गुरुवार, 13 जनवरी 2011

संजय दानी की ताज़ा ग़ज़ल

तेरा मेरा ये जो रिश्ता है सनम ,
बस इसी का नाम दुनिया है सनम।


इश्क़ की अपनी रिवायत होती है ,
लैला मजनूं का ये तुहफ़ा है सनम।


ना करूंगा जग में ज़ाहिर तेरा नाम
,सच्चे आशिक़ का ये वादा है सनम।


हम हिफ़ाज़त ग़ैरों से कर लेंगे पर,
मुल्क को अपनों से ख़तरा है सनम।


बिकने को तैयार है हर इंसां आज,
कोई सस्ता कोई महंगा है सनम।


चांदनी फिर बादलों के साथ है ,
चांद का दुख किसने समझा है सनम।


है चराग़ों के लिये मेरी दुआ ,
आंधियों से कौन डरता है सनम।


दिल समन्दर की अदाओं का मुरीद,
बेरहम, साहिल का चेहरा है सनम।


इस जगह चोरी न करना इस जगह
,कोई अफ़सर कोई नेता है सनम।


मेरा पुस्तैनी मकां है उस तरफ़ ,
दिल लकीरों से न डरता है सनम।


दानी को  तुमने ख़ुदा माना है तो,
क्यूं ख़ुदा से अपने पर्दा है सनम।

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5 blogger-facebook:

  1. बेनामी6:14 pm

    बिकने को तैयार है हर इंसा आज‌
    कोई मंहगा है कोई सस्ता है
    उत्तम अभिव्यक्ति प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत दिलचस्प .....!

    उत्तर देंहटाएं
  3. ना करूंगा जग में ज़ाहिर तेरा नाम
    ,सच्चे आशिक़ का ये वादा है सनम।
    kyu badha deten hai bechainiya logon ki? bahoot sunder ghaqzal,badhai

    उत्तर देंहटाएं
  4. eब्नामी जी , इन्डियन सीटीजन, ाक्की जी और विजय वर्मा जी को बहुत बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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