मंगलवार, 11 जनवरी 2011

गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की कविताएँ व दोहे

achoot                                 

   नया साल 


(खुले आसमान के नीचे डेरे वाले भरत राष्ट्र को नव वर्ष की शुभ कामनाएँ )


एक साल घट गया तुम्हारा और उमर बढ़  गई काल की,
कौन बधाई कौन कामना ऐसे में दूँ न ए साल की
कैसा साल खुशहाली कैसी जो भूखे तारे गिनवाए
कोने में कंबल काँपे तो  खुली रजाई उसे चिढ़ाए
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल गए आए पर किसको क्या दे पाए?
 
तन पर वस्त्र पेट में रोटी तब माथे   पर चंदन भाए
भूखी मरी ठंड  में धनिया होरी कैसे गीत सुनाए
जो भूखे गाता हो गाए रामराज्य लाता हो लाए
अपने राम तो एक बेर को भूखे बैठे आस लगाए।
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल गए आए पर किसको क्या दे पाए?
 
कोई लाया स्वर्ग धरा पर कोई लाया पावन गंगा
फिर भी रहा अछूत सभी से झोपड़ वाला मानव नंगा
नाच रहा है बिना नचाए जो शर्माता हो शरमाए 
फटी लँगोटी के भीतर की कोई कब तक देह छुपाए?
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल ग ए आए पर किसको क्या दे पाए?
  
कई  साल भूकंप खा गया  कई वर्ष मानवी त्रासदी
आगलगे घर-बार छोड़ कर फुटपाथों पर खुशी बाँट दी
भूखे नींद न आई दिन भर डर में जग कर रात बिताए 
घाटी से संसद तक पर हैं दुश्मन बैठे घात लगाए।
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल गए आए पर किसको क्या दे पाए?
 
दिन को लिखूँ रात अँधियारी और रात को लिखूँ सवेरा
थाली का बैंगन बन डोलूँ  यह स्वभाव भी रहा न मेरा
भले चाटता मिले धूल वह ,भले सफलता एक न पाए
चाह रहा फिर भी जग मुझको इधर-उधर लुढ़काता जाए।
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल गए आए पर किसको क्या दे पाए?

प्यार भरा यदि घर में हो तो बच्चा भी भूखा रह लेगा
मन के दर्द व्यथाएँ सारी दिल के अंदर ही रख लेगा
नव वसंत की आशा में ही हर उपवन पतझर सह जाए   
बढ़ी उमर घट जाए काल की और वही तुमको लग जाए।      
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल ग ए आए पर किसको क्या दे पाए?

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पहले सरकार तो बने!


हे जंगल के राजा शेर!
आपके नाम का सुनकर शोर
पूरे जंगल की प्रजा बहुत खुश है
बस बच्चे और बूढ़े थोड़ा डर रहे हैं
फिर भी आप चिंता न करें मान्यवर! 
बच्चों के लिए लोलीपोप और बूढ़ों  के लिए
च्यवनप्राश का बेहतरीन प्रबंध कर लिया गया है
ये चीजें आपके भतीजे शेरू और ताऊ शेरखान के हाथो
जंगल की महा रैली में वितरित की   जाएँगी
इसके खर्च के लिए सियार उद्योग मंडल ने
राष्ट्रीय शेर दल के नाम सवा करोड़ का
चेक भी काट दिया है


रही युवक और युवतियों की बात
उन्हें आरंभ से शराब सप्लाई की जा रही है
चुनाव की चर्चा के केंद्र में
कोई और नहीं
बस आप ही हैं
अगर याद हो
कभी आपके ताऊ का घोषणा पत्र
हरिशंकर परसाई नाम के
एक गरीब साहित्यकार ने लिखा था
अच्छा खासा असर हुआ था उसका
केंद्र में सरकार भी बनी थी
आपके ताऊ की


हम भी कुछ-कुछ वैसा ही कर रहे हैं
और उनके भतीजे गुणशेखर से
बहुत ही सुंदर घोषणापत्र
तैयार करवा रहे हैं
अबकी आप को दूब नहीं
पश्मीना की शालें दबानी होंगी
कोमल-कोमल जबड़ों में
अबकी जल्दी कदापि नहीं करेंगे
ऊनकटी यानी निर्वस्त्र
भेंड़ें जब मर जाएँगी ठंड से
तब उन्हें आराम से मिल-बाँट के खाया जाएगा
बुज़ुर्ग पशु-नारियों के वास्ते
सूरत की चिराग साड़ियों की सवा-सवा लाख की दो खेपें
खुद उत्पादक ने भेज दी हैं
अपने ट्रांसपोर्ट से।


आपके नाम के बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर
टाँग दिए गए हैं गली-गली
विरोधी दलों में खूब मची है खलबली 
पर आप निश्चंत रहें सरकार!
कोई नहीं आ पाएगा सामने
अव्वल तो आपको निर्विरोध
चुन ही लिया जाएगा
फिर भी यदि कहीं से भी दिखा खतरा
तो खा लिए जाएँगे साले (सारे) विरोधी
फिर कोई न उठेगा झंडा
न गाएगा तराने


हमारे जंगल के नए लोकतंत्र का
यह नया  मिजाज़ है
कि-
जंगल की चहारदीवारी  में
सभी रहें स्वतंत्र/सुरक्षित
आपका यह मुद्दा विशेष विचारणीय है
कि-
हम क्यों करें जाया अपना पशु-संसाधन
क्यों करें निर्यात
वह भी संक्रमण काल में
आपका चुनाव जीतना भी है सुनिश्चत
बस बच्चों और बूढ़ों को
है थोड़ा-सा सँभालना
थोड़ा-सा धैर्य रखना
चुनाव जीतते ही 
आपकी ओर से कर दिया जायेगा ऐलान
कि-न तो कोई सुनाए शेरों की डरावनी कहानियाँ
और, न ही दिखाए जाएँ कोई नकारात्मक दृश्य
किसी भी चैनल पर
इसके लिए गठित कर दिया जाएगा
एक सर्वशक्तिमान सेंसर आयोग
उसमें भर्ती किए जाएँगे/जाएँगी
चुनिंदा नवयुवक शेर
और आप जैसे न्यायप्रिय प्रौढ़ राजा तक
पहुँचाने के लिए ताज़ा-ताज़ा समाचार
मांसल नवयुवती शेरनियाँ


हाँ थोड़ा-सा ध्यान यह ज़रूर रखा  जायेगा कि
न हों आपकी सगी भतीजियाँ/भानजियाँ
लेकिन रानी की भतीजियों को अपवाद ज़रूर माना जाएगा
इससे जंगल का लोकतंत्र
खूब फूले-फलेगा
उसका पत्ता-पत्ता खिलेगा
हे जंगल के राजा! आप तो लड़ो चुनाव
बाकी--
बाकी का क्या है वह भी देख लिया जाएगा
पहले सरकार तो बने!

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   गई छाँह छतनार
कउनु चोरु अउ साह कउनु ,ईका कउनु निसान।
जो  नीके  ते  मढ़ि सका, ऊ  बड़का  परधान।।


का चंपा, का चमेली, का रसाल, कचनार।
बगिया के बिरवा गए ,गई छाँह छतनार।।


जब ते बिरवा कटे हइँ ,राँड़ भई खलझार।
खूब सतावइ दुपहरी,कहि-कहि रोजु छिनार।।


छत्ते की मधुमक्खियाँ,लावइँ जउ मधु ढारि।  
बइठि अकेलेन ऊ सबुइ ,रानी जाइ डकारि ।।


कीका कोई दोसु दे,सबके सब मज़बूर।
च्याँटा ठेकेदारु हइ, चेंटी हइँ  मज़दूर।।


पहिले ते जो धरिसि हइ, रानी खूब चोराइ।
भूखी चेंटी जुटी हइँ ,खइहइँ आजु अघाइ।।
                                                      

   
   
   
अवधी दोहे   
कउनु चोरु अउ साह कउनु , ईका कउनु निसान।
जो  नीके  ते  मढ़ि सका, ऊ  बड़का  परधान।।


का चंपा, का चमेली, का रसाल, कचनार।
बगिया के बिरवा गए ,गई छाँह छतनार।।


जब ते बिरवा कटे हइँ ,राँड़ भई खलझार।
खूब सतावइ दुपहरी,कहि-कहि रोजु छिनार।।


छत्ते की मधुमक्खियाँ,लावइँ जउ मधु ढारि।  
ब ठि अकेलेन ऊ सबुइ ,रानी जाइ डकारि ।।


कीका कोई दोसु दे,सबके सब मज़बूर।
च्याँटा ठेकेदारु हइ, चेंटी हइँ  मज़दूर।।


पहिले ते जो धरिसि हइ, रानी खूब चोराइ।
भूखी चेंटी जुटी हइँ ,खइहइँ आजु अघाइ।।


मानवता की फ़सल के, सबते बड़े किसान।
दउआ के दरबार सब, बाइस पसेरी धान।।


भोरहेन एकु सिपेहवा,लइगा पियक बोलाइ।
का जानी कब लउटिहइँ, कि  जइहइँ हुँवइ  हेराइ।

  बढ़ी सिपेहवस दोस्ती, गोसु बनइ  घर माँह।
बंद रहइ जो जेल कइ, खुलि गइ फिर ते राह।।
   

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-डाक्टर  गंगा प्रसाद शर्मा'गुणशेखर'

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