संजय दानी की ग़ज़ल - मेरा सफ़र

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मेरा सफ़र
रात उम्मीद से भारी है, सुबह होने नहीं वाली है।
मुश्किलों से भरा है सफ़र, आज ज़ख्मों की दीवाली है।


मैं चरागों का दरबान हूं, वो हवाओं की घरवाली है।
क़ातिलों को ज़मानत मिली, न्याय मक़तूल ने पा ली है।


मै खुदा को कहां ढूढूं अब, मन्दिरों मे भी मक्कारी है।
सुख समन्दर मे पाता हूं मै, दिल किनारों का सरकारी है।


झोपड़ी रास आती मुझे, महलों का दिल अहंकारी है।
गो चढ़ाई पहाड़ों सी है, पैरों की ज़ुल्फ़ें मतवाली हैं।
पड़ चुके पैरों मे छाले गो,  फिर भी मेरा सफ़र ज़ारी है।

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5 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - मेरा सफ़र"

  1. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. ज़ख्मों की दीवाली vah..

    उत्तर देंहटाएं
  3. रात उम्मीद से भारी है, सुबह होने नहीं वाली है।
    मुश्किलों से भरा है सफ़र, आज ज़ख्मों की दीवाली है।



    बहुत ख़ूबसूरत गज़ल...

    उत्तर देंहटाएं

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