शनिवार, 8 जनवरी 2011

मालिनी गौतम की कविताएँ

ghonsala

आखिरी बादल

कभी-कभी लगता है कि

हाँ, हमारे बीच एक सबंध है।

पर अगले ही पल लगता है

साथ बिना का संबंध?

तुम तो कभी भी, कहीं भी

मेरे साथ नहीं होते........

अषाढ़ के महीने में

बिजली चमकती रही

बारिश बरसती रही

बादल गरजते रहे

धरती काँपती रही

पर तुम कहीं न थे।

काली अँधियारी रातों में

मैं हर पल, दीपक बन कर

करती रही इंतजार कि

एक वेदना की बाती आकर

करेगी मुझे प्रज्ज्वलित,

रोते-रोते आँख,आँसू बन गयी

बरसते-बरसते आकाश पानी बन गया

पर तुम कहीं न थे।

एक और शाम सूखे पत्ते की तरह

मेरे जीवन में से झड़ गई

नईं कोंपल की तरह रात

मेरे भीतर फूटती रही

साँसों में मोगरा खिलता रहा

हमेशा कलरव करने वाला

मेरा मन मौन आमंत्रण देता रहा

पेड़ों के मौन आमंत्रण को स्वीकार कर

आसमान तो फट पड़ा

अनराधार बारिश के साथ

पर तुम एक बार फिर

आखिरी बादल की तरह, बिन बरसे

मेरे हृदय पर से गुजर गये

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घोंसला

काँटेदार पेड़ पर लटकता

बया का घोंसला

कारीगरी और कलात्मकता का

सबसे श्रेष्ठ नमूना है।

आदमी भी तो जिंदगी भर

ऐसे ही एक सुन्दर घोंसले/घर के लिये

ताने-बानें बुनता रहता है

“घर”, “मेरा घर”,“प्यारा घर”!

घर शब्द ही मुँह में

मिश्री घुलने का आभास देता है

दिनभर की मेहनत के बाद

घर लौटने का अहसास

कुछ ऐसा जैसे

माँ बाहें फैलाए

अपनें बच्चे को बुला रही हो।

पर हर आदमी में बसता है

एक “जिप्सी”

जो उसे बार-बार उकसाता है

भटकने के लिये

तभी तो हर आदमी घर छोड़कर बाहर

निकलना चाहता है

घूमना चाहता है

पूरी दुनियाँ देखना चाहता है

अलग-अलग रोमांचक, आल्हादक अनुभव प्राप्त करना चाहता है।

पर जब भटकते-भटकते थक जाता है

तब याद आता है “घर”

घर में बसते आत्मीय स्वजन

उनका उष्मामय प्रेम

दरवाजे पर स्वागत करती हुई

स्नेहिल मुस्कान!

और तब आदमी के भीतर की

बया फुदकनें लगती है

क्योंकि हर आदमी में

बसती है एक “बया”!

-----------------------------

 

 

बेबसी

सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य ही

होता है सबसे अधिक बेबस

जन्म और मृत्यु दोनों पर

नहीं होता उसका कोई बस

वह जन्म लेता है, और क्योंकि

मौत नहीं आती इसलिये

विवश हो जात है जीने के लिये।

जिंदगी भर रोता है, हँसता है,

शादी करता है, करवाता है,

छल और प्रपंच करता है,

मान और अपमान सहता है,

अपने और परायों में रहता है,

लूटता है,लुट जाता है

काल-चक्र के पहियों के साथ

अवश रूप से निरंतर घूमता रहता है

उस कठपुतली की तरह

नाच नाचता रहता है

जिसकी डोरियाँ किसी और के हाथ में हैं

और एक दिन क्योंकि अब और जी नहीं सकता

इसलिये मर जाता है।

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डॉ. मालिनी गौतम

व्याख्याता अंग्रेजी

मंगलज्योत सोसाइटी

संतरामपुर ३८९२६०,गुजरात

दूरभाष-०२६७५२२०९०१

3 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन कविताएँ हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बिन बरसे ,मेरे ह्रिदय से चले गये।
    सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. तीनों कवितायेँ अच्छी हैं , बेबसी ने लेकिन दिल जीत लिया |
    हम मरने के लिए जीते हैं ...

    उत्तर देंहटाएं

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