीतियाँ और प्राधिकरण व परिषदें बनाती है। बैंक योजनाएं बनाते हैं। लाखों लोगों का सरकारी अमला इसके लिए तैनात है, जो अपने-अपने तरीके से आम आदमी के इस सपने को पूरा करने की प्रक्रिया में ढेरों पैसे बनाता है। जैसे ऊपर वाले यानी सबके एक-अकेले मालिक तक पहुँचने के मार्ग जुदा-जुदा हैं, उसी तरह दुनिया के सभी संपत्ति-कामी इन्सानों को मूर्ख बनाने के रास्ते और कारक अलग-अलग हैं। पर कुल मिलाकर सबका मकसद एक ही है- संपत्ति-कामी व्यक्ति को मूर्ख बनाना।

यूं तो मूर्खता की शुरुआत, बकौल कहावतकार उसी क्षण हो जाती है, जिस क्षण व्यक्ति के मन में अपनी खुद की संपत्ति हस्तगत करने की तमन्ना जन्म लेती है। आपने मकान की हसरत का बीजारोपण मन में होने दिया कि आपकी मूर्खता का बीज-वपन हो गया। और जैसे ही आप इस विचार को किसी के सामने प्रकट करते हैं आपकी मूर्खता में लमहा-लमहा कई-कई गुना इजाफा करने वाले आपके इर्द-गिर्द जमा होने लगते हैं।

मसलन आपने मकान की हसरत किसी दलाल से शेयर की तो दलाल को आप लाखों रुपये की चलती-फिरती तिजोरी नज़र आने लगेंगे। वह चाहेगा कि किसी तरह आप उसके चंगुल में फँस जाएँ और वह आपके खीसे में से नोटों की गड्डियाँ खींचता रहे। चाहे उसके पास किसी बिकाऊ प्लॉट, मकान या फ्लैट की जानकारी हो या न हो, लेकिन क्योंकि आपके मन में अपनी खुद की संपत्ति बनाने की हसरत पैदा हो गई है, इसलिए आप दलाल के बड़े काम की आसामी हैं। अपन कई प्रापर्टी डीलरों के पास गए हैं और उन सभी को अपन ने बहुत बड़ा कर्मयोगी व प्रकांड विद्वान पाया है। लगभग हर डीलर के दफ्तर में संपत्ति-कामी ग्राहक को एक पोस्टर चस्पा दिखेगा, जिसपर गीता का यह दिव्य ज्ञान लिखा रहता है- क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो, क्या लाए थे जो खो दिया? सच्ची डीलरजी! आपने बिलकुल बजा फरमाया। हम तो बस ढाई-तीन किलो के लोथड़े के रूप में पैदा हुए थे और एक दिन अस्थि-चर्ममय खंखड़ बनकर सारी दुनिया को टाटा-बाय-बाय करके चले जाएँगे। न कुछ लाए, न ले जाएँगे। हम जानते हैं कि कू-ए-यार में दो गज जमीन भी हमें मयस्सर न होगी। फिर भी एक हूक है जो कलेजे में बार-बार उठती हैः हाय ! मेरा भी एक ऐसा आशियाना हो। एक अदद मकान, एक अदद फ्लैट- जिसे मैं अपना कह सकूं। जहाँ पायल की रुनझुन हो, चूडि़यों की मधुर खनखनाहट हो। पूजा का शंख बजे, घंटे-घडि़याल गूँजें। अल्पना बने, रंगोली सजे। बिजली के बल्बों की लड़ झूले। दीपमाला सजे, फुलझडि़याँ चलें। जिसके दरवाजों पर चाइनीज विंड चाइम चुनुन-मुनुन करे। छत से झूमर लटके। जिसके लक-दक फर्श पर हमारी बेटियों-बहुओं के महावर लगे पाँवों की थाप पड़े। बच्चों की किलकारियाँ गूँजें। जहाँ से बेटी की डोली उठे। जहाँ बहू का कोहबर सजे।.. और एक दिन जहाँ से इस रंग-बिरंगी, राग-विराग से सजी खूबसूरत दुनिया, इस शाश्वत मृत्यु-लोक के आशिक का जनाजा बड़ी धूम-धाम से निकले। हम कुछ नहीं लाए, न कुछ ले जाएंगे.. यहाँ तक कि हमारी खुद का मकान होने की तमन्ना और उसकी तामीर, दोनों यहीं रह जाएँगे। फिर भी दोस्त, हमें एक अदद प्लॉट, एक अदद मकान, एक अदद फ्लैट दिलवा दो। वीतरागी दलाल हमारी इस दीवानगी की खूब मोटी कीमत वसूलता है। हम उसके बनाए खूब मूर्ख बनते हैं। उसके हाथों ऐसे ही नाचते हैं जैसे मदारी के हाथों बंदर। माया के बस भयो गोसाईं। बंध्यो कीर-मर्कट की नाईं।

यदि प्राधिकरण या आवास परिषद् से संपत्ति खरीद रहे हों तो वहाँ के बाबू, सुपरवाइजर और अन्य अधिकारी हमारी मूर्खता की मद को और संवारते-निखारते हैं। जहाँ एक लाख रुपये का काम होता है, वहाँ दो लाख वसूल लेते हैं। दौड़ाते हैं सो अलग। ये शहर के नए राजा लोग हैं, जो जागीरें बाँटने का काम करते हैं। जितनी बड़ी जागीर उतना बड़ा इनका चढ़ावा। अंतर केवल इतना आया है कि पहले जागीरें कई-कई हजार एकड़ की होती थीं, अब जागीरों का आकार सिकुड़कर फुट, गज और मीटर तक सीमित हो गया है। लेकिन इससे क्या होता है! जागीर तो जागीर है। पाँच सौ वर्ग फुट की हो या पाँच हजार कोस की। धरती पर न सही, उससे पचास फुट ऊपर ही सही। इस ब्रह्मांड में इतनी जगह तो हमारे नाम है। मृत्यु लोक में अमरत्व पाने के लिए इतना काफी है।

यदि संपत्ति में ड्राफ्ट्समैन, इंजीनियर आदि की कोई भूमिका है, तो वे भी आपकी मूर्खता में कुछ न कुछ इजाफा करके थोड़ा-सा पुण्य और ढेर सारा धन जरूर अर्जित करेंगे। इसके बाद वे ढेरों सप्लायर हैं, जिनका कंधा पाए बिना आपकी इस हसरत भरी टिकठी का निस्तार नहीं। फिर वे चाहे ईंट के दलाल हों, चाहे बालू-सीमेंट, चाहे बजरी-मौरंग के। लेबर कॉण्ट्रैक्टर, मजदूर और मिस्त्री, बढ़ई और प्लंबर, बिजली वाला और टाइल-पत्थर लगाने वाला। सब एक से एक पहुँचे हुए संत होते हैं। वे सब आपके ज्ञान-भंडार में वृद्धि करेंगे और आपको मूर्ख से मूर्खतर, और मूर्खतर और अंततः मूर्खतम प्राणी सिद्ध करके ही दम लेंगे।

मजे की बात यह है कि इन सबकी निगाह में आप इस लोक के प्राणी ही नहीं हैं। ये सब आपको चन्द्र लोक अथवा मंगल ग्रह से आया हुआ कोई एलीन मानते हैं। और इस नाते उन्हें पूरा विश्वास रहता है कि आपको इस धरती तथा खासकर देश के इस भू-भाग में प्रचलित वस्तुओं व सेवाओं के बाजार मूल्य का बिलकुल भी ज्ञान नहीं है। संपत्ति-कामी आसामी जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा और परिष्कृत अभिरुचि का हो, उनकी निगाह में वह उतना ही बड़ा बेवकूफ, बुद्धू और मूर्ख होता है। इसलिए इस श्रेणी के पहुँचे हुए संतों से डील करते समय संपत्ति-कामी के लिए सबसे प्रथम करणीय यही काम है कि अपना ज्ञान-व्यान एक ओर रख दो, और जड़-बुद्धि, मजदूर की तरह बनकर रहो। जैसे विष ही विष की औषधि है, वैसे ही जड़ता की काट जड़ता है। मजदूर-मिस्त्री से पार पाना है तो उन्हीं की शैली अपना लो। उनके साथ पान-सुरती खाओ, जगह-जगह पिचिर-पिचिर थूको, उन्हें अपने सगे भाई और परम हितू की तरह ट्रीट करो और उन्हीं की शैली में बात-बात पर कुकुर झौं-झौं करो। कुछ लोगों को यह बहुत मूर्खता-पूर्ण सलाह लग सकती है। लेकिन सच मानिए, संपत्ति बनाने की प्रक्रिया में यह सब करना ही पड़ता है। यही तो सापेक्षता का सिद्धान्त है। इसी को बिहारी ने कहा- समै-समै सुन्दर सबै।

अपने शास्त्रों और मिथकों में उल्लू को लक्ष्मी जी की सवारी कहा गया है। और उल्लू अपने यहाँ मूर्खता की पराकाष्ठा है। यदि आप चाहते हैं कि अधिक से अधिक संपत्ति आपके पास आ जाए, आपका मकान अच्छे से अच्छा हो, बढि़या से बढि़या फ्लैट आपका बन जाए तो धीरे से उल्लू बन जाइए। जितने बड़े आकार के उल्लू आप बनेंगे, उतनी बड़ी मात्रा में लक्ष्मी मैया आपकी सवारी करेंगी। सीधा-सा फंडा है। आप छोटे उल्लू हों, और बड़े आकार वाली मइया आप पर बैठ जाएं तो आप चरमराकर मर ही न जाएँगे! जिन्हें हमारी इस प्रपत्ति पर यकीन न हो वे लोग जरा अपनी समझदारी के अंधे कुएँ से बाहर निकलें और दीदे फाड़कर देखें कि अपने देश में कैसे-कैसे बड़े-बड़े उल्लुओं पर लक्ष्मी मइया मेहरबान हैं।

लिहाजा संपत्ति पाने के लिए हम कदम दर कदम मूर्ख बने, और मूर्ख बने और निरंतर बनते रहे। जिससे जितना बन सका, उसने हमें उतना मूर्ख बनाया। कभी जाने और कभी अनजाने हम मूर्ख बनते रहे। हमारे पास कोई और विकल्प भी तो नहीं था। ज्यादा समझदार बनते तो संपत्ति हाथ नहीं आती। अंततः जब हमारी मूर्खता की इन्तिहा हो गई तो संपत्ति हमारे हाथ लग गई। इधर हम सरापा, पूरे के पूरे उल्लू बने, उधर लक्ष्मी मैया ने हमारी सवारी गाँठ ली। और एक बार संपत्ति हमारी हो गई तो फिर किसकी मजाल जो हमें मूर्ख कहता। संपत्तिवान और समृद्धिशाली व्यक्ति को मूर्ख कहने की किसकी मजाल! तिसपर अब हम अपने घर में रह रहे हैं। यानी मूर्ख तो हम बने, किन्तु अब समझदार भी हमीं हैं। ये पहुँचे हुए संतों की उलटबांसियाँ हैं, जिनको समझने के लिए पहुँचा हुआ संत होना पड़ेगा।

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कार्यालय में कर्मयोग

गीता का कर्मयोग बड़े काम की चीज है। हालांकि महाभारत की रचना हजारों वर्ष पूर्व उस समय हुई, जब इन्सान के जीवन में अधिक मारा-मारी नहीं थी। जीवन सरल था। पता नहीं उस समय इस दर्शन की कितनी प्रासंगिकता थी। किन्तु आज तो यह बहुत ही प्रासंगिक प्रतीत होता है। कर्मयोग के प्रवर्तक भगवान कृष्ण बड़े दूरंदेश थे। उस सीमित समस्याओं वाले समाज को कर्मयोग का जो मंत्र उन्होंने दिया, वह आज के इस समस्या-बहुल समाज में भी बिलकुल फिट बैठता है। बहुत-से लोगों को हमारी यह प्रपत्ति बेसिर-पैर का राग लग रही होगी, किन्तु सच्चाई यही है।

चूंकि अपनी दृष्टि बहुत दूर तक नहीं जाती (संजय की भांति-दृष्टि परास से परे का तो खैर कहना ही क्या) इसलिए अपन वही बात करेंगे, जिसके विषय में अपने को कोई भ्रांति न हो। हम एक कार्यालय में काम करते हैं और यहाँ कर्मयोग की विभिन्न अवधारणाओं को नित्य ही फलित होते देखते हैं।

उदाहरण के लिए अनासक्त कर्म को ही ले लें, जो कहता है कि कर्म किए जाओ और फल की चिन्ता न करो। कर्म करना ही तुम्हारे वश में है, फल तुम्हारे वश में नहीं। देसी भाषा में कहें तो नेकी कर और कुएँ में डाल। यदि हम अपने कार्यालयीन जीवन में इस सिद्धान्त का पालन करें तो कार्यालयीन जीवन सचमुच ही बहुत आसान हो जाए। कार्यालयों में काम करनेवाले अधिकतर लोग प्रायः इस तरह की शिकायत करते हैं कि बॉस को हमारे काम की कीमत नहीं मालूम। हम जान देकर काम करते हैं और कोई हमारे काम की क़द्र नहीं करता। कई बार मातहत लोग खूब मशक्कत करके मसविदे तैयार करते हैं और सोचते हैं कि हमने एक मास्टरपीस मसविदा बनाया है, जिसका अनुमोदन होना तो बिलकुल लाजिमी है। दुनिया की कोई शै नहीं जो इस मसविदे को यथावत न स्वीकार करे। लेकिन अक्सर होता इसके बिलकुल उलट है। ऊपर वाला अपने मातहत के सारे किए धरे पर पानी फेर कर फरमान जारी कर देता है- जाइए दूसरा ड्राफ्ट बना लाइए। या फिर उसे ठंडे बस्ते में डाल देता है। मातहत का दिल टूट जाता है। उसने तो अपनी सारी मेधा, सारी योग्यता इस काम में झोंक दी थी। अपनी ओर से सर्वोत्तम प्रयास किया था। गीता में प्रतिपादित सिद्धान्त- योगः कर्मसु कौशलम्, यानी कौशलपूर्वक कर्म करना ही योग है, का अनुपालन करते हुए उसने अपने काम को पूरी तन्मयता व मनोयोग से निष्पन्न किया था। ज़ाहिर है उसे अपने कर्तृत्व से बड़ी उम्मीदें थीं। किन्तु बॉस ने उसे सिरे से खारिज़ करके जैसे दिल ही तोड़ दिया।

जिसने काम किया है, वह अपने किए हुए काम के प्रति आसक्त है। उसे अपने किए से ममता है। वह चाहता है कि मैंने जो किया उसे हर जगह पहचान मिले। उसके ही आधार पर शेष सारा काम आगे बढ़े। अपने किए हुए के प्रति यह गहरी आसक्ति ही उसके दुख का कारण है। होना यह चाहिए कि वह अपना काम करके आगे बढ़ा दे और फिर आगे का निर्णय आगे वाले पर छोड़ दे- तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा! होता इसके विपरीत है। हम सोचते हैं कि जैसा हमने प्रस्तावित किया है, या जैसा हम चाहते हैं या जिस दिशा में हमने काम को आगे बढ़ाया है, बस आगे वाले सब लोग वैसा ही करते जाएँ। यह तो ऐसा ही हुआ कि ऊपर वाले के विषय में हम मान लें कि उनका स्वयं का कोई व्यक्तित्व ही नहीं है। जो हैं सो हमीं हैं। हम जैसा पसंद करेंगे वैसा ही सबको रुचेगा। सामान्यतया वास्तविक जीवन में ऐसा होता नहीं कि जो तुमको हो, पसंद वही बात कहेंगे। हर कोई अपनी काबिलियत दिखाना चाहता है, अपने को दूसरे से बेहतर सिद्ध करना चाहता है। हम लोग, खासकर निचले स्तर पर कार्यरत लोग गीता का कर्मयोग अपना लें तो बॉस से मिलनेवाली मानसिक व्यथा न झेलनी पड़े।

दरअसल दूसरों पर नियंत्रण करने की दुर्दमनीय इच्छा ही हमारे दुख का कारण है। हम चाहते हैं कि दूसरे लोग वैसा ही आचरण करें जैसा हम कहें। कई बार तो हम अपने दिल की बात खुल कर कहते भी नहीं और फिर भी यह चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारे मनमाफिक काम करें। वैसा करें जैसा हमारे दिल में है। इतने अंतर्यामी तो शायद स्वयं नारायण भी न हों। हम मंदिर जाते हैं तो वहाँ आनेवाले स्त्रचú-पुरुषों, लड़के-लड़कियों, वहाँ के समग्र परिवेश, स्वयं भगवान के विग्रह आदि के विषय में हमारे मन में तरह-तरह के विचार, सुविचार और कुविचार आते हैं। फिर भी प्रकट में हम हाथ जोड़े भगवान को ब्लफ करते रहते हैं। यही सोचते हैं कि हमारे मन में जो चल रहा है, भगवान उससे अनभिज्ञ हैं। इसके लिए हिन्दी में एक मुहावरा है- मुँह में राम बगल में छूरी। एक और मुहावरा है- बगुला भगत। यानी मौका मिले तो हम भगवान से भी छल कर लें और बोल-बोलकर उनकी चापलूसी करते रहें। और एक ओर हमारी यह अपेक्षा कि दूसरे लोग हमारे बिना हमारे मन की बात जान लें और बिना बताए वह काम करें जो हम चाहते हैं।

इसके विपरीत गीता का कर्मयोग कहता है कि आप किसी से कोई अपेक्षा करें ही नहीं। अपेक्षा करना ही सारे फ़साद की जड़ है। निरपेक्ष भाव से अपना काम किए जाइए- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। काम पर ही अपना अधिकार है, फल पर नहीं।

सच कहें तो यह बहुत कठिन है। भौतिकी के सिद्धान्तों के अनुसार, जब किसी वस्तु पर बाहर से कोई बल लगता है और वस्तु अपनी जगह से विस्थापित होती है तो यह माना जाता है कि कुछ काम हुआ है। जितना विस्थापन- उतना काम। यानी काम का होना तभी माना जाएगा, जब उसका परिणाम वस्तु पर दिखाई दे। इसके विपरीत कर्मयोग में भौतिकीय कर्म का लगभग नकार है। आप बल लगाते जाइए। वस्तु हिलती है या नहीं, इसकी चिन्ता न कीजिए। यदि वस्तु हिली ही नहीं तो भौतिकी के अनुसार काम हुआ ही नहीं, लेकिन कर्मयोग के अनुसार आपने काम किया, बराबर किया। चाहे दिखे नहीं पर काम हुआ। इसलिए आप बल लगाते जाइए।

सरकारी दफ्तरों में बहुत से लोग बस इसी सिद्धान्त का अनुसरण करते दिख जाते हैं। वे भीतर ही भीतर बहुत बल लगाते हैं। मानसिक स्तर पर बहुत काम करते हैं, किन्तु प्रकट में कुछ भी परिणाम नहीं दिखता। उनके वरिष्ठ सहकर्मियों को यदि गीता के कर्मयोग का ज्ञान हो तो वे इस बात का कतई बुरा नहीं मानेंगे।

आखिर में बताते चलें कि यदि आपको कोई काम कराना है तो उस आदमी को सौंपें जो व्यस्त है। वही आपका काम कर सकता है। जो आदमी खाली बैठा है उसे काम न दें, क्योंकि उसके पास आपका काम करने के लिए समय नहीं है। वह बहुत बिजी है। बिजी विदाउट बिजनेस!!

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कबाड़ हमारे मन में है

ज़नाब अजीमुल्ला का हुलिया भी देखने लायक है। धड़ पर मैली-कुचैली सैंडो, और कमर से नीचे उससे भी मैली व पुरानी, मुड़ी तुड़ी, नीले-हरे-काले चारखानों की लुंगी। इकहरा बदन, बाल बेतरतीब, खिचड़ी दाढ़ी जो बस हफ्ते में एक दिन नाई के यहाँ हजामत के लिए जाती है, पान से रंगे हुए दाँत जिनकी संख्या रोज ब रोज कम होती जा रही है, आँखों में कीचड़, गले में दो-तीन ताबीज, पूरा का पूरा शरीर पसीने से तर ब तर। अजीमुल्ला कबाड़ी का काम करते हैं और उनका यह हुलिया देखकर लगता है कि यदि कबाड़ में तब्दील हो चुके इन्सानों की खरीद-फरोख्त कहीं होती तो खुद वे भी एक अदद कबाड़ ही होते। लेकिन इतना समझ लें कि अजीमुल्ला, रामप्रसाद या उनके ही जैसे हजारों कबाड़ियों का हुलिया देखकर उनकी हैसियत के बारे में किसी तरह का बेजा कयास लगाने की गलती कतई न करें। उनकी फटी-पुरानी लुंगी और मैली-कुचैली गंजी में से ही ज़रूरत पड़ने पर लाखों रुपये निकल आया करते हैं। वहीं हमारे-आपके जैसे बाबू साहब लोग हैं, जिनको अपने संभ्रांत होने का बड़ा ठसका होता है, लेकिन मौका पड़े तो जेब से फूटी कौड़ी न निकले। क्रेडिट कार्ड चाहे दस-दस लिए घूमें।

कबाड़ियों की दुनिया भी अज़ीब दुनिया है। जिस बेकार और फालतू असबाब को हम-आप यानी शहरों के तमाम शरीफ लोग अपने घर से निकालकर चैन की साँस लेते हैं, अपने फ्लैट को क्लटर-रहित करके फेंग-शुई-अनुरूप और वास्तु-सम्मत बना लेते हैं, उसी को औने-पौने दामों खरीद-खरीदकर ये कबाड़ी लोग जमा करते रहते हैं और फिर सोने के भाव बेचते हैं। कबाड़ की अवधारणा अनिवार्य रूप से शहरी अवधारणा है। गाँवों में अब तक तो कबाड़ नहीं होता था। अब, आधुनिकता के संसर्ग से चाहे होने लगा हो। एक प्रकार से यह अवधारणा व्यक्ति और परिस्थिति-सापेक्ष भी है। जिस अखबार को हम कबाड़ कहते हैं, वही कोरोगेटेड शीट के विनिर्माता के लिए उम्दा कच्चा माल है। उसी से लिफाफे बनाने वाले ऐसा ठोंगा बना देते हैं, जिसमें आप समोसे, मूँगफली और न जाने क्या-क्या रखकर बड़े चाव से घर लाते हैं। टुथपेस्ट की खाली टय़ूब, दवा (और दारू) की खाली बोतलें, प्लास्टिक का टूटा-फूटा सामान, कोल्ड ड्रिंक के खाली कैन- ये सब बहुत उम्दा कबाड़ है जो किलो के भाव से महँगे दामों पर बिकता है। अहमदाबाद में हमारी वित्तपोषित एक इकाई (जो स्विचगीयर बनाती है) का काम ठीक नहीं चल रहा था। उसकी देनदारी दिन ब दिन बढ़ती ही जाती थी। उसने डाइवर्सिफाई किया, वह भी बिना किसी बड़े निवेश के। फैक्टरी के पिछवाड़े बहुत सी खाली जमीन थी। गोदाम भी अच्छा बड़ा था। बस उसने विदेश से बड़े-बड़े क्यूब्स की शक्ल में संपीड़ित करके लाए गए कोल्ड ड्रिंक्स के कैन को गलाकर इंगॉट बनाने का काम शुरू कर दिया। गुजरात के बंदरगाहों पर ऐसा हजारों टन कबाड़ उतरता है। ये सज्जन फेंके हुए कैन्स के कबाड़ को संपीड़ित कर बनाए गए क्यूब्स वहाँ से ट्रकों पर उठवा लाते। मजदूर लगवाकर उन्हें अलग-अलग करवाते। पिछवाड़े उन्होंने पाँच-छह ओपन पिट फर्नेस बनवा लीं। उन्हें बैटरियों/सेलों से निकाले गए कार्बन और कोकिंक कोल से धधकाए रहते। बारी-बारी से कैन्स का कबाड़ इनमें डाला जाता जो शीघ्र ही पिघल जाता। पिघले अल्यूमिनियम को लंबी डंडी वाली कड़छी से उठाकर इंगॉट के साँचे में भरा जाता। ठंडा होने पर यह विभिन्न प्रकार के विनिर्माताओं को महँगे दामों पर बेच दिया जाता। हो गई न कबाड़ से कमाई?

जो कबाड़ी रद्दी, अखबार और पुराने किताब-कॉपी खरीदने हमारे-आपके घरों में आते हैं, वे भी कुछ कम शातिर नहीं होते। अव्वल तो वे रेट कम बताएँगे और यदि ज्यादा भी बता दें, तो भी बहुत खुश होने की ज़रूरत नहीं है। कारण? उनकी तराजू बड़े कमाल की होती है। उसकी बाट वाली डंडी थोड़ी बड़ी होती है, यानी डंडी की लंबाई X बाट का भार के फार्मूले से देखें तो वह वास्तविक से कहीं अधिक वजन की रद्दी एक बार में तोल लेता है। फिर उसी को बाट के साथ रखकर दुगना वजन का बना लेता है। अब उसकी अधिक तोलने की बेईमानी बिंदास चल निकली। जितनी बार तोलेगा उसी अनुपात में कम वजन में ज्यादा रद्दी ले जाएगा। घर पर आए कबाड़ी की तौल से यदि आपने बीस किलो रद्दी बेची है, तो निश्चित जानिए कि उसका वास्तविक वज़न तीस किलो रहा होगा। डंडी मारने में ये उस्ताद होते हैं। कई कबाड़ियों के तराजू में बीच का काँटेवाला हिस्सा इतना टाइट होता है कि कितना ही सामान बाट के दूसरी ओर रख दीजिए, काँटा हमेशा बाट की ओर ही झुका रहेगा। आप इस पल्ले पर नहीं उस पल्ले पर तोल लीजिए। कबाड़ी कई बार खुद बड़ा इसरार करते हैं- साहब जी, लो आप खुद अपने हाथ से तोल लो। बस एक यही काम बचा था। यदि कोई पड़ोसी या जान-पहचान वाला साहब को उस मुद्रा में देख ले तो गैरतमंद आदमी तो इस शर्म से ही मर जाए कि हम कबाड़ तोलते पकड़े गए।

केवल शरीफ लोग ही कबाड़ बेचते हों, ऐसा नहीं है। कबाड़ी के पास पहुँचने वाला बहुत-सा सामान चोरी का होता है। चोरी की तारें, चोरी का बिजली का सामान, बरतन, नल, टोंटियाँ, कुंडे, स्टीरियो, कपड़े आदि, यानी जो भी सामान चोरी जाता है, उसे घूम-फिरकर कबाड़ी के पास पहुँचना ही है। इधर इस फेहरिस्त में कैमरे, मोबाइल आदि भी शामिल हो गए हैं। यही कारण है कि लगभग हर बड़े शहर में संडे के संडे एक कबाड़ी बाज़ार लगता है। चूंकि इस बाज़ार में आम तौर पर चोरी का सामान बिकने आता है, इसलिए इसे चोर बाज़ार भी कहते हैं। दिल्ली में लालकिले के पीछे जमना बाज़ार से लेकर राजघाट के चौराहे तक हर इतवार को यह बाज़ार लगा करता था। अब पता नहीं लगता है कि नहीं। मुंबई-अहमदाबाद-कोलकाता-चेन्नै, हर बड़े शहर में ऐसा एक बाज़ार लगता है। लिहाज़ा चोरी, सेंधमारी और पाकेटमारी करके अपनी जीविका चलाने वाले लोगों से कबाड़ी भाई कौड़ियों के दाम सामान खरीद लेते हैं और आगे बढ़ा देते हैं। पुरानी चीजों को नया रूप देने में माहिर कारीगर उसका हुलिया बदलकर या फिर पुर्जा-पुर्जा करके ऐसे रूप में ले आते हैं कि जिसका सामान चोरी गया हो वह भी कबाड़ी बाज़ार जाए तो पहचान न पाए और चोरी चले गए अपने ही सामान को भारी दाम देकर वापस खरीद लाए। पुलिस वालों की ऐसे कबाड़ी लोगों पर बड़ी कृपा रहती है। झुग्गी बस्तियों के बच्चे और मजदूर लोग इधर-उधर से बीनकर लाये गये अथवा छुटपुट चोरी के सामान का कबाड़ियों से वस्तु-विनिमय भी कर लेते हैं। जैसे गरी-गोला बेचने वाले, मिसरी वाले, बच्चों की भाषा में जिन्हें चिज्जी वाले कहते हैं, वे झुग्गी-झोंपड़ी वाले बच्चों से दस-पाँच रुपये का माल लेकर अपने झोले में डाल लेते हैं और उनके हाथ में अठन्नी की मूँगफली की पट्टी या मिसरी की एक डली थमा देते हैं। पर इन्हें कबाड़ी समझना भूल होगी। ये छोटे फेरीवाले होते हैं जो इस प्रकार, वस्तु-विनिमय में प्राप्त माल को ले जाकर कबाड़ी के यहाँ नकद में बेचते हैं।

ये तो हुई छुटभैये कबाड़ियों की बात, जो बकौल एक कबाड़ी ही- बस किसी तरह दाल-रोटी के लायक कमाई कर लेते हैं, बच्चे पाल लेते हैं। इनके बरक्स ऐसे कबाड़ी भी होते हैं जो करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा एक-एक सौदे में ही कर डालते हैं। ऐसे ही एक कबाड़ी से एक बार हमारी बात हो रही थी। उन्होंने बताया कि अगले रविवार पूरे परिवार के साथ हफ्ते भर छुट्टी मनाने सिंगापुर, हॉङ्गकॉङ्ग जाना है। शहर की बड़ी ही पॉश कॉलोनी में इन कबाड़ी महोदय का तीन हजार वर्ग फुट का फ्लैट है। दो बड़ी-बड़ी शानदार लग्जरी कारें हैं। बच्चे शहर के महँगे ए.सी. स्कूलों में पढ़ते हैं। बीवी सोने से लदी हुई। बाकी का सोना शहर के कई बैंक-लॉकरों में है। जब हम पाँच हजार रुपये महीना पगार पाते थे, तब ये कबाड़ी महोदय सोलह सौ महीने की नौकरी करते थे। अब उनकी इतनी बड़ी हैसियत है कि हमारे जैसे दस-बीस लोगों को खुद ही रोजगार दिए हुए हैं। लाखों रुपये का तो टैक्स भरते हैं। आखिर करते क्या हैं ये?

ये बड़ भैये कबाड़ी लंबा हाथ मारते हैं। बैंक से कर्ज लेकर बनी फैक्टरियाँ जब कर्ज अदायगी न करने के कारण ट्रिब्यूनल, कोर्ट या बैंक द्वारा बेची जाती हैं, तब ये कबाड़ी हरकत में आते हैं। आम तौर पर ये फैक्टरियाँ सार्वजनिक रूप से नीलाम होती हैं। शहर के सारे कबाड़ी गुटबंद हो जाते हैं। न्यूनतम मूल्य पर भी कोई इन फैक्टरियों की मशीनें खरीदने को तैयार नहीं होता। मजबूरन न्यूनतम मूल्य कम करना पड़ जाता है। कारण? यदि किसी न किसी तरह मशीनें बेची न गईं तो उनका मूल्यह्रास होगा। बारिश में वे और जंग खाएँगी, और सड़ेंगी। बिक जाने तक उनकी चौकीदारी की व्यवस्था करनी होगी। यानी एक ओर तो कीमत घटती जाएगी, दूसरी ओर चौकीदारी की मद में खर्चा बढ़ेगा। ऊपर से उतने दिन बैंक का धन फंसा रहेगा, ब्याज का नुकसान होगा, सो अलग। इसलिए मशीनों को किसी भी तरह बेचकर बैंक इस गोरखधंधे से छुटकारा पाना चाहते हैं। जब तक बैंक से सौदा पक्का नहीं होता, तब तक कबाड़ी लोग दूर-दूर तक धावा मारकर ताड़ते रहते हैं कि ऐसी ही मशीनें खरीदने वाला कोई आँख का अंधा गांठ का पूरा बन्दा है या नहीं। अक्सर ऐसा होता है कि यहाँ से सस्ते में पुरानी मशीनें खरीदते हैं और उधर किसी ज़रूरतमंद को महँगे दामों में बेच देते हैं। जो माल नहीं बिकता, उसके लिए इनके पास बड़े-बड़े गोदाम होते हैं, जहाँ पुर्जा-पुर्जा अलग करके बेचा जाता है। ये पुर्जे फिर से फैब्रीकेट होनेवाले संयंत्रों में लगा दिए जाते हैं और कई बार अनुभवहीन बैंकर उन संयंत्रों के लिए फिर से ऋण दे देते हैं। बतौर बैंकर इन कबाड़ियों के साथ अपना यही अनुभव रहा है। जब बिकाऊ माल दिखाओ तो वे मुँह बिचकाएँगे- `अरे साब! ये तो अभी भंगार हो गयेला है। इसका कुछ नहीं मिलेगा। ऐसी मशीनें अब कहाँ चलती हैं? चार रुपये किलो भी कोई नहीं लेने वाला। यहाँ से उठवाने का खर्चा अलग। रहने दो साब.. नहीं पोसाएगा अपुन को।' लो.. कर लो बात। बैंकर की हवा खिसक जाती है। अगर मशीनें नहीं उठीं तो बिल्डिंग खाली नहीं होगी। खाली किए बिना बिल्डिंग भी नहीं बेची जा सकती। एक बार किसी कबाड़ी से बैंकर की बातचीत चल रही हो तो दूसरा कोई कबाड़ी उधर झाँकने भी नहीं जाता। गज़ब का भारी-चारा है उनमें। व्यवसाय के क्षेत्र में आपसी सहयोग के मामले में उनका कोई सानी नहीं। मज़बूरन अच्छी-खासी मशीनों को आधे-तिहाई दाम पर बेचना पड़ता है।

होते तो ये कबाड़ी हैं लेकिन पढ़े-लिखे और सलीकेदार। बैंकर को बढ़िया एसी गाड़ी में बिठाकर ले जाएँगे, रास्ते में एसी ढाबे में अच्छा खाना खिलाएँगे। खूब स्वागत-सत्कार करेंगे। बस बोली लगाते समय डंडी मारना नहीं भूलेंगे। डंडी न मारें तो कबाड़ी काहे के! आखिर सारी कमाई तो डंडी मारने पर ही निर्भर है।

हम ऊपर कह आए कि कबाड़ोत्पादन प्रधानतया शहरी प्रवृत्ति है। सच कहें तो कबाड़ हमारे मन में होता है। जैसे सुख हमारे मन में होता है। दुख हमारे मन में होता है। उसी तरह कबाड़ भी हमारे मन में होता है। बीस साल से जिस टीवी-फ्रिज को हम रोज पोंछते-चमकाते चले आ रहे थे, खूब जतन से रखे हुए थे और कोई तारीफ कर दे, नये जैसा बता दे तो अपनी सद्गृहिणी पत्नी की शान में चालीसा गाने लगते थे, उसी टीवी-फ्रिज को, किसी इलेक्ट्रॉनिक शोरूम या मॉल के सेल्समैन (या गर्ल!) के बहकावे में आकर एक दिन हम कबाड़ मान लेते हैं और एक्स्चेंज स्कीम में उनके बदले नया-नवेला टीवी-फ्रिज ले आते हैं। शहर में संपन्नता है। और ज्यादातर घरों में बस कुछ ही साल पहले इसकी खेप पहुँची है। पहले हम अकेले कमाते थे। चार जने खाते थे। अब बुढ़िया पत्नी को छोड़कर सभी कमाते हैं। आय खूब बढ़ गई है। तो पुराना सामान काटने लगता है। कबाड़ लगने लगता है। उसकी जगह नया चाहिए। अपनी नई-नवेली संपन्नता का कीट अगर न भी काटे तो मॉल वाले, इलेक्ट्रॉनिक सामान के शो रूम वाले बार-बार आपका ध्यान आपके बैंक बैलेंस की ओर ले जाते हैं। वे आपको टेलरमेड स्कीमें सुझाते हैं। पुराना दो -नया ले जाओ। हमें याद दिलाया जाता है, आपकी कार यूरो-फोर नहीं है, बदलिए। आपका एसी स्टार रेटिंग वाला नहीं है, बदलिए। आपका फ्रिज कॉइल वाला है, अरे उसमें तो ढेरों कीटाणु पलते हैं, बदलिए। आपका कंप्यूटर, अरे उसकी रैम अब बेकार हो गई, उसकी हार्ड डिस्क कम कैपेसिटी की है, उसका मदर बोर्ड तो किसी नए अटैचमेंट को सपोर्ट ही नहीं करता। बदलिए। फिर विज्ञापन आता है- सारे घर को बदल डालूँगा। यानी सारा पुराना सामान कबाड़ हो गया। आप अपने घर से कबाड़ निकालिए। नया सामान लाइए। यदि जेब इजाजत नहीं देती तो भी चिन्ता न करें। किस्तों में ले आएँ।

इधर शहरों और कस्बों में मॉल आ गए। पूँजीपति भाई लोग आपके पड़ोस के पंसारी के पेट पर लात मारने आ धमके। सच कहें तो ये भाई लोग और भी बड़े जेबकाटू कबाड़ी हैं। इनके पास आप अपने घर का सब कबाड़ ले जाएँ। अखबार जो बाहर पाँच रुपये किलो बिकता है, मॉल में पचास रुपये किलो। आपके पुराने टूटे और बदबूदार जूते पाँच सौ रुपये किलो। घिसे पुराने टायर चार सौ रुपये किलो। वे सब कुछ खरीदेंगे। बस आपके मन में बेचने का हौसला होना चाहिए। बस एक बात है। इन चीजों के दाम नकद नहीं मिलने वाले। यदि आपने दो हजार रुपये का कबाड़ बेचा है तो आपको उससे पाँच गुना ज्यादा, यानी दस हजार रुपये का माल वहाँ से खरीदना होगा। उसी के बिल में से दो हजार रुपये घटा दिए जाएँगे। यानी आपको सिर्फ आठ हजार रुपये चुकाने होंगे। है न फायदे का सौदा? हाँ, एक बात और। मॉल का सारा सामान इस अदला-बदली में नहीं मिलेगा। अदला-बदली करनी है तो आपको वही चीजें मिलेंगी, जिनपर मॉल ने स्टिकर लगाए होंगे। अमूमन ये ऐसा माल होता है, जिसे बरसों से किसी ग्राहक ने छुआ तक न हो, खरीदने की तो बात ही अलग है। झोंक में आदमी खरीद तो लाता है, फिर घर आकर सोचता है कि अब इसका करें क्या? ऐसे कितने ही मौके आए, जब हम बच्चियों की ढेरों ड्रेसें ऐसी ही स्कीमों में उठा लाए। घर आकर हमने तय किया कि कौन सी ड्रेस किस रिश्तेदार अथवा मित्र की बच्ची को देनी है, क्योंकि हमारी संतानों में कोई लड़की है ही नहीं। इसी तरह कई बार लालच में दो-दो लीटर वाली पाँच-सात बोतलें कोल्ड ड्रिंक की ले आए। बाद में फ्रिज में लगाते समय बेटों ने शुभ सूचना दी कि अति समझदार पिताश्री, ये तो सब एक्सपायर हो चुकी हैं। यानी.. घर का कबाड़ देकर उसके एवज़ में आप महँगे दामों पर मॉल का कबाड़ घर ले आए। कबाड़ी डंडी न मारे, ये कैसे संभव है?

कोई-कोई गृहस्वामी बड़े उदार होते हैं। वे अपना पुराना सामान अपनी वफादार नौकरानी या गरीब रिश्तेदारों को दे देते हैं। थोड़े से लाभ के चक्कर में अच्छा-खासा सामान कौड़ियों के भाव क्यों बेचें? बात एकदम सही है। इसी तरह कोई-कोई देश भी बड़े उदार होते हैं। जब लड़ाकू विमानों और पनडुब्बियों से उनका मन भर जाता है तो उनको वे सस्ते दामों में तीसरी दुनिया के देशों को बेच देते हैं। कारण? यहाँ के लोगों की जान बहुत सस्ती है। जापान में जब कंप्यूटर टेक्नोलॉजी पाँच-सात साल पुरानी हो जाती है तो भारत के लोग उसे बड़े चाव से खरीद लेते हैं। उन्नत राष्ट्र जो प्रौद्योगिकी दस साल पहले इस्तेमाल कर रहे थे, वह अपने यहाँ अब आ रही है। गरीबी के मारे हुए हम तीसरी दुनिया के लोग उसे लिए-लिए फिरेंगे। अमीरों की उतरन से गरीब लोग अपनी लाज ढांपते हैं। उन्नत राष्ट्रों को इस समाजार्थिक संकल्पना की खूब खबर है। इसीलिए जो परमाणविक कचरा उनके लिए असह्य हो जाता है, उसे वे धीरे से हिन्द महासागर में खिसका देते हैं। जिन रेडियोधर्मी जहाजों को कोई नहीं तोड़ता, उन्हें तोड़ने के लिए भारत में भावनगर-स्थित अलंग भेज दिया जाता है। पश्चिमी देशों में उड़ान के लिए नाकारा घोषित किए जा चुके यात्री जहाज भी मरम्मत करके अपने यहाँ खूब उड़ाए जाते हैं। यही नहीं, उनके बुड्ढे पायलट भी, वहाँ से रिटायर होने के बाद, यानी कबाड़ घोषित कर दिए जाने के बाद हिन्दुस्तानी आसमान पर जहाज उड़ाते पाए जाते हैं। खाड़ी के देशों के जर्जर और कबाड़ हो चुके बुड्ढे शेख भारत-बांगलादेश के गरीब घरों की कमसिन बच्चियों को अपने हरम के लिए ले जाते हैं।

कबाड़ यदि किसी कलाकार के हाथ लग जाए तो महान कलाकृति बन जाता है। भोपाल में एमपी नगर बोर्ड ऑफिस से चार-इमली-न्यू मार्केट की ओर ठंडी सड़क पर जाएं तो पहाड़ी की तलहटी में लोहे-लंगड़ के कबाड़ से बनी ढेरों कलाकृतियाँ एक पार्क में संस्थापित दिखती हैं। चंडीगढ़ का रॉक गार्डन तो कमोड, पाखाने की सीटों, वॉशबेसिन, टाइलों आदि के टूटे टुकड़ों से ही बना है, यानी ऐसा कबाड़ जिसे कोई छूना तो क्या देखना भी पसंद नहीं करता। इसीलिए तो मैं बलपूर्वक कहता हूँ- कबाड़ हमारे मन में है।

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मैंनू की (मुझे क्या)?

आज-कल के चुनावों में आधे से भी कम मतदाता वोट डालने निकलते हैं। पहले ऐसा नहीं था और लोग बड़े उत्साह से वोट डालने जाते थे। इससे पता चलता है कि पहले की तुलना में आज का मतदाता अधिक सुविधा संपन्न हो गया है। अब उसके घर में आराम है। एसी है। कूलर है और सबसे बढ़कर तो टेलीविजन है। डीवीडी और वीसीडी है। केबल है। मतदान यदि हमारी सामाजिक सक्रियता का द्योतक है तो यों कहना चाहिए कि आज का आम आदमी सामाजिक रूप से सक्रिय नहीं रहा। उसने बाकी की दुनिया से नाता तोड़ लिया है और मैं नू की की मुद्रा में आ गया है।

बगल वाले घर की लड़की भाग गई। मैंनू की? सामने वाले घर में चोरी हो गई। मैंनू की? निचले तल्ले के बूढ़े बाबा गुजर गए। मैंनू की? ऊपर वाले के घर में आग लग गई। मैंनू की? तो क्या हम अपने आसपास के परिवेश से निस्पृह और निस्संग हो चले हैं? काश कि ऐसा ही होता। कोई मरता, कोई जीता और हम मैंनू की की रट लगाए अपने ही लोक में केलियाँ करते रहते। लेकिन ऐसा है नहीं और यही सारी समस्या का कारण है। अभी तक हमने जो स्थितियाँ गिनाईं वे सब की सब नकारात्मक हैं। क्या सकारात्मक स्थितियों में भी हम इतने ही निस्पृह और उदासीन बने रहते हैं। सामने वाले खाली प्लॉट में बड़ी शानदार इमारत बन रही है। अच्छा! कौन लोग हैं? हैं कोई, सचिवालय में बाबू या यूडीसी हैं। अच्छा! तो इतने पैसे कहाँ से आए। ज़रूर सा... चोट्टा, घोटालेबाज, घूसखोर होगा। बगल वाली बच्ची मेडिकल में आ गई। अच्छा! ज़रूर नकल मार ली होगी। निचले तल्ले के श्रीमान विदेश हो आए। हाँ भई, बॉस के साथ टिप्पस जो भिड़ा रखी है। हम प्याला, हमनिवाला हैं तो विदेश नहीं जाएँगे क्या!

यानी यदि कोई अच्छी बात हो गई तो हमें मिर्ची लगती है और बुरी बात हुई तो या तो हम आनंदित होंगे या उस बुराई से जूझने और लड़ने के बजाय बड़े निस्पृह भाव से कहेंगे- मैंनू की?

हम सौ साल-डेढ़ सौ साल पहले के भारत की कल्पना करते हैं। अंग्रेज भाई लोग देश को खूब लूट रहे हैं। भारत के मूल निवासियों पर खूब अत्याचार हो रहे हैं। भारत के संसाधनों का दोहन हो रहा है। पूरी अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक ताकतों की स्वार्थसिद्धि का साधन बनकर रह गई है। आम नागरिकों पर अत्याचार हो रहे हैं। यानी चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है। ज्यादातर लोग लाचार हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि क्या करें। बल्कि यों कहें कि वे इस संत्रास को ही नियति माने बैठे हैं। उनके मन में यह विचार भी नहीं आता कि इस अनाचार का निवारण भी संभव है।

ऐसे में कुछ प्रबुद्ध लोग निकल आते हैं। उन्हें अंग्रेजों की दुर्नीतियों का पूरा अहसास है। वे सब समझते हैं और स्वदेशी संसाधनों का अनाप-शनाप दुरुपयोग देखकर, स्वदेशी लोगों पर विदेशी औपनिवेशिक ताकतों का अत्याचार देखकर उनके मन में उद्वेलन भी होता है। किन्तु वे कहते हैं- मैंनू की? राजा राममोहन राय कहते हैं -मैंनू की? मंगल पाण्डेय कहते हैं मैंनू की? झांसी की रानी कहती है- मैंनू की? तांत्या टोपे कहते हैं- मैंनू की? बाल गंगाधर तिलक कहते हैं- मैंनू की? चापेकर बंधु कहते हैं- मैंनू की? गोखले जी कहते हैं मैं नू की? मोतीलाल नेहरू कहते हैं- मैंनू की? सरोजिनी नायडू कहती हैं - मैंनू की? सुब्रहमणियम भारती कहते हैं- मैं नू की? आंध्र केसरी- प्रकाशम कहते हैं- मैंनू की? पट्टाभि सीता रमैया कहते हैं- मैंनू की? राजाजी कहते हैं- मैंनू की? सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, लाला लाजपत राय, करतार सिंह सराभा, खुदी राम बोस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पं जवाहर लाल नेहरू, मोतीलाल नेहरू, दीनबंधु एंड्र्यूज और यहाँ तक कि खुद गाँधी जी भी कह देते हैं- मैंनू की? यानी हिन्दुस्तान की पूरी लीडरशिप और उनके पीछे चलते दूसरी-तीसरी पंक्ति के सब नेता, आंदोलनकारी, चिंतक विचारक सब एक सुर में गाने लगते हैं- मैंनू की?

कल्पना कीजिए। इस `मैंनू की' की रामधुन गाते भारत को अंग्रेजों के चंगुल से छुटकारा मिल जाता क्या? हम सब स्वाधीन भारतवासियों के सौभाग्य से ऐसा नहीं हुआ। मैंनू की- सिद्धान्त का अनुकरण करनेवालों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी और देश के सुख-दुख से द्रवीभूत होकर, उसकी दुर्दशा दूर करने के लिए आतुर लोगों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक थी। स्वतंत्रता आंदोलन हुआ और देश आजाद हो गया।

हमें लगता है कि समृद्धि आदमी की नैतिकता को कुंद करती है। मनुष्य के सामाजिक बोध के खुरदुरेपन को समृद्धि का रेगमाल रगड़-रगड़ कर चिकना कर देता है। फिर आदमी चिकना घड़ा हो जाता है। अपने स्वैर-लोक में रमा हुआ ऐसा आदमी खुद के अलावा किसी के विषय में नहीं सोचता। पहले देश के बहुसंख्यक लोग गरीब थे। घर में दो जून खाने को नहीं जुटता था। घर खूब थे, मकान बस कोई-कोई। किसी तरह बस जन्म से मृत्यु तक का सफर तै कर लेते थे। मनोरंजन के साधन नहीं थे। ज्यादातर लोग मजदूरी करते, किसानी करते। थक जाते तो गीत गाते, आल्हा गाते, रस-चबेना और सत्तू पर गुजर करते। भगवान की कथा-पूजा में भी रस-पंजीरी का भोग लगाते। वे और उनके भगवान बड़े अल्प-तोषी थे। ऐसे में चुनावों का होना बड़े जलसे का आयोजन माना जाता था। गाँवों की महिलाएं बैलगाड़ी में बैठकर वोट डालने जातीं। पैदल जातीं तो भी झुंड की झुंड, गीत गाते हुए। उन दिनों घरों में पिसा आटा नहीं आता था। सुबह चार बजे उठकर माँएं -दादियाँ जाँत (चक्की) चलातीं। घर की झाड़ू-बुहारी करतीं। जानवरों को सानी-पानी करतीं। चौका-चूल्हा करने के बाद, घर का पूरा काम करने के बाद भी उनमें इतना उत्साह होता कि चलो वोट डाल आएँ। यही हाल शहरों का हुआ करता था।

तो अब क्या बात हो गई? पहले वाला वह उत्साह कहाँ काफूर हो गया? अब तो चक्की भी नहीं चलती। आधा काम मशीनें कर देती हैं। घर-घर बाइक है। सड़कें भी प्रायः पक्की हो गईं। समय और सुविधा सब कुछ है। सरकारी सेवा में जो लोग हैं, उनको सरकार पूरे दिन की छुट्टी देती है। निजी प्रतिष्ठान भी बंद ही रहते हैं। दिन भर निठल्ले बैठे रहते हैं, लेकिन वोट डालने के लिए लोगों के पास आधे-पौन घंटे का भी समय नहीं है।

दरअसल हुआ ये कि आम गरीब-गुरबा आदमी अब सुविधा-संपन्न, विलासी राजा बाबू हो गया। उसे अपने विलास और आमोद-प्रमोद की बेड़ी ने जकड़ लिया है। वह अपनी सुख-सुविधाओं का गुलाम हो गया। उन्नीसवीं सदी में अवध में नवाब वाजिद अली शाह थे। सुना-पढ़ा है कि पहले वे भी बड़े उत्साही थे। फौजें व्यवस्थित कीं, परेड-वरेड कराते थे। लेकिन धीरे-धीरे कुछ अपने ऐंद्रिक सुख की वशवर्तिता के कारण, कुछ अंग्रेजों की कुचाल के कारण वे घोर विलासी और अपने कर्तव्यों के प्रति इतने उदासीन हो चले कि एक दिन अंग्रेजों ने धीरे से अवध पर अपना कब्जा कर लिया। कोई संघर्ष नहीं हुआ, कोई विरोध नहीं। खून तो क्या वाजिद अली शाह ने पसीने की एक बूंद तक नहीं गिराई। अब वैसे ही करोड़ों वाजिद अली शाह घर-घर में हैं। आप और मैं- हम सब उस जमात में शामिल हैं।

उदासीन मतदाता हवाला देते हैं लीडरशिप के भ्रष्ट होने का। लेकिन उन्हें अपना दिल टटोलकर देखना चाहिए कि मतदान के प्रति उदासीनता का क्या यही एक कारण है? यदि स्वयं युधिष्ठिर आकर वोट माँगें, भगवान राम वोट माँगें, माँ दुर्गा, माँ सरस्वती और माँ काली वोट माँगें, खुद पैगंबर हज़रत अली, ईसा मसीह और परम पूज्य गुरु नानक देव जी, साईं बाबा ही वोट माँगने आ जाएँ तो क्या लोग वोट डालने जाएंगे? तब क्या उनका टेलीविजन, उनका कूलर, उनका एसी, उनका बिस्तर, उनका सोफा, उनका कालीन, उनका मोबाइल, उनका मीडिया प्लेयर, उनका इंटरनेट उनका दामन पकड़कर उन्हें रोक नहीं लेगा?- न जाओ सैयां छुड़ाके बँहियाँ!

बेटे-बेटी नालायक निकल जाते हैं तो लोग अखबार में इश्तहार छपवाकर उनकी कारगुजारियों से खुद को अलग कर लेते हैं- हर आमो-खास को मालूम हो कि अमुक-अमुक से मैंने संबंध विच्छेद कर लिया है। उनसे लेन-देन करनेवाले अपना हिसाब-किताब खुद सुलटें। हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। हमने उन्हें अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया है। बस इसी तर्ज़ पर आधे से अधिक जनता ने अपने नेताओं को अपने दिल से बेदखल कर दिया है। बेशक ये मर्दुए इसी काबिल हैं। लेकिन बुढ़ापे में गंगाजली देने के लिए कोई तो चाहिए। राम जैसा काबिल बेटा न हो तो न सही। श्रवणकुमार जैसा बहँगी में ढोकर तीरथ करानेवाला सपूत न मिला तो न सही। मरते समय दो बूँद पानी पिला दे, मिट्टी को घाट तक पहुँचा दे, ऐसा कोई एक बेटा-बेटी, रिश्तेदार, मददगार, कोई तो चाहिए। प्रजातंत्र का भी यही हाल है। इसका विरसा संभालनेवाले कोटि-कोटि वोटरों को जान-बूझकर मक्खी निगलनी पड़ेगी। नहीं तो प्रजातंत्र की मिट्टी पलीद होगी और इसे गंगाजली देनेवाला कोई नालायक वारिस, रिश्तेदार, मददगार भी नहीं मिलेगा। बुराई को होते देखते रहना भी कोई कम जघन्य अपराध नहीं है। बुराई को पनपने देने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि अच्छे लोग उससे खुद को दूर कर लें। यही तो हमने-आपने कर लिया और बुराई को पुष्पित-पल्लवित करने का सुनहरा मौका दे दिया।

जैसे हर समस्या का हल है, वैसे ही निम्न मतदान की समस्या का भी हल है। अपने देश के लोग लाख समृद्ध, सुविधाभोगी और इस कारण अपने दायित्वों से लाख उदासीन हों, लेकिन जहाँ मुफ्त का माल मिलता है, वहाँ अच्छे-अच्छों की लार टपक जाती है। सरकार मिड-डे मील का चुग्गा देकर बच्चों को स्कूल बुला रही है। आरक्षण-नीति के बारे में कुछ न कहना ही ठीक है। लोग शादियों में जाते हैं, एक सौ इक्यावन रुपये का लिफाफा पकड़ाकर पूरा परिवार दो-ढाई सौ रुपये फी प्लेट की दर वाली चार-छह प्लेटें निपटा आता है। अमीर-गरीब सबका यही हाल है। तो चुनाव आयोग को करना यह चाहिए कि पोलिंग बूथ के बगल में फूड पैकेट या मिठाई के डिब्बे रखवा दे। वोट डालो और अपना पैकेट ले जाओ। न हो तो एक-एक बोतल शीतल पेय ही सही। राम आसरे हलवाई की दो-दो पूड़ी और आलू की सूखी सब्जी भी चलेगी। हमें पूरा यकीन है कि वोटिंग का ग्राफ जो अब गिरते-गिरते तीस-पैंतीस पर पहुँच चुका है, वह पूड़ी-सब्जी का पोषण पाते ही लहलहाकर अस्सी-पचासी तक पहुँच जाएगा।

यदि ऐसा कर दिया गया, तो समझिए कि पूरा युगान्तर ही उपस्थित हो जाएगा। जो लोग कभी वोट डालने नहीं जाते वे भी तत्परता से पोलिंग बूथ पर पहुँच जाएँगे और `मुझे क्या' के बजाय कहेंगे- मुझे भी, मुझे भी। जीवन के हर क्षेत्र में यह बात लागू होती है। पूरे समाज में हाहाकार मचा है और सब लोग अपना दरवाजा बंद करके बैठ गए हैं। क्या दरवाजा बंद कर लेने से पड़ोसी के घर में लगी आग की लपटें आपके घर को बख्श देंगी? लिहाजा हमें `मैंनू की' का फलसफा छोड़ना होगा और अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति सजगता दिखानी पड़ेगी। शीघ्रातिशीघ्र।

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हिन्दी बोले तो...

बहुत दिनों बाद ससुराल पहुँचे। सास-ससुर ने खूब आवभगत की। साली ने पूछ-पूछकर और सच कहें तो ठूंस-ठूंसकर खिलाया-पिलाया। लेकिन मुँहलगे साले ने मुँह का सारा जायका खराब कर दिया। पूछ बैठा- "जीजाजी, आप तो बैंक में हिन्दी अधिकारी हैं न?" हमें लगा, साला सच्ची बात हमारे मुँह से सुनकर न जाने क्या मजे लूटना चाहता है? जिस रहस्य को हम बरसों से अपनी आबरू की तरह दबाए-छिपाए और दुनिया की नज़रों से बचाए-बचाए घूम रहे थे, वही ये साला आज सरे आम उजागर किए दे रहा है। अब क्या है! कुछ दिन बाद ससुराल के सभी संबंधियों, फिर उनके अड़ोसियों-पड़ोसियों और फिर सारे शहर को पता चल जाएगा कि हमारी औकात तो कुछ भी नहीं है, कि हम तो अदना से हिन्दी अधिकारी हैं। अरे राम! कितना अनर्थ हो जाएगा! सोच-सोचकर साले पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। लेकिन करते क्या? गुस्सा तो हिन्दी की दुर्दशा से जुड़ी तमाम बातों पर आता है, लेकिन हम क्या कर लेते हैं? सच कहें तो गुस्से को पी जाना और अपनी लाचारगी को शाश्वत मानकर स्वीकार कर लेना ही हिन्दी अधिकारी का परम कर्तव्य और परम प्राप्य है। हम चुप रह गये। बड़े-बड़े मंसूबे बनाकर ससुराल गए थे, लेकिन कोई भी पूरे न हुए। जितने समय रुकने की सोचकर गए थे, उससे भी पहले ही चले आए। बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले। बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। चचा ग़ालिब ने शायद हमारे लिए ही यह शेर लिखा था।

घर आए तो ससुराल का संक्रमण यहाँ भी पहुँच गया था। इतनी तेजी से कोई व्याधि नहीं फैलती, जितनी तेजी से प्रवाद। वैसे तो यह बीमारी मानव-सभ्यता के आरंभिक दिनों से ही बदस्तूर कायम है। लेकिन इसकी हालिया तेजी निश्चित रूप से सूचना क्रांति की मेहरबानी है। अभी घर के अहाते में पूरी तरह फिट भी नहीं हो पाए थे कि बड़े बेटे साहब ने हमसे पूछ लिया- "क्यों डैड! आप बैंक में हिन्दी अधिकारी हैं?" उसके प्रश्न में हमें जिज्ञासा कम, तंज अधिक दिखा। हमने बड़ी लाचारी से उसकी ओर देखा, जैसे बकरा कसाई को देखता है। बोले कुछ नहीं। अलबत्ता मन ने कहा- "मान लो बेटा, हम हिन्दी अधिकारी न होते, कहीं के कलट्टर, मजिस्टेट होते तो क्या तुम कुछ दूसरी तरह से पैदा हुए होते? या तुम्हारी अम्मा, जिनसे हमारी शादी तभी हो गई थी, जब हमें और उनको भी सुथने का नाड़ा बाँधने का भी सलीका नहीं था, कुछ और हो गई होतीं?" बेटे की बात अनसुनी करके हम चुपचाप बैठ गए।

हिन्दी अधिकारी बने हमें एक चौथाई सेंचुरी हो चुकी है। और इस दौरान हमने सबसे बड़ा सबक यही सीखा है। कोई कुछ भी बोले, कुछ भी कहे.. चुपचाप सुनते रहो। अपनी पगार का स्मरण करो, उसी में मन लगाओ। जैसे सच्चा भक्त संसार की दूसरी बातों पर ध्यान न देकर अपने आराध्य का ध्यान लगाए रहता है, उसी प्रकार सच्चा हिन्दी अधिकारी और सारी बातों, यहाँ तक कि हिन्दी कार्यान्वयन पर भी ध्यान न देकर, बस महीने के अंत में मिलने वाली अपनी तनख्वाह पर ध्यान लगाता है। उससे भी ऊँचा संत वह है जो निरीक्षण, कार्यशाला, सम्मेलन आदि के बहाने अपनी कमाई बढ़ाने के दूसरे स्रोतों पर ध्यान लगाए। सच्चा राजभाषा अधिकारी निरपवाद रूप से ऐसा ही करता है। कई बार तो वह अपने कपड़े -लत्ते पर भी ध्यान नहीं देता। बहुत से हिन्दी अधिकारी ऐसे मिल जाएँगे जो बीस रुपये वाली रबड़ की शानदार हवाई चप्पल और ठेले पर बिकने वाली बिना प्रेस की हुई, स्थायी रिंकल-युक्त पैंट-कमीज पहनकर ही दफ्तर चले आते हैं। सर्दियों में अस्पताल की बेडशीट जैसी हरी-हरी चद्दरें और खेस ओढ़कर दफ्तर आनेवाले हिन्दी अधिकारी भी हमने देखे हैं। एक बार पहनने के बाद फटने तक शरीर से चिपकी रहने वाली जीन्स और कई-कई हफ्ते से बह रहे तरह-तरह के श्रम-वारि से सुवसित टी-शर्ट पहनकर निरीक्षण करने वाले कर्मवीर उप निदेशक (कार्यान्वयन) से भी अपना साबका पड़ चुका है।

अब हम बेटे को कैसे समझाते कि उसके बाप की प्रोफेशनल बिरादरी में कैसे-कैसे अघोरी शामिल हैं! उसका कोमल मन, जो पहले ही अपने बाप को राजभाषा के अभिधान से विभूषित, किन्तु वस्तुतः गाय-गोरू चरानेवाले अथवा ईंटा-गारा ढोने वाले लतमरुआ लोगों की भाषा यानी हिन्दी के सेवक के रूप में देखकर विचलित हो चुका है, इस कठोर सच्चाई का सदमा कैसे झेलेगा? यह सोचकर हम उस मुद्दे पर चुप रह गए। अलबत्ता दूसरे मुद्दे पर हमने बच्चे की क्लास ले ली और डपटते हुए उससे कहा- "यार, जबसे तुम पैदा हुए हो तब से तुम्हें समझाते चले आ रहे हैं कि हमें डैड-वैड मत बुलाया करो। बुलाना है तो सीधे-सीधे पिताजी या बाबूजी कहो। यही अपनी परंपरा है। लेकिन तुम हो कि कुछ समझते ही नहीं।"

बच्चा अब बच्चा नहीं रहा है। कुछ-कुछ मुँहजोर भी हो चला है। कुछ दोष तो उसकी उम्र का है और कुछ अपना भी दुर्भाग्य। सच कहें तो हर कोई हिन्दी अधिकारी से जुबान तराशी करता है, चाहे वह चपरासी हो या टाइपिस्ट। हर किसी को मालूम है कि हिन्दी अधिकारी की लानत-मलानत करने का उसे जन्मसिद्ध अधिकार है। हर कोई जानता है कि सरकारी संस्थाओं के राजभाषा-कर्मी की भर्ती ही इसलिए होती है कि उसपर सब अपना फ्रस्ट्रेशन निकालें। हिन्दी विभाग वाला जो अनुवाद करे, उसमें कोई भी अपनी लंगड़ी टाँग घुसा सकता है। अनूदित सामग्री को कठिन बताकर हिन्दी पाठ को और उसके माध्यम से हिन्दी अधिकारी को कभी भी ठेंगा दिखाया जा सकता है। बस यह सोचकर दिल को बहला लेते हैं कि वे सब पराए लोग हैं। उनका क्या? किन्तु बुरा तो तब लगता है जब अपने सगे ही अपना अपमान करने लगें। बच्चे की भी क्या कहें! सयाना हो चुकने के कारण कभी-कभी अपनी इयत्ता और अस्मिता को लेकर संजीदा हो जाता है। विडंबना यह है कि उसकी इस नई -नवेली अदा के पहले शिकार हम ही बनते हैं। लिहाजा इस बार भी बच्चे ने तड़ाक से टीप दिया- "क्या डैड! हमें ही क्यों, आप और आप जैसे हजारों लोग हमारे जन्म लेने से भी कई दशक पहले से, बल्कि सच कहें तो सन उन्नीस सौ उनचास से ही पूरे देश को समझाते चले आ रहे हैं कि हिन्दी हमारी राजभाषा है, कि उसमें काम करना आसान है। समझा ही नहीं रहे हैं, सबको ट्रेनिंग भी देते आ रहे हैं। कार्यशाला कराते हैं। सम्मेलन कराते हैं। यहाँ तक कि मॉरीशस, इंग्लैंड, सूरीनाम और न्यूयॉर्क जैसी विदेशी जगहों पर भी जा-जाकर हिन्दी का नगाड़ा पीटते चले आ रहे हैं। कुछ फर्क पड़ा उससे? सारी कसरत बेकार ही तो साबित हुई है।"

हम टुकुर-टुकुर उसके मुँह की ओर देखते रह गए। आजकल के बच्चे कितने समझदार हो गए हैं! इनको समझाना आसान काम है क्या! कोरी भावुकता भरी बातों से इनके दिल को नहीं जीता जा सकता। और सिर्फ इसलिए तो ये कतई हमारी बात नहीं मान लेंगे कि हम इनके डैड हैं। जब तक कारण-कार्य संबंध न दिखाई पड़ता हो, बात पूरे तर्क के साथ न कही गई हो, ये आज की पीढ़ी आपको भाव नहीं देने वाली। अब हम कैसे इसे समझाएँ? यही सोच रहे थे कि बच्चे ने निर्णयात्मक लहजे में कहा- "डैड, आप हिन्दी अधिकारी हैं। लेकिन अंग्रेजी के बिना आपका भी काम नहीं चलता। अगर अंग्रेजी नहीं होती तो आपको कौन पूछता? अंग्रेजी है, इसलिए आप हैं। और एक बात। यदि आप केवल हिन्दी जानते तो भी आपको कोई घास नहीं डालता। क्योंकि आप अंग्रेजी भी जानते हैं और अंग्रेजी से हिन्दी तथा हिन्दी से अंग्रेजी में अनुवाद करने में सक्षम हैं, इसीलिए आप हिन्दी अधिकारी हैं। अंग्रेजी ज्ञान के बिना तो डैड आप अपना काम ही नहीं कर पाते।"

बच्चे की इस युक्ति पर हमारी बाँछें खिल आईं- "अरे हाँ! यार! तैने ये अच्छा रास्ता निकाला।" हमारा मन भर आया। हम गदगद हो आए। बेटे ने क्या बात बताई है! लेकिन फिर कुछ सोचकर मन का हैलोजन अचानक बुझ-सा गया। इसका अभिप्राय तो यह हुआ कि बेटे के मन में भी हमारे लिए यदि कुछ सम्मान है तो केवल इसलिए कि हमें हिन्दी ही नहीं, अंग्रेजी का भी ज्ञान है। यानी हमारे सम्मान का अवलंब ये निगोड़ी अंग्रेजी ही है, न कि हिन्दी। यह विचार मन में आते ही हमारे मन पर पड़ा सदियों का कुहासा अचानक छंट गया। हमें कुछ-कुछ वैसा ही तत्व-बोध हुआ, जैसा पीपल के पेड़ के नीचे बैठे, गृह-त्यागी सिद्धार्थ को भिक्षाटन से मिली खीर खाने के बाद हुआ था। अरे यार! अब समझ आया कि हर हिन्दी अधिकारी बात-बात पर अंग्रेजी क्यों झाड़ने लगता है। सच तो यही है कि यदि हिन्दी अधिकारी अंग्रेजी न झाड़े तो उसकी कोई इज्जत ही न करे।

एक दिन बेटा हमारे दफ्तर आ धमका। उसने हमारे चारों ओर निगाह दौड़ाई। कुल मिलाकर सब कुछ ठीक ही ठाक था। फिर अचानक उसने कुछ देखा और प्रश्न दागा- "डैड, आपकी सीट शौचालय के एकदम पास क्यों है?" सच कहें तो बहुत दिनों से हमारे अंतर्मन में कहीं यह खटका लगा हुआ था कि बेटे या कोई अन्य प्रबुद्ध महाशय ज़रूर एक न एक दिन ऐसा ही कोई सवाल दागेंगे। इसलिए उत्तर की तैयारी पहले से ही कर रखी थी। कॉलेज के दिनों से ही हम इसी तरह दस संभावित प्रश्न तैयार करके जाते रहे हैं और उनमें से दो-चार के फिट हो जाने पर बाइज्जत परीक्षाएं उत्तीर्ण करते रहे हैं। सो हमने बेटे के उक्त प्रश्न का समाधान प्रस्तुत किया- "बेटा, तुम तो जानते हो कि दफ्तर के लोग चाहे दिन भर अपनी सीट पर न जाएँ और इधर-उधर घूम-फिरकर टाइम पास करके घर चले जाएँ, किन्तु दिन में तीन-चार बार शौचालय तो वे अनिवार्य रूप से जाते ही हैं। इसलिए हमारी सीट शौचालय के बगल में रखी गई है, ताकि हर आते-जाते को हम गाहे-ब-गाहे राजभाषा कार्यान्वयन की जानकारी देते रहें। बल्कि सरापा हिन्दी की प्रतिमूर्ति बने रहनेवाले तुम्हारे इस अभागे बाप को देखकर उन्हें दिन में तीन-चार बार तो ऐसा लगे कि इस देश के केंद्र सरकार के दफ्तरों की राजभाषा हिन्दी है। लिहाजा शौचालय के बगल में बैठने से राजभाषा कार्यान्वयन के प्रचार-प्रसार और अनुश्रवण में बहुत सुविधा हो जाती है।" बेटा हमारी बात से कन्विन्स हो गया। हमें खुशी हुई। अंदर की जो बात हम उसे नहीं बता पाए, वह यह है कि शौचालय के पास बैठने से हमें भी कितनी सहूलियत है! आशा है बेटा जब थोड़ा और सयाना व दुनियादार हो जाएगा तो खुद ब खुद समझ जाएगा कि हिन्दी अधिकारी होना कितने जीवट का काम है। यों भी बाप के प्रति बेटों के मन में श्रद्धा तभी जगती है, जब वे खुद बाप बनकर अधेड़ हो रहे होते हैं और उनके खुद के बेटों की रेखें फूट रही होती हैं। रही साले की बात, तो उससे क्या फ़र्क पड़ता है? साले और साले के जैसी अन्य प्रजातियों के जीवों से निबटने के नए-नए तरीके तो हिन्दी अधिकारी ताज़िन्दगी ईज़ाद करता ही रहता है।

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