बुधवार, 5 जनवरी 2011

प्रभा मजुमदार की कविताएँ -

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बाजा़र को चाहिये

नख से शिख तक

औरत की देह

जिसकी नुमाइश कर

वह बेच सके

साबुन और क्रीम

शैंपू और लिपस्टिक

 

बाजार को चाहिये

करवाचौथ करती हुई

औरतों के जमघट

जिनसे बिक सकें

पूजा का सामान

बिंदी, चूड़ियाँ और चुनरी

 

बाजा़र को चाहिये

अभावों से ग्रस्त

फतवों से त्रस्त

सताई हुई औरतों के आँसू

जिनकी संजीवनी से

चल निकले

अनाम / अनजान चैनल्स

बंद पड़े अखबार

छुटभैयों की परिचर्चायें

बेटी की शादी का

आतंक बना रहे

हिंदुस्तानी बाप पर हमेशा

ताकि बिक सके

फिक्स्ड डिपॉज़िट

और इन्वेस्टमेंट के प्लान

बीमा कंपनियों को

संबल देती

असहाय आश्रित औरतें

और उनका इन्तजाम करते

जन्मभर किश्तें भरते हुए

जिम्मेदार पति

 

बाजा़र को चाहिये

पारदर्शी कपड़ों में

औरतों की फैशन परेड

निजी संबंधों की क्लिपिंग

जो बाँधे रख सके

दर्शकों की टकटकी

रूढ़ियाँ भी बिकती हैं यहाँ

और अंधी अश्लीलता भी

किसी भी चौखट पर हो

बाजा़र खड़ा है

उसे भुनाने के लिये

औरत को बनना है

शेविंग क्रीम से

लक्जरी कार तक

किसी भी चीज़ का विज्ञापन

उसकी इमेज

पुरानी रस्मों से लेकर

नये ब्रांड की

मंहगी शराब बेच सकने की

बाजा़र का नहीं चाहिये

बगैर ब्रांड

और लेबल की औरत

जो बन सकती है

खरीद और बिक्री की

शर्तों की लिये चुनौती।

 

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समान धरातल पर

राम घर चल

बहुत थक गया है

थोड़ा आराम कर.

 

सुबह अखबार पूरा नही पढ़ा

टी.वी. इत्मीनान से नहीं देखा

फोन पर गप्पें नहीं मारी.

 

बड़े दिनों से

दोस्तों को घर नही बुलाया.

ऑफिस का बड़ा टेंशन होता है

थोड़ा सा चेंज चाहिये.

नेट पर सर्फिंग कर

एस एम एस पर जोक्स फार्वर्ड कर.

 

गर्म चाय की चुस्किया

पकौडों के साथ ले.

टी वी पर सुन्दर बालाओं को देख

पत्नी की झिक झिक पर

ध्यान मत दे

बड़बड़ाती रहती है.

 

आंख मूद पड़ा रह

तू धरती पर सर्वश्रेष्ठ प्राणी है

इसका अनुभव कर .

रमा घर जा

बच्चे बांट जोह रहे हैं.

 

घर पर चाय का इंतजार हो रहा है.

महरी काम पर नहीं आयी

सब बिखरा बिखरा है.

बच्चों का होम वर्क अधूरा है

उसे पूरा कराना है.

जल्दी घर समेट

बढिया नाश्ता बना.

 

जल्दी जल्दी हाथ चला

बहुत काम बाकी है.

आराम का नाम मत ले

ये हराम होता है.

अपनी बीमारी पर

छुट्टियां मत ले.

 

घर पर मेहमान आते हैं

तीज्- त्योहार

बच्चों के इम्तिहान होते हैं

ऊंची आवाज मत कर

किसी से अपेक्षा मत रख

फुर्ती से काम समेट

सुबह जल्दी उठना है.

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2 blogger-facebook:

  1. विग्यापन और समान धरातल पर दोनों कवितायें क़ाबिले-तारीफ़ हैं बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत शानदार.
    बधाई स्वीकार करें..

    उत्तर देंहटाएं

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