रविवार, 23 जनवरी 2011

यशवन्‍त कोठारी का आलेख - स्‍त्री प्रजाति के खत्‍म होने का खतरा

क्‍या एक दिन संपूर्ण विश्‍व से स्‍त्री प्रजाति के खत्‍म हो जाने का खतरा शुरू हो जायेगा क्‍या भारत में स्‍त्रियों कि संख्‍या पुरुषों के मुकाबले में निरंतर गिर रही है और क्‍या पुरुषों के मुकाबले कम होती स्‍त्रियों के कारण समाज और जीवन में भयानक परिवर्तन आ सकते हैं ये कुछ प्रश्‍न है जो आजकल बुद्धिजीवियों को सोचने को मजबूर कर रहे है आइये पहले आंकड़ों की भाषा देखें।

भारत में 1801 में 10,000 पुरुषों के मुकाबले में 872 स्‍त्रियां थी जो अब 1881 में 1821 रह गयी है। और शायद अगली जनगणना तक 804 रह जायेगी ऐसी स्‍थिति चीन की भी है चीनी समाज इस भयंकर त्रासदी को ज्‍यादा बुरी तरह से झेल रहा है और वहां पर हजारों पुरुष शादी से वंचित है पूरे चीनी समाज का ढांचा चरमरा रहा है। भारत के दक्षिण राज्‍यों में स्‍थिति थोड़ी ठीक है मगर पंजाब,हरियाणा और दिल्‍ली में स्‍थिति और भी भयावह है।

पंजाब में प्रति 1000 पुरुष के पीछे 772 महिलायें व हरियाणा में 765 ही हैं। हरियाणा के कुछ स्‍थानों में ग्रामीण महिलाओं की संख्‍या तो 715 तक रह गई है। स्‍त्री पुरुषों के अनुपात में यह दूरी सोचने को मजबूर करती है। गांवों में शहरों की तुलना में स्‍त्रियों का अनुपात ज्‍यादा है हर वर्ष 13 मिलियन लड़कियों में से मात्र 11 मिलियन जीवित रहती है। 2 मिलियन लड़कियां मर जाती है। प्रकृति स्‍त्रियों की रक्षा करती है,वे प्राकृतिक रूप से ज्‍यादा ताकतवर है,मगर उनका अनुपात कम हो रहा है। किसी छोटी मोटी बीमारी से यदि 100-200 व्‍यक्‍ति मर जाते है तो बावेला मच जाता है मगर गर्भपात से इस वर्ष 6 लाख मौतें हुई और किसी ने आवाज तक नहीं उठाई।

महिलाओं की गिरती हुई जनसंख्‍या के क्‍या कारण है और इस सम्‍पूर्ण अव्‍यवस्‍था के सामाजिक सरोकार क्‍या है? महिलाओं पर अत्‍याचार लड़की पैदा करने के दुख,बांझ होने के कष्‍ट उनके स्‍वास्‍थ्य के प्रति उपेक्षा उनके अधिकारों का हनन,जीना नरक के समान ,मरना आसान। दान-दहेज खा लो। बहु को जला दो। कामकाजी महिलाओं के अपने कष्‍ट और उपर से भ्रूण हत्‍याओं का अबाध चलता सिलसिला। राजस्‍थान के जैसलमेर जिले में आज भी नवजात बच्‍चियों को मार दिया जाता है। भ्रूण के मादा की संभावना मात्र से भ्रूण लिंग परीक्षण होते हि गर्भपात करा देना। मादा जाति को नष्‍ट करने का षड़यंत्र लगती है।

में ही भ्रूण नष्‍ट करने की 50,000 से अधिक घटनायें हुई है। और इसी कारण समाज में महिलाओं की संख्‍या बड़ी तेजी से कम हुई। भ्रूण हत्‍याओं पर प्रतिबंध तो लगा मगर इससे समस्‍या सुलझी नहीं। शायद नहीं क्‍योंकि डाक्‍टर और निजी क्‍लिनिक सोनोग्राफी क्रोमोसोम संबंधी बीमारियों तथा यौन रोगों के नाम पर भ्रूण परीक्षण कर रहे है और भ्रूण हत्‍या भी जारी है।

वास्‍तव में भ्रूण हत्‍या या बालिका हत्‍या को जनसंख्‍या नियंत्रण के रूप में सोचा जा रहा है,जो गलत है। पुत्र प्राप्‍ति के प्रबल कारकों में से एक है मादा भ्रूण हत्‍या।

गर्भपात को कानूनी मान्‍यता मिल जाने के कारण भ्रूण हत्‍या को बढ़ावा मिला है हमारे देश में स्‍त्री पुरुष अनुपात में निरंतर गिरावट आ रही है, क्‍योंकि संतान प्राप्‍ति के नाम पर केवल पुत्र की ही चाहत है, और परिवार कल्‍याण कार्यक्रमों के कारण केवल एक या दो बच्‍चे और वे भी नर। चीन इस संकट को झेल रहा है,वहां एक बच्‍चा एक परिवार के नारे के कारण ना भ्रूण ही विकसित हुये अब स्‍त्री पुरुष अनुपात गड़बड़ा गया है स्‍त्रियों के अनुपात में गिरावट के सामाजिक परिणाम अवश्‍य ही खराब होंगे। निरक्षरता,खराब ,स्‍वास्‍थ्‍य आदि कि कारण लोगों में मनोवैज्ञानिक यौन कुण्‍ठाओं का विकास होगा। जो आगे जाकर पूरे समाज को विकृत करेगा। इस देश का पुरुष हर काम स्‍त्री के माथे डाल देना चाहता है,मगर वह कन्‍या का बाप नहीं बनना चाहता हैं। परिवार कल्‍याण संबंधी गर्भ निरोधकों का इस्‍तेमाल भी पुरुष नहीं करना चाहता। हानिकारक प्रभावों के बावजूद यह सब भी स्‍त्री को जिम्‍मेदारी मानी जाती है। मादा भ्रूण हत्‍याओं पर रोक तथा महिलाओं के प्रति अत्‍याचारों को कम करने के लिये पुरुषों को परिवार कल्‍याण कार्यक्रमों को अपने स्‍तर पर अपनाना चाहिये। भ्रूण परीक्षण संबंधी कानूनों के कड़ाई से लागू करने की आवश्‍यकता है।

जनसंख्‍या वृद्धि के नियंत्रण को रोकने के लिये आर्थिक दण्‍ड व्‍यवस्‍था भी लागू की जा सकती है। भ्रूण परीक्षण को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध माना जाना चाहिये। सन्‌ 2024 तक हमारे देश की जनसंख्‍या 140 करोड़ हो जाने की संभावना है और यदि इसी दर से मादा भ्रूण हत्‍यायें होती रही तो शायद तब तक स्‍त्री प्रजाति को अस्‍तित्‍व की संकट की लडाई लड़नी पड़ेगी। यदि स्‍त्रियों का अस्‍तित्‍व नहीं रहेगा,तो मानवता कहां बचेगी? पूरी पृथ्‍वी पर एक नवीन प्रकार का पर्यावरणीय असंतुलन आ जायेगा। और स्‍त्रियां नष्‍ट हो जायेगी। शायद ऐसा नहीं होगा, क्‍योंकि वंश चलाने के लिये मनुष्‍य नामक जाति कि अस्‍तित्‍व को बनाये रखने के लिए स्‍त्री प्रजाति का संरक्षण ही नहीं उसका सही अनुपात भी आवश्‍यक हैं केवल सरकारी सोच या रीति नीति से कुछ नहीं होगा। पूरे समाज को अपने सरोकारों की चिंता करते हुये स्‍त्री की रक्षा में जुट जाना होगा। यह काम केवल सरकार या महिला संगठनों का ही नहीं है। यह तो सबका है। सबको मिलकर स्‍त्री जाति की रक्षा और अनुपात को बढ़ाने के काम करना होगा,क्‍योंकि भारत में स्‍त्री संबंधी अधिकांश आंदोलनों का नेतृत्‍व पुरुषों ने किया है यथा राजा राममोहन राय, स्‍वामी दयानन्‍द ,ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर, गांधी नेहरू जे पी आदि। अतः यदि परिवार समाज और राष्‍ट्र स्‍त्रियों की रक्षा का काम नहीं करेगा तो प्रकृति करेगी, क्‍योंकि एक सीमा के बाद प्रकृति किसी अन्‍याय को बर्दाश्‍त नहीं करती हैं।

परिवार कल्‍याण, सुरक्षित मात्रृत्‍व तथा इस तरह के अन्‍य कार्यक्रमों की तरह ही स्‍त्रियों की सुरक्षा हेतु भी एक राष्ट्रीय कार्यक्रम की आवश्‍यकता है ताकि वे सुरक्षित रहें। स्‍त्रियां ही नहीं होगी जो मानव का अस्‍तित्‍व ही समाप्‍त हो जायेगा। हमें इस संकट को समझना होगा। समय रहते चेतना होगा।

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यशवन्‍त कोठारी

86,लक्ष्‍मी नगर ब्रहमपुरी बाहर,

जयपुर-302002

फोनः-0141-2670596

2 blogger-facebook:

  1. देश में भ्रूण हत्या रोकने के कानून बेहद सख्त है , इनका पालन नहीं होता है |
    बहरहाल, समयोचित आलेख है , किन्तु शीर्षक प्रतिकर्षित करता है |

    उत्तर देंहटाएं
  2. होइहै वही जो राम रचि राखा....जो जस करम सोई फ़ल चाखा....

    उत्तर देंहटाएं

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