शनिवार, 29 जनवरी 2011

गोविन्‍द शर्मा का व्यंग्य - मेरा गुस्सा मेरा है

Image044 (Custom) (2)

मेरा पहला गुस्‍सा उस कवि पर है, जिसने सिर्फ अपनी पत्‍नी के बोलने पर कुछ कविताएं लिख दी और प्रसिद्ध हो गये। मैंने दूसरों की पत्‍नियों के संदर्भ में कितनी कविताएं लिख मारी, न यश मिला न धन। उलाहनों-शिकायतों का ढेर जरूर लग गया। मनोज कुमार की फिल्‍म उपकार ने रहस्‍योद्‌घाटन किया था- मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती...... मैंने धरती को कई जगह से खोद कर देखा है। सांप बिच्‍छू के अलावा कुछ नहीं निकला। पर धरती न सही, बैंक के लॉकर तो सोना, हीरे मोती, नकदी उगलते ही है। अखबार रोज बताते हैं कि आज फलां के तो आज फलां के बैंक लाकर की तलाशी ली गई। उसमें करोड़ों की धनराशि मिली। जमीन खरीद कर, खोद कर तो देख लिया अब एक आध लॉकर ही खरीद लेता हूं। नकदी कौन-सी हीरे मोती से कम होती है। अब मेरा गुस्‍सा बैंक मैनेजरों की तरफ। मैं एक बैंक में गया। कहा, ‘मुझे एक लॉकर चाहिए।'

‘मिल जायेगा। किस साइज का चाहिए? छोटा या बड़ा?'

‘सभी दिखा दीजिए। कलर, क्‍वालिटी, रूपये, सोने चांदी की क्‍वांटिटी देखकर फैसला करूंगा। ताजा और भरे हुए भी होने चाहिए। नकली एक भी नहीं होना चाहिए।'

‘देखिए, हम तो लॉकर किराये पर देते हैं। उसमें क्‍या रखा जाना है, यह जिम्‍मेवारी आपकी है।'

‘मैं यहां लॉकर लेने आया हूं, शादी करवाने नहीं, जो आप मुझसे पत्‍नी के भरण पोषण की जिम्‍मेवारी का वादा करवाना चाहते हो।'

‘मैं समझा नहीं....।'

‘मैं समझ गया हूं कि आप समझदार नहीं है। वरना लाखों-करोड़ों रूपये पर यूं कुंडली मार कर बैठे नहीं रहते। रूपये पार कर ऐश करते।' यह कहकर मैं गुस्‍से से भरा बाहर आ गया।

गुस्‍सा तो आना ही था। देश के भूखे खाली कटोरा लिये सड़ते अनाज को टुकुर टुकुर देखते रहते हैं। उससे भी आगे जाकर बैंक मैनेजर मुझे खाली लॉकर दिखा रहा था। जबकि कुछ लॉकरों में नोट सड़ रहे थे।

दूसरे बैंक में गया तो वहां का मैनेजर मेरे से काफी डर गया। घंटी का बटन दबा कर बंदूक वाले गार्ड को बुला लिया।

गार्ड बोला, ‘क्‍यों साहब डाकू आ गया है क्‍या?'

‘डाकू आ जाता तो तुम और मैं क्‍या कर लेते? ये भाई साहब आए हैं। इन्‍हें ससम्‍मान बाहर तक छोड़ आओ।'

जब गार्ड मुझे बाहर तक छोड़ने मेरे साथ चलने लगा तो मुझे लगा कि मैं वीआईपी बन गया हूं और मुझे सरकारी अंगरक्षक मिल गया है। पर मेरा गुस्‍सा बरकरार रहा। औरों का लाखों-करोड़ों रूपयों से भरे लॉकर और मुझे खाली। मैनेजर न हुआ मतदाता हो गया। किसी की मतपेटी फुल तो किसी की निल।

दूसरे बैंकों में भी कमोबेश यही कहानी दुहराई गई। एक बैंक मैनेजर से लाकर मांगा तो बोला- खाली नहीं है। सुनते ही मैं खुश हो गया है। यह है मेरे काम का। मैंने चहकते हुए कहा- भाई साहब, आपको किसने बता दिया कि मुझे खाली चाहिए। मुझे भरा हुआ ही चाहिए। ठूंस ठूंस कर भरा हुआ, बदहजमी की स्‍थिति पर पहुंचा हुआ लाकर दिखाइए। मैनेजर शांत स्‍वभाव का था। सामने पड़े कागजों पर अपने नाम की चिड़िया बैठाते हुए बोला- आप सिर्फ अपना ही लाकर देख सकते हैं। दूसरों का देखोगे तो पुलिस पकड़ कर ले जायेगी।

मैं तनिक गुस्‍से में बोला- अच्‍छा? तो पुलिस ने अब तक सीबीआई या विक्‍कीलीक्‍स को क्‍यों नहीं पकड़ा? यह सुनते ही बैंक मैनेजर ने चिड़िया बैठानी छोड़कर मेरी तरफ देखा और बेहोश हो गया। चपरासी अंदर आया और बोला- वाह, जब से मैनेजर बना है, रोज कुर्सी पर ही सो जाता है, कैशियर था तब एक दिन भी नहीं सोया।

उनकी बेहोशी या सोने पर गुस्‍सा करते हुए मैं बाऊंस चैक की तरह बाहर आ गया। कई मैनेजरों को रिवाज की याद दिलाते हुए कहा भी कि जो मुझे अच्‍छा सा लॉकर ला कर देगा, उसके लक का लॉक खोल दूंगा। दस प्रतिशत तो दूंगा ही, रिटायर होने पर अपना मुनीम भी रख लूंगा। पर कोई नहीं माना, इसलिए गुस्‍सा बरकरार है। मैंने अपने गुस्‍से को तसल्‍ली दी- भैया, ज्‍यादा ऊंचा मत चढ। अभी उम्‍मीद बाकी है। देश से बाहर गई बहुत सी चीजें वापस आ रही है। कुछ तलवारें आ गई हैं। गांधी जी का चश्‍मा लाने का प्रयास जारी है। डर मत, ईमानदारी, सच्‍चाई, सादगी वगैरह को नहीं बुलाया जा रहा है। देश के मालिकों ने घोषणा की है कि स्‍विस बैंक के लाकरों में भारत का धन पड़ा है, उसे वापस लाया जायेगा। उस समय एक आध भरा लाकर मिल सकता है।

तब तक मेरा गुस्‍सा मेरा है।

-----

गोविन्‍द शर्मा

ग्रामोत्‍थान विद्यापीठ

संगरिया- 335 063 (राज.)

6 blogger-facebook:

  1. इस व्यंग पर एक चुटकुला याद आ गया
    राजा-- देखो कैसा जमाना आ गया है सिफारिश से आज कल सम्मान मिलते हैं।
    शाम -- वो कैसे?
    हमारे पडोसी ने किसी महिला पर कुछ कवितायें लिखी। उसे पुरुस्कार मिला।
    उसी महिला पर मैने रचनायें लिखी मुझी नही मिला
    तुम्हें कैसे पता है कि जिस महिला पर रचना लिखी वो एक ही महिला है?
    राजा--- क्यों कि वो हमारे घर के सामने रहता है लान मे बैठ जाता और मेरी पत्नि को देख देख कर कुछ लिखता रहता था। लेकिन मै उसके सामने नही लिखता मैं अन्दर जा कर लिखता था। सब से बडा दुख तो इस बात का है कि मेरी पत्नी उस मंच की अध्यक्ष थी और उसके हाथों से ही पुरुस्कार दिलवाया गया था।
    शाम-- अरे यार छोड तु7म्हें कैसे पुरुस्कार मिलता क्या सच को कोई इतने सुन्दर ढंग से लिख सकता है जितना की झूठ को। उसने जरूर भाभी जी की तारीफ की होगी और तुम ने उल्टा सुल्टा लिखा होगा। फाड कर फेंक दे अपनी कवितायें नही तो कहीं भाभी के हाथ लग गयी तो जूतों का पुरुस्कार मिलेगा।
    बहुत अच्छा लगा व्यंग । गोविन्द शर्मा जी को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह बहुत खूब.... लाकर ही लेना था तो स्विट्ज़र लैंड का लेते ... कम से कम सरकार का संरक्षण तो मिलता ....:)

    उत्तर देंहटाएं
  3. ऐसा लोकर मिल जाये तो हमें भी बताइयेगा एक हम भी ले लेंगे :) अच्छा व्यंग्य है

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप का गुस्सा जायज है शर्मा जी!...जब हमारे देश में हीरे,मोती और नकदी उगालने वाले लौकर बिखरे पडे हो...और हम जमीन में गड्डे खोदते फिरें,यह कहां का न्याय हुआ!...लगता है 'मेरे देश की धरती..'गाने के बोल बदलने पडेंगे!..इस काम के लिए किसी बैंक मैनेजर से बढिया कवि कोई नही मिलेगा!

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------