रविवार, 23 जनवरी 2011

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल

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निष्‍फलता का त्राण यही है।

क्‍या जीवन संग्राम यही है॥

 

धूप बत्‍तियां बुझ कर बोली ,

शापित जीवनदान यही है ।

 

दुष्‍टों के भय से मंदिर में,

दुबका जो भगवान यही है।

 

भोग चढ़ा कर जो मांगा था,

वो दुर्लभ वरदान यही है।

 

हाथ झटक देता छूने पर,

क्‍या सबरी का राम यही है।

 

आज पराई सी लगती है,

पर मेरी पहचान यही है।

 

कण दे कर मन की अभिलाषा,

भक्‍ति का प्रमाण यही है।

---

(2)

उसका आ जाना खला या उसका न आना खला,
है अजब से तजबजुब में जिन्‍दगी का मसअला।


मत गौर कर नजदीक से ना जिन्‍दगी को देखना,
पैदाईश से हैं शुरु ये मौत तक का फासिला।


उसके लिए वो वाकिया था रोजमर्रा की तरह,
कि बरपा था मेरे लिए बन के कहर दो फैसला।


उफ! मेरी मिन्‍नतकशी और बेनियाजी आपकी,
कौन से मकसूद पे ठहरेगा जा ये सिलसिला।


नक्‍शे कफे पां की मेरी इक अलहदा पहचान हैं,
पांव हैं नंगे मेरे और पांव में हैं आबला।


रात झिगुरों मे बाहम गुफ्तगू होती रही,
अब अंकबूतों का बसेरा बन गया सहने खला।

 

दामोदर लाल जांगिड़

6 blogger-facebook:

  1. पहली वाली बहुत अच्छी लगी, दूसरी समझ नहीं आई |

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. bhai niraj v sangitajee"geet"ka raddeamal ke liye tahedil se sukaria Damodar lal jangid

    उत्तर देंहटाएं
  5. pahli gazal ka kafiya hi samaj nahi aya...
    Doosri me bhi kafiya me mistake h..

    फैसला or फासिला tukant shabd nahi h. matle k hisaab se फैसला sahi h. फासिला galat h...

    उत्तर देंहटाएं

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