बुधवार, 12 जनवरी 2011

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ

जर ,जोरू और, 2 गज ज़मीन

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जर .जोरू और ज़मीन ये

तीन बहुचर्चित शब्द पुरुषों

की महत्वाकांक्षाओं और

अहंकार की दास्तान बया करते है

पुरुष का अधिकांश जीवन,

इन्हीं के इर्द गिर्द घूमता है!

 

कभी जर से ज़मीन और जोरू

खरीदना चाहता है,!

तो कभी जोरू के लिए जर और

ज़मीन चाहता है!

 

या फिर ज़मीन के लिए अपनी

जोरू और जर को दांव पे लगा देता है!

पर विरले हे ये तीनों नसीब होते हैं,

जर होता है ,ज़मीन होती है

पर अच्छी जोरू नही हो होती!

 

जोरू अच्छी होती है तो,

जर और ज़मीन नहीं होती!

ज़मीन के लिए जर नहीं होता,

तो जोरू खुश नहीं होती!

इन्हीं तीनों में समन्वय स्थापित

करते-करते कभी,जर चला जाता है

जोरू छोड़ देती है ,बस मिलती है तो

बस दो गज़ ज़मीन!

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सज़ा --मौत-(भ्रूणहत्या)

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कोख रूपी कटघरे में बैठी ,

एक अर्धविकसित बच्ची लाचार,

बाहर आने का बेसब्री,

से कर रही थी इंतज़ार!

 

इंतज़ार एक नयी दुनिया ,

मे अपनी आँख खोलने का,

इंतज़ार कुछ नये चेहरों ,

से अपना रिश्ता जोड़ने का!

 

पर जनम से पहले ही,

हो गयी ये बेचारी बर्बाद,

किसी ने इसका लिंग बताया,

और कर दिया अपराध!

 

समाज के इस कोर्ट में,

आज मुक़र्रर होगी सज़ा,

खुदा की इस देन पे,

इंसान देगा अपनी रज़ा!

 

माँ कर रही खूब प्रयास,

इसके मन में है एक आस,

कहा की ये जननी है,

इससे ही श्रृष्टि चलनी है!

 

कुछ लोगों ने ज़ोर लगाया,

स्त्री को एक बोझ बताया,

ग़रीबी और बेबसी बतलाई,

दहेजप्रथा की याद दिलाई!

 

कभी जिंदगी जीत रही थी,

कभी मौत हावी हो रही,

अंत में माँ -बाप का टूटा हौसला,

और सज़ा-ए-मौत का किया फ़ैसला!

 

इस तरह एक और कन्या,

भ्रूणहत्या का हो गयी शिकार,

तरह-तरह के प्रयास कर रही,

फिर भी बेबस दिख रही सरकार!

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मेरे जख़्मों से मोहब्बत है मुझको !

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मेरे जख़्मों से मोहब्बत है मुझको ,

इन्हीं पे तो मेरी कहानी लिखी है ,

बेबस भटकता बचपन लिखा है ,

बेदर्द तड़पती जवानी लिखी है !

मेरे जख़्मों से मोहब्बत है मुझको ,

इन्हीं पे तो मेरी कहानी लिखी है

 

हर जख्म की एक अलग दास्तां है ,

हर जख्म की एक अलग है कहानी  ,

किसी पे अपनों की बेवफ़ाई लिखी है ,

किसी पे उम्र भर की बदनामी लिखी है !

मेरे जख़्मों से मोहब्बत है मुझको ,

इन्हीं पे तो मेरी कहानी लिखी है

 

कोई दोस्तों की बदसलूकी बया कर रहा है ,

कोई सनम की खामोशी बया कर रहा है ,

किसी पे टूटे दिल की निशानी लिखी है ,

किसी पे मेरे जहन की परेशानी लिखी है !

मेरे जख़्मों से मोहब्बत है मुझको ,

इन्हीं पे तो मेरी कहानी लिखी है

 

ये जख्म तो अब मेरे हमसफर हैं ,

ना छेड़ो इन्हें ये मेरे रह्ग़ुजर हैं ,

ये बड़ी शिद्दत से साथ निभा रहे हैं ,

इन्हीं पे अब मेरे जिंदगानी लिखी है !

मेरे जख़्मों से मोहब्बत है मुझको ,

इन्हीं पे तो मेरी कहानी लिखी है

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बाप हूँ -रो नहीं सकता !

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जिंदगी के हर गम को सह लेता हूँ ,

आँसुओं को आँखों में ही पी लेता हूँ ,

चेहरे पे दर्द बयान कर नहीं सकता ,

टूट जाता हूँ पर कमज़ोर दिख नहीं सकता !

 

कभी दिल को पत्थर कर लेता हूँ ,

खुद से ही कई बार लड़ लेता हूँ ,

खुशियों को कई बार द्फन करना पड़ता है ,

भावनाओं के समंदर से निकलना पड़ता है !

 

कई बार दिल करता है आँसुओं को आने दूं ,

अपनी अंदर की पीड़ा को मैं भी बह जाने दूं ,

पर चेहरे पे नकली हँसी लानी पड़ती है ,

अपने दिल की आग खुद ही बुझानी पड़ती है !

 

अपनों को पीड़ित देखता हूँ तो बूँदों सा फूट जाता हूँ ,

चट्टान सा दिखता हूँ पर अंदर से टूट जाता हूँ ,

अपनी पीड़ा को कभी किसी से कह नहीं सकता ,

मैं भी रोना कहता हूँ पर बाप हूँ ना ,रो नहीं सकता !

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

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