सोमवार, 31 जनवरी 2011

यशवन्‍त कोठारी का आलेख : सवाल राजनैतिक नियुक्‍तियों का

इन दिनों राजनैतिक नियुक्‍तियों की बड़ी चर्चा है। केन्‍द्र व प्रदेश की सरकारें सत्‍ता में आने के बाद ही राजनैतिक नियुक्‍तियों की कवायद में लग जाती है। हारे हुए नेता, छुटभैये कार्यकर्ता, सेवानिवृत्त्‍ा नौकरशाह, पत्रकार, कलाकार, साहित्‍यकार, विश्‍वविद्यालयों के अध्‍यापक सब राजनैतिक नियुक्‍तियों के लिये उखाड़ पछाड़ में लग जाते हैं। कांग्रेसी सरकारें ये नियुक्‍तियां जल्‍दी कर देती है। जबकि अन्‍य सरकारों को इन नियुक्‍तियों को करने में ज्‍यादा समय लगता है। एक अनुमान के अनुसार लगभग एम․एल․ए․ की संख्‍या के बराबर राजनैतिक नियुक्‍तियों के पद होते है। इन नियुक्‍तियों से सरकार, संगठन, सत्‍ता में तालमेल बनता है। कार्यकर्ता खुश होते है और अगले चुनावों में पार्टी संगठन को फायदा होने की संभावना बनती है।

विचारणीय बिन्‍दु ये है कि जिस सरकार की आयु अब डेढ़ वर्ष से भी कम रह गयी है वो सरकार तीन वर्ष या पांच वर्षों के लिये राजनैतिक नियुक्‍तियां कैसे कर सकती है। डेढ़ वर्ष बाद जब सरकार बदलेगी तब इन राजनैतिक नियुक्‍तियों का हश्र क्‍या होगा। इन पदों पर आने वाले नेता कार्यकर्ताओं का क्‍या होगा। शायद कुछ लोग त्‍याग-पत्र दे देंगे, कुछ निलम्‍बित हो जायेंगे, कुछ पदलोलुप व्‍यक्‍ति अपना पद बचाने के लिए न्‍यायालय की शरण ले लेंगे और ये नियुक्‍तियां विवाद का विषय बन जायेगी।

एक ही राजनीति दल के अन्‍दर भी कई गुट होते हैं और इन गुटों की सरकार आने पर ये नियुक्‍तियां प्रभावित होती है। कई बार मुख्‍यमंत्री बदलने मात्र से ये नियुक्‍तियां निरस्‍त हो जाती है और नये लोगों को अवसर मिलता है।

राजनैतिक नियुक्‍तियों को सबसे ज्‍यादा सत्‍ताधारी दल का पार्टी अध्‍यक्ष प्रभावित करता है। प्रतिदिन सचिवालय में मंत्री के पास ऐसे सैकड़ों आवेदन, बायो-डाटा, विवरण व सिफारिशें पहुंचती है जो इन नियुक्‍तियों को करने के लिए सरकार को मजबूर करती है।

राजनैतिक नियुक्‍तियों का एकमात्र मापदण्‍ड सत्‍ता व संगठन में प्रभावशाली व्‍यक्‍ति के प्रति निष्‍ठा व स्‍वामीभक्‍ति ही होती है। यह निष्‍ठा व स्‍वामी भक्‍ति कभी-कभी आर्थिक तराजू में भी तौली जाती है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जायेंगे जिसमें पार्टी को बड़ा चैक देने वाले किसी आयोग प्राधिकरण आदि के अध्‍यक्ष, सचिव, कार्यकारी निदेशक बन जाते है और अपना धन वसूलने में लग जाते हैं।

सामान्‍य संस्‍थाओं में इस तरह की नियुक्‍तियों से ज्‍यादा परेशानी नहीं होती है लेकिन प्रोफेशनल संस्‍थाओं में जहां विषय विशेषज्ञों की आवश्‍यकता होती है वहां पर पार्टी प्‍लेटफार्म से की गई नियुक्‍तियों से कई बार सरकार, पार्टी, संगठन आदि परेशानी में पड़ जाते हैं। कल्‍पना करिये कि एक शैक्षिक संस्‍था की जिम्‍मेदारी एक मजदूर नेता को दे दी जाती है या एक अकादमी की बागडोर एक कृषि विशेषज्ञ को दे दी जाती है और मजा ये कि ये नियुक्‍तियां चलती रहती है। पार्टी के अन्‍दर भी धड़े और हर धड़े को खुश रखने के प्रयास में योग्‍यता कहीं पीछे रह जाती है। पार्टी के अलावा यदि गठबन्‍धन सरकार है तो राजनैतिक नियुक्‍तियों का काम और भी मुश्‍किल हो जाता है। भाजपा की सभी सरकारें राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संगठन के निर्देशों की अवहेलना नहीं कर सकती है। इसी प्रकार कम्‍यूनिस्‍ट सरकारें अपने केडर से बाहर झांकना पसन्‍द नहीं करती। वी․सी․ सर्च कमेटी में ऐसे लोग आ जाते है जो अध्‍यापक पद के लिये भी योग्‍य नहीं होते है। राजनैतिक नियुक्‍तियों पर गम्‍भीरता से विचार करना आवश्‍यक है क्‍योंकि ये नियुक्‍तियां देश व प्रदेश के विकास और कामकाज को सीधे प्रभावित करती है।

राजनैतिक नियुक्‍तियों में केवल पार्टी की नहीं अन्‍य विशेषज्ञों की राय ली जानी चाहिये ताकि योग्‍य व्‍यक्‍ति चयनित होकर आ सके।

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यशवन्‍त कोठारी 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 फोनः-2670596

 

ykkothari3@gmail.com

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