रविवार, 2 जनवरी 2011

चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव की कविता - कहो मेरे प्रिय नए साल इस बार मैं तुम्‍हें क्‍या दूँ ?

र नए साल की अगवानी में

हर बार मैं उसे

एक नई कविता का उपहार देता हूँ।

कहो मेरे प्रिय नए साल

इस बार मैं तुम्‍हें क्‍या दूँ ?

किस स्‍याही से

कौन सी कविता लिखूँ ?

पिछली बार जब तुम आए थे

मैंने कागज पर तरह-तरह के रंग बिखेर दिए थे

और अपनी समझ से

पूरे 365 दिनों के लिए

एक इन्‍द्रधनुष

तुम्‍हारे नाम कर दिया था।

उस कागज पर

कुछ बदरंग धब्‍बे ही शेष बचे हैं।

कहो मेरे प्रिय नए साल

इस बार मैं किन रंगों से तुम्‍हारा चित्र खींचूं ?

किन शब्‍दों में

तुम्‍हारा भविष्‍य लिखूँ ?

कैसे कहूँ कि

तुम्‍हारे 365 दिनों में

कोई फसाद नहीं होगा

कैसे कहूँ कि हैवानियत

अब किसी को अपना शिकार नहीं बनाएगी

कैसे कहूँ कि आतंक किसी की साँसें नहीं छीनेगा।

छोटी मछलियाँ तालाब में बेखौफ तैरेंगी।

कैसे कहूँ कि अब कविता दम नहीं तोड़ेगी

शब्‍द हार नहीं मानेंगे।

मैं कैसे कहूँ कि तुम्‍हारी जन्‍मकुंडली पर

अब बुरे ग्रहों का प्रभाव नहीं होगा।

मेरे प्रिय नए साल

मैं कब नहीं चाहता कि तुम्‍हें

महमहाती शुभकामनाओं के फूलों से लाद दूँ।

मैं कब नहीं चाहता कि

गमकते शब्‍दों को गूंथकर

तुम्‍हें काव्‍य हार पहना दूँ।

किन्‍तु बीते बरस मैंने

जेठ की तपती दोपहर

अषाढ़ की कहर ढाने वाली बरसात देखी है

फिर कैसे दूँ मैं तुम्‍हें

बसंत की फगुनाहट की शुभकामनाएँ

कहो नए साल

इस बार मैं तुम्‍हें कौन सी शुभकामनाएँ दूँ

--

· चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव

cpsrivastava.9@gmail.com

208, गंगोत्री, झूँसी

इलाहाबाद

2 blogger-facebook:

  1. अच्छी अभिव्यक्ति। बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छी अभिव्यक्ति-
    --कवि के पास भला क्या होता,
    --कविता गीतों की झन्कार
    --प्रिय तुमको दूं क्या उपहार.....

    उत्तर देंहटाएं

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