शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

प्रमोद भार्गव का आलेख : कर चोरी के सुरक्षा कवच में कालाधन

हमारे देश में जितने भी गैर कानूनी काम हैं, उन्‍हें कानूनी जटिलताएं संरक्षण का काम करती हैं। कालेधन की वापिसी की प्रक्रिया भी केंद्र सरकार के स्‍तर पर ऐसे ही हश्र का शिकार है। सरकार इस धन को कर चोरियों का मामला मानते हुए संधियों की ओट में काले धन को गुप्‍त बने रहने देना चाहती है। जबकि विदेशी बैंकों में जमा काला धन केवल करचोरी का धन नहीं है, भ्रष्‍टाचार से अर्जित काली-कमाई भी उसमें शामिल है। जिसमें बड़ा हिस्‍सा राजनेताओं और नौकरशाहों का है। बोफोर्स दलाली, 2 जी स्‍पेक्‍ट्रम और राष्‍ट्रमण्‍डल खेलों के माध्‍यम से विदेशी बैंकों में जमा हुए कालेधन का भला कर चोरी से क्‍या वास्‍ता ? इसलिए प्रधानमंत्री और उनके रहनुमा दरअसल कर चोरी के बहाने कालेधन की वापिसी की कोशिशों को इसलिए अंजाम तक नहीं पहुंचा रहे क्‍योंकि नकाब हटने पर सबसे ज्‍यादा फजीहत कांग्रेसी कुनबे और उनके वरद्‌हस्‍त नौकरशाहों की ही होने वाली है। वरना स्‍विट्‌जरलैंड सरकार तो न केवल सहयोग के लिए तैयार है, अलबत्ता वहां की एक संसदीय समिति ने तो इस मामले में दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी भी दे दी है। यही नहीं काला धन जमा करने वाले दक्षिण पूर्व एशिया से लेकर अफ्रीका तक के कई देशों ने भी भारत को सहयोग करने का भरोसा जताया है। हालांकि हाल ही में मजबूरी जताते हुए वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि केंद्र सरकार धन वापिसी के लिए जमाखोरों के हित में क्षमादान योजना लागू करने पर भी विचार कर रही है। उन्‍होंने 500 से 1400 अरब डॉलर धन विदेशों में जमा होने का संकेत दिया। लेकिन मुकदमा चलने पर ही नाम उजागर करने की लाचारगी जताई। पर देर-सबेर विकिलीक्‍स करीब दो हजार भारतीय खाताधारकों के नामों का खुलासा कर देगी, इसमें कोई संशय नहीं है।

पूरी दुनिया में करचोरी और भ्रष्‍ट आचरण से कमाया धन सुरक्षित रखने की पहली पसंद स्‍विस बैंक रहे हैं। क्‍योंकि यहां खाताधारकों के नाम गोपनीय रखने संबंधी कानून का पालन कड़ाई से किया जाता है। यहां तक की बैंकों के बही खाते में खाताधारी का केवल नंबर रहता है ताकि रोजमर्रा काम करने वाले बैंककर्मी भी खाताधारक के नाम से अंजान रहें। नाम की जानकारी बैंक के कुछ आला अधिकारियों को ही रहती है। ऐसे ही स्‍विस बैंक से सेवा निवृत एक अधिकारी रूडोल्‍फ ऐलल्‍मर ने दो हजार भारतीय खाताधारकों की सूची विकिलीक्‍स को सौंप दी है। तय है जुलियन अंसाजे देर-सबेर इस सूची को इंटरनेट पर डाल देंगे। इसी तरह फ्रांस सरकार ने भी हर्व फेल्‍सियानी से मिली एचएसबीसी बैंक की सीडी ग्‍लोबल फाइनेंशल इंस्‍टि्‌टयूट को हासिल कराई है, जिसमें अनेक भारतीयों के नाम दर्ज हैं।

स्‍विस बैंक एसोसिएशन की तीन साल पहले जारी एक रिपोर्ट के हवाले से स्‍विस बैंकों में कुल जमा भारतीय धन 66 हजार अरब रूपए हैं। खाता खोलने के लिए शुरूआती राशि ही 50 हजार करोड़ डॉलर होना जरूरी शर्त है। अन्‍यथा खाता नहीं खुलेगा। भारत के बाद काला धन जमा करने वाले देशों में रूस 470, ब्रिटेन 390 और यूक्रेन ने भी 390 बिलियन डॉलर जमा करके अपने ही देश की जनता से घात करने वालों की सूची में शामिल हैं। स्‍विस और जर्मनी के अलावा दुनिया में ऐसे 69 ठिकाने और हैं जहां काला धन जमा करने की आसान सुविधा हासिल है।

केंद्र सरकार इस मामले को कर चोरी और दोहरे कराधान संधियों का हवाला देकर टालने में लगी है। दरअसल इस मामले ने तूल पकड़ा तो यूपीए सरकार को वजूद के संकट से गुजरना होगा। इसलिए सरकार बहाना बना रही है कि विभिन्‍न देशों ने ऐसी जानकारी केवल कर संबंधी कार्यों के निष्‍पादन के लिए दी है। खाताधारियों के नाम सार्वजनिक करने के लिए चल रहे करारों को बदलना होगा। दोहरे कराधान बचाव संधि में बदलाव के लिए इन देशों के साथ नए करार करने होंगे। भारत सरकार का रूख काले धन की वापिसी के लिए साफ नहीं है। यह इस बात से जाहिर होता है कि कुछ समय पहले भारत और स्‍विट्‌जरलैंड के बीच दोहरे कराधान संशोधित करने के लिए संशोधित प्रोटोकॉल संपादित हुआ था। लेकिन इस पर दस्‍तखत करते वक्‍त भारत सरकार ने कोई ऐसी शर्त पेश नहीं की जिससे काले धन की वापिसी का रास्‍ता प्रशस्‍त होता। जबकि अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर संपन्‍न होने वाले ऐसे किसी भी दोहरे समझौते में राष्‍ट्रीय हित सर्वोपरि होना चाहिए। दुनिया में 77.6 प्रतिशत काली कमाई ट्रांसफर प्राइसिंग (संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्‍य अंतरण) के जरिए पैदा हो रही है। इसमें एक कंपनी विदेशों में अपनी सहायक कंपनी के साथ सौदों में 100 रू. की एक वस्‍तु की कीमत 1000 रू. या 10 रू. दिखाकर करों की चोरी और धन की हेराफेरी करती है। भारत में संबद्ध फर्मों के बीच इस तरह के मूल्‍य अंतरण में हेराफेरी रोकने का प्रयास 2000 के आसपास वजूद में आने लगा था, पर सरकार इसको और कड़ा कर अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की सोच रही है।

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ संयुक्‍त राष्‍ट्र ने एक संकल्‍प पारित किया है। जिसका मकसद है कि गैरकानूनी तरीके से विदेशों में जाम काला धन वापिस लाया जा सके। इस संकल्‍प पर भारत समेत 140 देशों ने हस्‍ताक्षर किए हैं। यही नहीं 126 देशों ने तो इसे लागू कर काला धन वसूलना भी शुरू कर दिया है। यह संकल्‍प 2003 में पारित हुआ था, लेकिन भारत सरकार इसे टालती रही। आखिरकार 2005 मे उसे हस्‍ताक्षर करने पड़े। लेकिन इसके सत्‍यापन में अभी भी टालमटूली बरती जा रही है। स्‍विट्‌जरलैंड के कानून के अनुसार कोई भी देश संकल्‍प को सत्‍यापित किए बिना विदेशों में जमा धन की वापिसी की कार्रवाई नहीं कर पाएगा। हालांकि इसके बावजूद स्‍विट्‌जरलैंड सरकार की संसदीय समिति ने इस मामले में भारत सरकार के प्रति उदारता बरतते हुए दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी दे दी है। इससे जाहिर होता है कि स्‍विट्‌जरलैंड सरकार भारत का सहयोग करने को तैयार है। लेकिन भारत सरकार ही कमजोर राजनीतिक इच्‍छाशक्‍ति के चलते पीछे हट रही है।

हालांकि दुनिया के तमाम देशों ने कालेधन की वापिसी का सिलसिला शुरू भी कर दिया है। इसकी पृष्‍ठभूमि में दुनिया में आई वह आर्थिक मंदी थी, जिसने दुनिया की आर्थिक महाशक्‍ति माने जाने वाले देश अमेरिका की भी चूलें हिलाकर रख दी थीं। मंदी के काले पक्ष में छिपे इस उज्‍जवल पक्ष ने ही पश्‍चिमी देशों को समझाइश दी कि काला धन ही उस आधुनिक पूंजीवाद की देन है जो विश्‍वव्‍यापी आर्थिक संकट का कारण बना। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका की आंखें खुलीं कि दुनिया के नेता, नौकरशाह, कारोबारी और दलालों का गठजोड़ ही नहीं आतंकवाद का पर्याय बना ओसामा बिन लादेन भी अपना धन खातों को गोपनीय रखने वाले बैंकों में जमा कर दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

इस सुप्‍त पड़े मंत्र के जागने के बाद ही आधुनिक पूंजीवाद के स्‍वर्ग माने जाने वाले देश स्‍विट्‌जरलैंड के बुरे दिन शुरू हो गए हैं। नतीजतन पहले जर्मनी ने ‘वित्तीय गोपनीय कानून' शिथिल कर काला धन जमा करने वाले खाताधारियों के नाम उजागर करने के लिए स्‍विट्‌जरलैंड पर दबाव बनाया और फिर इस मकसद पूर्ति के लिए इटली, फ्रांस, अमेरिका एवं ब्रिटेन आगे आए। अमेरिका की बराक ओबामा सरकार ने स्‍विट्‌जरलैंड पर इतना दबाव बनाया कि वहां के यूबीए बैंक ने कालाधन जमा करने वाले 17 हजार अमेरिकियों की सूची तो दी ही 78 करोड़ डॉलर काले धन की वापिसी भी कर दी। अब तो मुद्रा के नकदीकरण से जूझ रही पूरी दुनिया में बैंकों की गोपनीयता समाप्‍त करने का वातावरण बनना शुरू हो चुका है। इसी दबाव के चलते स्‍विट्‌जरलैंड सरकार ने कालाधन जमा करने वाले देशों की सूची जारी की है। स्‍विस बैंक इस सूची को जारी करने में देर कर भी सकता था, लेकिन इसी बैंक से सेवा निवृत्त हुए रूडोल्‍फ ऐल्‍मर ने जो सूची विकिलीक्‍स के संपादक जूलियन अंसाजे को दी है, उसका जल्‍द इंटरनेट पर खुलासा होना तय है। इसी सूची में दो हजार भारतीय खाताधारियों के नाम बताए जा रहे हैं। इस अंतरराष्‍ट्रीय काले कानून को खत्‍म करने के दृष्‍टिगत अंतरराष्‍ट्रीय दबाव भी बन रहा है।

स्‍विस बैंकों में गोपनीय तरीके से काला धन जमा करने का सिलसिला पिछली दो शताब्‍दियों से बरकरार है। लेकिन कभी किसी देश ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। आर्थिक मंदी का सामना करने पर पश्‍चिमी देश चैतन्‍य हुए और कड़ाई से पेश आए। 2008 में जर्मनी की सरकार ने लिश्‍टेंस्‍टीन बैंक के उस कर्मचारी हर्व फेल्‍सियानी को धर दबोचा जिसके पास कर चोरी करने वाले जमाखोरों की लंबी सूची की सीडी थी। इस सीडी में जर्मन के अलावा कई देशों के लोगों के खातों का ब्‍यौरा भी था। लिहाजा जर्मनी ने उन सभी देशों को सीडी देने का प्रस्‍ताव रखा जिनके नागरिकों के सीडी में नाम थे। अमेरिका, ब्रिटेन और इटली ने तत्‍परता से सीडी की प्रतिलिपी हासिल की और धन वसूलने की कार्रवाई शुरू कर दी।

संयोग से फ्रांस सरकार के हाथ भी एक ऐसी ही सीडी लग गई। फ्रेंच अधिकारियों को यह जानकारी उस समय मिली जब उन्‍होंने स्‍विस सरकार की हिदायत पर हर्व फेल्‍सियानी के घर छापा मारा। दरअसल फेल्‍सियानी एचएसबीसी बैंक का कर्मचारी था और उसने काले धन के खाताधारियों की सीडी बैंक से चुराई थी। फ्रांस ने उदारता बरतते हुए अमेरिका, इंग्‍लैंड, स्‍पेन और इटली के साथ खाताधारकों की जानकारी बांटकर सहयोग किया। दूसरी तरफ ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनोमिक कार्पोरेशन एण्‍ड डवलपमेंट इंस्‍टीट्‌यूट ने स्‍विट्‌जरलैंड समेत उन 40 देशों के बीच कर सूचना आदान-प्रदान संबंधी 500 से अधिक संधियां हुईं। शुरूआती दौर में स्‍विट्‌जरलैंड और लिश्‍टेंस्‍टीन जैसे देशों ने आनाकानी की, लेकिन आखिरकार अंतरराष्‍ट्रीय दबाव के आगे उन्‍होंने घुटने टेक दिए। अन्‍य देशों ने भी ऐसी संधियों का अनुसरण किया, लेकिन भारत ने अभी तक एक भी देश से संधि नहीं की है। हालांकि प्रणव मुखर्जी अब संकेत दे रहे हैं कि 65 देशों से सरकार बात करने का मन बना रही है।

pramodsvp997@rediffmail.com

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन-473-551

लेखक वरिष्‍ठ कथाकार एवं पत्रकार हैं।

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------