शनिवार, 22 जनवरी 2011

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' के दोहे

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मुट्ठी भर की ज़िंदगी, चुटकी भर आराम।
इतने में करने पड़े, दुनिया भर के काम।। 


कौड़ी-कौड़ी पर जहाँ, बिकते हों ईमान।
वहाँ कभी होगा नहीं, रत्ती भर कल्यान।।


जिस संतति के हित कभी, लूटा सकल जहान।
उसी पूत ने पिता की ,ले ली हँस कर जान।।


चढ़ी केतली लोभ की, बढ़ा स्वार्थ का ताप।
त्याग उड़न छू हो गया, बन कर सारा भाप।


संबंधों की पौध में, पड़ी उर्वरक खाद।
पर कद बौने हो ग ए , पहुँच न पाएँ हाथ।।


माँ तो पावन ऋचा है, पिता सहज उद्गार।
पर कितनों से हो सका , इनका मंत्रोच्चार।।


माता सरिता पिता गिरि, दोनों तीर्थ समान।
घाट बैठ डरते रहे, कर न सके स्नान।। 

घर-घर में है असहमति,कण-कण व्यापा क्षोभ।
प्रेम हुआ काफ़ूर ज्यों ,बढ़ा काम का लोभ।।


रहे बंद के बंद ही, संतति हृदय कपाट।
माँ चौखट-सी रात-दिन,रही जोहती बाट।।


छूरी लेकर पुत्र को , खड़ा देख कर पास।
पानी-पानी हो गया,ममता का विश्वास।।


अपनेपन की भूमि पर ,चढ़ी पराई गर्द।
रखते ही मैला हुआ,मन का पावन दर्द।।

 
भूखी-प्यासी ज़िंदगी, लटी-फटी बदहाल।
एक अनार बीमार सौ,सारे जग का हाल।।

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डाक्टर गंगा प्रसाद शर्मा'गुणशेखर'  

2 blogger-facebook:

  1. वाह! बेहतरीन , मैंने पहले भी आपको लिखा था की गुणशेखर जी के बारे में कुछ बताएँ, इनकी पुस्तकें मुझे चाहिए!

    उत्तर देंहटाएं
  2. माफ़ कीजियेगा मैंने अभी पिछली पोस्ट पर देखा आपने उनका इ- मेल दिया है!

    उत्तर देंहटाएं

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