मंगलवार, 4 जनवरी 2011

शशांक मिश्र‘‘भारती'' के बाल गीतः-

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एकः-

जाड़े की ऋतु

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खुशियों को साथ लिए

सुन्‍दर सपने हजार लिए

ऋतु जाड़े की आ गई

पवन सर-सराने लगी

दांत बजवाने लगी

सतरंगी परिवेश लिए

ऋतु जाड़े की आ गई

सरदी के बढ़े हैं गात

धूप के घटे हैं गात

शीतल लहरों के साथ

ऋतु जाड़े की आ गई

धूप सभी के मन भाती

शीत लहर कंप-कंपी बंधाती

स्‍वर्णिम सौन्‍दर्य दिखाती

ऋतु जाड़े की आ गई।

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दोः-

आया मौसम जाड़े का

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खाओ-पीओ, झूमो-गाओ

आया मौसम जाड़े का,

नये-नये स्‍वेटर को पहनो

भाया मौसम जाड़े का

आइसक्रीम अब भाये नहीं

धूप सुहानी लगती है,

जाड़े में नहाने से भी अब

गुड़िया रानी डरती है,

गुल्‍लक को अब भरते जाओ

आया मौसम जाड़े का

खाओ-पीओ, झूमो-गाओ

भाया मौसम जाड़े का॥

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तीनः-

हाथी दादा

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हाथी दादा आते हैं

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पहन लबादा आते हैं

पंखे जैसे कानों को

झण्‍डे सा फहराते हैं,

लम्‍बी सूंड़ को वह अपनी

इधर-उधर लहराते हैं

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डॉ. शशांक मिश्र ‘‘भारती''
दुबौला-रामेश्‍वर
पिथौरागढ़

1 टिप्पणी:

  1. तीनों बाल गीत अच्छे लगे मुबारक बाद ,मेरे हिसाब से हाथी वाली कविता कुछ और विस्तार मांगती है।

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