मंगलवार, 25 जनवरी 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : चोपड़ चकल्लस

जयपुर की कई विशेषताएं हैं, जैसे दर्टीनेस दाऊ नेम इज जयपुर। कई बार जब जयपुर को देखता हूं तो यह समझ में नहीं आता कि जयपुर में गंदगी है या गंदगी में कहीं जयपुर छिपा हुआ है। गंदगी के बाद जो चीज जयपुर की कुख्‍यात है वह है चोपड़, वैसे चोपड़े कुल तीन है, लेकिन जो मजा बड़ी चोपड़ या माणक चौक की चोपड़ का है, वो अन्‍य चोपड़ो पर शक्‍कर की तरह दुर्लभ है, इधर मैं भी शगल के लिए सायंकाल चोपड़ चकल्‍लस में भाग लेने लगा हूं।

माणक चौक की चोपड़ एक बहु आयामी बहु उपयोगी स्‍थल है। बीच पार्क में जहां पर फव्‍वारा लगा हुआ है, वहां मालिश वाले, लौंडेबाज और यदाकदा शरीफजादे बैठे रहते है। दक्षिण की ओर मंच बनाकर राजनीतिज्ञ लोग एक दूसरे की टांग खींच कर आनन्‍दित होते है। कई बार दूसरों के फटे में अपनी टांग अडाने के चक्‍कर में बेचारों की खुद की टांगें भी टूट जाती है। प्रति वर्ष पन्‍द्रह अगस्‍त या 26 जनवरी को आजादी की याद को ताजा तरीन बनाने के लिए पूर्व की ओर मंच बनाकर झण्‍डा रोहण करके समाजवाद की ओर पांव आगे बढ़ाए जाते हैं। उसी दिन कोई न कोई राजनीतिक दल दक्षिण दिशा में मुंह कर के किसी अन्‍य दल के नेता को नंगा करने का पुनीत कार्य भी इसी मंच पर सम्‍पन्‍न करता है। वैसे तो सभी इज्‍जतदार लोग खादी पहन लेने मात्र से ही शरीफ हो जाते हैं, लेकिन जो चोपड़ के मंच पर भाषण भी दे देता है, वह कन्‍फर्म नेता माना जाता है। चोपड़ पर ही एक थाना है जिसका रेट एक लाख रूपये के आस पास रहता है, और अक्‍सर यहां का थानाध्‍यक्ष बाद में लाइन हाजिर हो जाता है, वैसे पुलिस लाइन भी चोपड़ के पास में ही है। चोपड़ के एक ओर कुछ फूल वाले बैठते हैं। और उनके बिलकुल सामने कुछ पशुओं का चारा रखकर बैठे रहते हैं। एक जमाना था, चोपड़ के पास पानों के दरीबे में तम्‍बोलनों का पान खाने लोग सौ पचास कोस से चले आते थे, अब वह रीतिकाल कहां रहा ? चोपड़ पर चकल्‍लस का मजा भरपूर आए, इसके लिए यहां पर भांग की दुकान आवश्‍यक है। मेरा सरकार से विनम्र अनुरोध है कि वो शीध्र ही इस कमी को पूरा करे।

अक्‍सर चोपड़ पर लाटरी वाले आपकी सेवा करने को तत्‍पर मिलेंगे।

”आज ही खरीदिए। आइए, राजस्‍थान लाटरी का शानदार टिकट, आज जेब में लाटरी का टिकट लेकर जाइए, कल बोरी में भरकर नोट ले जाइए।“

चोपड़ पर शतरंज, चोपड़, ताश, राजनीति और पान की चकल्‍लस अक्‍सर चलती रहती है।

अक्‍सर लोग पान का एक टुकड़ा मुंह में दबाए बतियाते ही रहते हैं। चुनावों के दौरान तो एक भावबोध की स्‍थिति आ जाती है।-

”अरे सुनो कौन जीतेगा ?“

”तुम्‍हें क्‍या पड़ी है ?“

”अरे भाई देश का सवाल है!“

”तो तुम बन जाओ प्रधानमंत्री।“

”बन तो जाता लेकिन घर पर काम ज्‍यादा है।“

तो फिर ऐसा करो, कहीं से शक्‍कर ही दिलवा दो।“

”क्‍यों मजाक करते हो भाई ?“

चोपड़ का सबसे ज्‍यादा लाभ देश की नई पीढी ने भाषण देने के लिए उठाया है। कई बार सोचता हूं, यदि चोपड़ नहीं होती तो शायद कई बडे नेता आज कहां से आते। अक्‍सर आम सभाओं में चीरहरण का कार्यक्रम रहता है, अपनी धोती की गांठ कसकर बांधो और दूसरों को लग्‍गी लगाओ। इसे सीखना हो तो चोपड़ पर भाषण मारो। ज्ञान छांटो।

इधर चोपड़ पर हजामत करने वालों ने भी अपना प्रभुत्‍व दिखाया है। तेल लगाने ओर तेल बेचने का लघु उद्योग भी चोपड़ परा ज्‍यादा चलता है।

जूतमपैजार, हाथापाई, पतंगबाजी, मुर्गाबाजी, चोंचें लड़ाने आदि कार्यों का सफल निष्‍पादन भी चोपड़ पर ही सम्‍भव है। यहां से कुछ आगे छोटी चोपड़ है, और दूसरी ओर रामगंज की चोपड़ है, पर वो मजा कहां हां कभी घुंघरूओं की झंकार का शौक हो तो छोटी चोपड़ पर नोश फरमाएं। चोपड़- चोपड़ है, और चोपड़ पर चकल्‍लस करने के लिए चितचोर होना पड़ता है। गणगोर, तीज या किसी उत्‍सव के दिनों में चोपड़ की शान ही निराली होती थी।

सायंकाल चोपड़ सुहानी हो जाती है। यहां तक कि नालियां और बदबू भी अच्‍छी लगती है। घोड़े की लीदों को फेफड़ों में भर भर कर लोग घर ले जाते हैं। दूसरी ओर कुछ हिजड़े भी बतियाते रहते हैं। जहां तक गायों, घोड़ों के अलावा जानवरों का प्रश्‍न है, चोपड़ पर गधे काफी मात्रा में पाए जाते हैं। सायंकाल यह खाकसार भी वहीं दुलत्ती झाड़ता रहता है। जहां तक चोपड़ के भविष्‍य का प्रश्‍न है, मैं आश्‍वस्‍त हूं, क्‍योंकि जहां पर देश के भविष्‍य का पता नहीं वहां पर चोपड़ के भविष्‍य की चिंता करना मूर्खता है। हां, चोपड़ पर कभी आपकी इच्‍छा चकल्‍लस की हो तो बंदे को सेवा का एक मौका अवश्‍य दें।

चोपड़ पर रोटी की बहस अक्‍सर जारी रहती है, इसे भी एक शगल की तरह लिया जाता है, बकौल एक शायर के-

भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्‍या हुआ,

आजकल दिल्‍ली में है, जेरे बहस ये मुद्दआ।

'''''''''

यशवन्‍त कोठारी

86,लक्ष्‍मी नगर ब्रहमपुरी बाहर,जयपुर-302002

फोनः-0141-2670596

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