सोमवार, 24 जनवरी 2011

मालिनी गौतम की कविताएँ : माँ और कैक्टस

माँ

mother and child

वह खड़ी है

हताश,नि:शब्द,अकेली

ठगी हुई सी।

कितना कुछ कहना चाहती है

पर कुछ कह नही पाती

महीने बीते कुछ लिख नही पाती

शब्द अंदर ही अंदर घुमड़ते रहते हैं

पर कागज़ पर कोई आकार

उभर नहीं पाता

कलम आँख-मिचौली

खेल रही है उसके साथ।

 

झरने सा बहता उसका जीवन

तालाब के गंदे बदबूदार

पानी सा ठहर गया है,

हर पल ठगे जाने की

अनुभूति होती है।

 

जो संबंध जीने का आधार थे

जिनमें कभी खुलापन था

रौशनी थी, चमक थी

उन्हीं संबंधों में आज

घुटन और बंद कमरे की सीलन

का आभास होता है।

 

क्या सभी संबंधों का

यही हश्र होता है?

मैं, मेरा, मुझे,यही शब्द

गूँजते हैं कानों के आस-पास

इन शब्दों में कहीं भी वह

अपना अस्तित्व नहीं तलाश पाती

महसूस करती है खुद को

उपेक्षित,आश्रित,निराधार।

 

सब कुछ छोड़कर जाना चाहती है

इस घुटन से बाहर निकलना चाहती है

ताजी हवा साँसों में

भरकर जीना चाहती है

पर न जाने कौन सी

बेड़ियाँ पैरों को जकड़ लेती हैं।

 

झूले में सोते हुए

अपने बच्चे की मुस्कान पर

सार जहाँ लुटा देती है और

खुद भी मुस्करा उठती है।

 

अपने मातृत्व पर गर्व

होता है उसे,

और सब कुछ भूलकर

एक हाथ से झूला देते हुए

रसोईघर के काम

समेटने लगती है।

 

---

कैक्टस

इन पथराई सी बंद आँखों में

बसता है एक आँगन,

एक बचपन और कुछ सपने ।

 

आँगन में आज भी

उगी है जूही की बेल

जिस पर बिछे हैं

अनगिनत सफेद महकते सितारे।

 

जोर से मैं साँस लेती हूँ

और तन-मन में

पसर जाती है मादक खुशबू,

पर ज्यों ही हाथ आगे बढ़ाकर

तोड़ना चाहती हूँ

एक सितारा अपने दामन के लिये

ओस की बूँद की तरह

भाप बन उड़ जातें हैं सब सितारे।

 

मेरे चारों ओर

छा जाता कोहरा

जिसमें घुटता है दम

मैं खोल देती हूँ आँखें

छटपटा कर।

 

बारिश के दिनों में

इमली के चिये और

आम की गुठली से

निकलते कुल्ले

रात को मेरे सपनों में बन जाते थे

घटादार पेड़

कच्ची इमली और खट्टी अमिया

का स्वाद घुल जाता मुँह में।

 

पर बाबूजी नें यह कहकर

उखाड़ दिया उन कुल्लों को

कि हमारा आँगन बहुत

छोटा है इन बड़े पेड़ों के लिये

उन्हें डर था कि कहीं घर की

दीवारें हिलने ना लगें।

 

बाबूजी के बनाये हुए

आम की गुठली के

पपैये को बजाते-बजाते

मैं भूल जाती उन कुल्लों को।

 

पर आज फिर याद आते हैं

वे कुल्ले, क्योंकि

आज तो मेरे घर का

आँगन बहुत बड़ा है।

 

पर इस आँगन में सबने

पक्के कर रखें हैं

अपने-अपने कोने

और उगा रखे हैं कैक्टस।

 

मैं उन कोनो में

बरसों से तलाश रही हूँ

थोड़ी सी जगह

जहाँ मैं उगा सकूँ

जूही,आम और इमली।

 

यही सोच कर

बहला लेती हूँ खुद को

कि ये कोने भी तो

मेरे अपनों के ही हैं।

 

क्या मिलेगी मुझे इतनी जगह

जहाँ मैं उगा सकूँ

जूही, इमली और आम?

--

डॉ. मालिनी गौतम

मंगलज्योत सोसाइटी

संतरामपुर-३८९२६०(गुजरात)

गुजरात

3 blogger-facebook:

  1. मालिनी जी ! बचपन की कच्ची-कच्ची याद दिला दी आपने ...साधुवाद !
    वाकई घर खोगया ....गाँव खो गए .....रिश्ते -नाते खो गए ....आम -इमली-जूही ...सब खो गए ....जगह नहीं बची इनके लिए ....कैक्टस से बचे तब तो....इन्होनें तो आँगन से होते हुए कमरों में और दिल-ओ-दिमाग में भी अपना कब्ज़ा कर लिया है...
    सुन्दर बिम्बों के साथ मन को कचोटती सी रचना .

    उत्तर देंहटाएं
  2. कौशलेन्द्रजी,नीरजजी,बहुत-बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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