रविवार, 2 जनवरी 2011

एस के पाण्डेय का व्यंग्य - नए साल के नए संकल्प

संसार चक्र में कोई आता है तो कोई जाता है। जैसे घर से एक मेहमान जाता है तो दूसरा आ जाता है। कहते हैं कि न कोई कुछ लाता है और न कोई कुछ ले जाता है। दीगर है कुछ लोग केवल लेने के लिए ही आते हैं और कुछ लोग आते हैं तो कुछ न कुछ दे भी आते हैं। ऐसे ही सुख-दुःख भी आते-जाते रहते हैं। किसी के आने से दुःख होता है तो किसी के जाने से। इसी तरह किसी के आने से सुख होता है तो किसी के जाने से। कोई कुछ देकर जाये तो सुख और कुछ लेकर जाये तो दुःख लाजिमी ही है। जैसे मेहमान के आने पर तुरंत नहीं पता चल पाता कि कुछ देने के लिए भी लेकर आया है अथवा नहीं। वैसे ही नए साल के आगमन पर भी होता है।

समय चक्र में एक साल जाता है तो दूसरा आ जाता है। साल भी दुःख-सुख लेकर आता है। लेकिन किसी को दुःख देता है तो किसी को सुख। इसी तरह जब जाता है तो किसी को दुःख तो किसी को सुख देकर जाता है। नई चीज सबको अच्छी लगती ही है। पराई हो तो और अच्छी हो जाती है। अपने को न पहचान पाना और दूसरों के तलवे चाटना आज की नीयत हो गई है। जब लोग खुद बेगाने हों तो क्या अपना क्या पराया ? नया साल आता है तो लोग जश्न मनाते हैं, नया संकल्प लेते है। भले ही पुराने संकल्प पूरे नहीं होते। हमारे एक पड़ोसी हैं जो कुछ भी लेते हैं तो देते नहीं। उनका कहना है कि देने के लिए थोड़े ही लेते हैं। इसी तरह संकल्प पूरा करने के लिए ही लिया जाय, जरूरी नहीं। ले लिया जाय यही क्या कम है ?

नए साल पर लोग तरह-तरह से जश्न मनाते हैं। हँसते-गाते हैं, खुद नाचते हैं और औरों को भी नचाते हैं। पटाखे बजाते हैं। जुआ खेलते हैं और खेलाते हैं साथ ही कुछ लोग खेल कर न खेलने का वचन लेते हैं। कुछ लोग पीते-पिलाते हैं। कुछ लोग पीकर न पीने का संकल्प लेते हैं। लेते क्या हैं दुहराते हैं।

कुछ लोगों ने कहा कि आप व्यंग्य न लिखने का संकल्प ले लीजिए। जवाब में नए साल का नया व्यंग्य ही लिख डाले। कौन समझाये कि यदि संकल्प लेने से ही काम हो जाए तो लोगों को बार-बार संकल्प दुहराने की जरूरत ही क्यों पड़े। संकल्प बहुत है, लेने वाले बहुत हैं। लेकिन पूरा करने वाले बिरले ही हैं। जैसे कसमें तो बहुत लोग ले लेते हैं। परन्तु निभाते बिरले हैं। रुलाते हैं कुछ लोग रो कर और कुछ लोग हँसकर। खैर नए वर्ष में ज्यादा लोग हँसने पाएँ तभी अच्छा है।

आज के समय में अधिकांश लोग जवान बने रहना चाहते हैं। फिर भी उस नए साल के आगमन पर जश्न मनाते हैं जो उन्हें बुढ़ापे की ओर ले जाता है। पहुंचते ही सबको एक साल पुराना कर देता है। और मनाओ जश्न। लोग मरना नहीं चाहते और यह सबको मृत्यु की ओर ले जाता है। फिर भी जश्न मनाते हैं। तिवारी जी कहते है कि अच्छे वर्तमान की आशा में जश्न मनाया जाता है। लेकिन वर्तमान अच्छा होता ही नहीं। कभी कोई वर्तमान से संतुष्ट थोड़े ही होता है। नहीं तो संकल्प की आवश्यकता ही नहीं होती। और न ही भूत की सराहना की जाती।

लोग ‘हैप्पी न्यू इयर’ भी बोलते है। जिसका चाहते हैं कि इसका न्यू इयर हैप्पी न हो उसे भी बोल देते है। कारण क्योंकि नए वर्ष पर ऐसा बोला जाता है। मुझे तो बोलना भी नहीं आता। भले ही लोग कुछ गलत अर्थ ही क्यों न लगाते हों। एक बार एक श्रीमान जी जो विदेश से पढ़े-लिखे थे। उन्हीं के साथ मैं भी काम कर रहा था। नए वर्ष के दिन रोज की तरह उनसे सिर्फ नमस्ते ही किया। फिर सोचा कि पता नहीं क्या समझे होंगे। लेकिन उन्होंने भी नहीं बोला था। कोई बोल दे तो जवाब में बोलने पर ज्यादा दिक्कत नहीं होती। मैंने उनसे बता दिया कि सर जी मैं ऐसा ही हूँ। भले ही लोग गलत समझते हों। उन्होंने कहा मैं भी ऐसा ही हूँ। मुझे शायद पता भी था। उन्होंने मुझे बताया कि शर्मा जी की आधी से अधिक समस्याएं तिवारी जी की ही देन होती हैं। लेकिन अभी तिवारी जी उनसे हैप्पी न्यू इयर बोल कर हाथ मिला रहे थे। मिठाई भी लाकर खिलाये हैं। मैंने कहा क्यों न खिलाएँ तिवारी जी जानते हैं कि शर्मा जी शुगर से परेशान रहते हैं।

कुछ लोगों के पास, यह सोचकर कि कहीं बुरा न मान जाएँ, मैसेज तो देना ही पड़ता है। इसी चक्कर में मोबाइल कम्पनी का एक मैसेज पढ़कर कि फ्री मैसेज मिलेगा, मैसेज वाले कूपन से एक दिन पहले ही मोबाइल रिचार्ज करा लिए। सुबह उठकर मैसेज देने लगे। देर हो जाय तो कुछ लोग बताने लगते हैं कि आज नया वर्ष है। इसलिए मजबूरी में ही सही लेकिन मैसेज देना लाजिमी हो जाता है। कुछ देर बाद बैलेंस चेक किया तो पता चला कि डेढ़ रुपया शेष है। कस्टमर केयर वाले से बात किया तो उसने बताया कि मैसेज कल से फ्री मिलेगा। एक जनवरी को फ्री मैसेज काम नहीं करता है। मैंने प्रश्न किया कि जब आपका मैसेज आया तो उसमें तो यह नहीं लिखा था। आपको यह भी लिखना चाहिए था। काल करने के लिए धन्यवाद देकर उसने फोन कट कर दिया। इसके बाद पता चला कि अब बैलेंस एक रुपया ही रह गया है। पचास पैसा कस्टमर केयर से बात करने का कट गया। जो और कम्पनियाँ शायद नहीं काटती। इस तरह नए वर्ष की सुबह ही चूना लगा। बेवकूफ बने अलग से। इसलिए पहला संकल्प यही लिए कि इस कम्पनी का सिम निकालकर फेंक देंगे। इसी तरह कुछ दिन पहले एक पैसा मिनट के लिए भी मैसेज मिला था। रिचार्ज करने पर पता चला कि लगभग ७२ पैसा पर मिनट कट रहा है। बात करने पर पता चला कि पांच मिनट के बाद एक पैसा कटता है। मैंने कहा कि आखिर पहले यह क्यों नहीं बताया गया। ग्राहक को सरासर धोखा देकर लूटने का धंधा बना लिए हो। कुछ मिला नहीं उपर से एक रुपया कट गया। कस्टमर केयर वाले ने देर करके फोन अटेंड किया था। ताकि कम से कम एक रुपया तो काट सके।

मुझे तो चूना लगा लेकिन बहुत लोग औरों को चूना लगाने का ही संकल्प लेते हैं। कुछ लोग चूना लगाने के नए-नए तरीके ईजाद करने का संकल्प लेते हैं। विद्यार्थी नया समय सारिणी बनाकर उसके अनुसार पढ़ने का संकल्प लेते हैं। लेकिन सारिणी बनाते-बनाते ही परीक्षा आ जाती है। पढ़ने का समय ही नहीं मिल पाता। कुछ अध्यापक पढ़ाने का संकल्प लेते हैं। लेकिन कहावत है कि बिना आदत के चन्दन भी लगाने से माथा चर्राता है। नेताजी जनता के समक्ष भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने का संकल्प लेते है। जो उनके विचार में नहीं है क्योंकि जनता के समक्ष किये गए वादों को पूरा करना उनके संस्कार में ही नहीं है।

डॉक्टर जी अपने नए नर्सिंग होम का निरीक्षण करते हुए अस्पताल में ही मरीजों को ज्यादा समय देने का संकल्प ले रहे हैं। दरोगा जी एक रिक्शे वाले पर बेरहमी से डंडा भांजते हुए ‘परित्राणाय साधूनाम’ का संकल्प दुहरा रहे हैं। मिश्रा जी मिश्री खाते हुए मीठा न खाने का संकल्प ले रहे हैं क्योंकि ग्लूकोज लेबल जानलेवा हो रहा है। बॉलीवुड के सदाबहार नायक व नायिका एक सामाजिक फिल्म बनाकर समाज में अपना बहुमूल्य योगदान देने का संकल्प ले रहे हैं क्योंकि उन्हें प्यार और मार की एक नई तरकीब हाथ लग गई है।

इसी तरह से सबने कोई न कोई संकल्प तो लिया ही होगा। क्योंकि नया साल जो आया है। महँगाई पहले से ही हाल बिगाड़ रही है। चाल तो सबकी दिन-दिन बिगड़ ही रही है। आशा है कि इस साल हाल और नहीं बिगडेगा बल्कि सुधरेगा और सब अपने सद-संकल्प को काफी हद तक पूरा कर सकेंगे। अन्यथा ३६५ दिन का ही तो फासला है। और आशा ही जीवन है।

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एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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