सोमवार, 10 जनवरी 2011

कृष्ण कुमार चन्द्रा की कविताएँ

jamura

खुदा

दो कदम तुम साथ चल के-

बताओ तो जानूं ।

पाँव में गर फोड़े अपने,

उगाओ तो मानूं।

कंटक-पथ पर अकेले-

भेज दिया मुझको।

मदारी बन मस्‍ती,

आती है तुझको।

गर जमूरा बन-

नाच के दिखाओ,

तो जानूं।

...

स्‍वाद

आजकल के रसिकों का स्‍वाद बदल गया है।

मंच व दर्शकदीर्घा के मध्‍य संवाद बदल गया है।

अब तो इनको केवल हास और परिहास चाहिए।

अभी वो जिन्‍दा हैं, इस बात का विश्वास चाहिए।

....

हिन्‍दी

न तो मैं लादने की बात करता हूं।

न ही मैं थोपने की बात करता हूं।

हिन्‍दी को तो हर जुबां पर,

मैं परोसने की बात करता हूं।

हिन्‍दी प्रेम की भाषा है।

हिन्‍दी मिलन की भाषा है।

हिन्‍दी को छत्‍तीसगढ़ का,

छेरछेरा की तरह, हरेक प्रांत में,

परोसने की बात करता हूं।

...

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा (शिक्षक)

मुकाम- बेलाकछार

पोष्‍ट- बालको नगर

जिला- कोरबा (छ.ग.)

मो.- 9926150892 9926150892

1 blogger-facebook:

  1. तीनों रचनायें सार्थक , सारगर्भित,समसामयिक और संदेश प्रवाहित करने में सक्छम हैं, बधाई।

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