रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

February 2011
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

clip_image002

कचोट

कचोट एक मन उठी,

कसक एक मन उठी |

क्यों लुट गया वो देश पर,

क्यों लुट गया था वो देश पर,

अनाम शहीद, बेफिकर, बेजिकर |

 

जबकि एक ये,

क्यों लूटता गया देश को,

कैसे लूट सका देश को |

नामी, नामचीन,

सांप एक आस्तीन,

थी सबको खबर,

था जिकरों में जिकर,

मगर सभी बेपरवाह- बेखबर,

मूढ़ बने आँख मूंदकर |

 

सो

कचोट एक मन उठी,

कसक एक मन उठी |

क्यों मूक मैं, क्यों मूक वो,

हे! अंतर मन मुझे झिंझोड़ दो |

 

देश मेरा, मैं देश को,

मन अंतर अहसास दो |

आत्म दो, विश्वास दो,

ये मन अंतर साहस दो |

पूछ संकू आंखों में आँखे डालकर,

जबाब दो, जबाब दो ||

 

अतुल कुमार मिश्र “राधास्वामी”

clip_image004

atulkumarmishra007@gmail.com

http://atulkumarmishra-atuldrashti.blogspot.com/

जब तू याद आया

कही सावन आया

मिली नज़रे तुझसे तो

गुलाल उड़ आया I

 

सतरंगी इन्द्रधनुष छाया

मन को यूँ भरमाया

रूई से बादलों में

जब तू नज़र आया I 

 

कलाई खनक उठी

मेहँदी इतराने लगी

बिंदिया जगमक चमकी

तब तू मुस्काया I

 

धानी चुनर उड़ चली

सांझ आँचल ओढ़ ली

चाँद थोड़ा शरमाया

मीत था मेरा आया

--

डॉ. मंजरी शुक्ल
श्री समीर शुक्ल
सेल्स ऑफिसर (एल.पी.जी.)
इंडियन ऑइल कॉरपोरेशन
गोरखपुर ट्रेडिंग कंपनी
गोलघर
गोरखपुर (उ.प्र.)
पिन - २७३००१

      image 

बच्चों, परम पुण्य दायिनी गंगा के नाम से तुम अपरिचित न होगे। नाचती- गाती, उछलती-कूदती गंगा के मंदाकिनी , सुरसरि , विश्णुपदी , देवापगा , हरिनदी , भागीरथी आदि अनेक नामों की तरह एक नाम जाह्मवी भी है।

        हां नानी, है तो, जरा समझाकर बताओ ना हम भी तो जानें।

        तो सुनो , बच्चों- दिलीप के पुत्र भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा जी ने पृथ्वी पर आना स्वीकार कर लिया। जिस ओर भगीरथ   जाते । उसी ओर समस्त पापों का नाश करने वाली नदियों में श्रेष्ठ यशस्वी गंगा भी जाती।

        उसी समय मार्ग में अद्भुत पराक्रमी राजा जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगा जी अपने जल प्रवाह से उनके यज्ञ मण्डप को बहा ले गई। रघुनन्दन राजा जह्नु इसे गंगा जी का गर्व समझकर क्रोधित हो उठे।

        फिर क्या हुआ नानी? बच्चों ने बीच में ही प्रन करते हुए पूछा,

        आगे ध्यान से सुनो- '' फिर तो उन्होंने गंगाजी के उस समस्त जल को ही पी लिया। यह संसार के लिए बड़े आश्चर्य की बात हुई। तब देवता ,गन्धर्व तथा ऋषि अत्यन्त आश्चर्य चकित होकर पुरुष प्रवर महात्मा जह्नु की स्तुति करने लगे। 

        उन्होंने गंगाजी को उन नरेश की कन्या बना दिया और उन्हें यह विश्वास दिलाया कि -'' गंगा जी को प्रकट करके आप ही इनके पिता कहलाएंगे।''

        फिर क्या था , इससे सामर्थ्यशाली महातेजस्वी राजा जह्नु प्रसन्न हो गए और उन्होंने अपने कानों के छिद्रों के द्वारा गंगा जी को पुनः प्रकट कर दिया। 
                     
        इसीलिए गंगा जह्नु की पुत्री तथा जाह्मवी कहलाती है। कहानी समाप्त करते हुए नानी ने कहा।
 

सम्पर्कः-

दुबौला-रामेवर-262529

पिथौरागढ़ उत्तराखण्ड,

माथुर जी का कहना है कि देश में योग्यता की अवहेलना हो रही है। योग्य लोग भरे पड़े हैं। उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। वहीं दूसरी ओर लोग अयोग्यों के पीछे पड़े हैं। ये कहते हैं कि पूरे देश तथा समाज की यही कहानी है। इन्हें सबक सिखाने के लिए हाल ही में सरकार ने स्पष्टीकरण माँगा था । इनके स्पष्टीकरण की कुछ बातें नीचे दी जा रहीं है। पाठक स्वतः फैसला करें कि माथुर जी की बातों में कितना दम है।

कई नेता जेल जाने के लिए पूरी (न्यूनतम योग्यता से कहीं अधिक) योग्यता हासिल किये हुए मजे में बैठे हैं। पुलिस ही उन्हें गिरफ्तार करने से कतराती है। इसमें उनका क्या दोष है ? जबकि बहुत से मामले में इन नेताओं से कम योग्यता वालों को जेल में ठूंस दिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि देश में योग्य लोगों की अवहेलना होती है तथा उनकी कोई पूछ नहीं है। वैसे तो अयोग्यों के भी पूछ नहीं है। फिर भी उनकी बहुत पूछ है।

कई नेता चुनाव में सिर्फ चुनाव हारने के ही योग्य नहीं होते बल्कि इस योग्य होते हैं कि उनकी जमानत जब्त हो जाए। फिर भी वो भारी मतों से जिता दिए जाते हैं। जबकि नेता खुद समझता है कि वह जीतने के योग्य नहीं है और इसलिए ही वह एक साथ दो-तीन जगहों से किस्मत आजमाता है। लेकिन जनता नेता को नहीं समझ पाती। न कभी समझी है और न ही कभी समझेगी। शायद नेता ऐसा ही जीव होता है जिसे देश की जनता तो क्या खुद नेता भी नहीं समझता।

कई नेता विश्वास के कतई योग्य नहीं होते फिर भी उनका विश्वास किया जाता है। ये कहते हैं कि अब भ्रष्टाचार खत्म होना चाहिए और हम भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देंगे। जनता विश्वास कर लेती है। एक बार नहीं बार-बार करती है। लेकिन यह नहीं सोचती कि यदि बिल्ली ही कहे कि अब चूहों पर हिंसा रुकनी चाहिए। और अब किसी भी कीमत पर मैं चूहों पर अत्याचार नहीं होने दूँगी । तो यह बिडम्बना ही है। और ऐसा होना सम्भव नहीं है। भला कभी कुत्ते की दुम सीधी हो सकती है। क्या कौआ कभी मांस खाना छोड़ सकता है ? जिस प्रकार से बिल्ली चूहों की रक्षा के लिए कभी भी और किसी भी कीमत पर योग्य नहीं हो सकती। ठीक वैसे ही इनसे भ्रष्टाचार मुक्त देश व समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

कई लोग जो जूतों की माला पहनाये जाने योग्य भी नहीं होते, उन्हें फूलों की माला पहनाया जाता है। क्या बीतती होगी उस फूल पर जिसकी चाह देवता के ऊपर चढाये जाने की भी नहीं होती ? क्या बीतती होगी माखनलाल जी के दिल पर, फूलों की यह दुर्दशा देखकर ? कभी किसी ने सोचा। बस माला बनाई और डालते गए गले में। जब जो दुत्कारे जाने योग्य हैं, उन्हें सत्कार मिलेगा। जो भगाए जाने योग्य हैं, उन्हें बुलाया जायेगा। जो हटाये जाने योग्य हैं, उन्हें बिठाया जायेगा। तो कैसे चलेगा देश ? कैसे बढ़ेगा देश ? इससे अधिक योग्यता की अनदेखी और क्या होगी ? जब लोग योग्यता की उपेक्षा के बल पर ही राज करेंगे। तो उनके राज्य में किसी को क्या न्याय मिलेगा ? इस परिस्थिति में योग्यता की कीमत क्या रह जायेगी ? क्या अयोग्यों का ही हर जगह जमावाड़ा नहीं हो जायेगा ?

कई लोग जो मरने योग्य नहीं होते उन्हें मार अथवा मरवा दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर कई लोग जो मारने योग्य अथवा मरवा दिए जाने योग्य होते हैं उन्हें सेक्योरिटी दी जाती है। जो सचमुच बीमार है मतलब वास्तव में जो इलाज के योग्य हैं, उसका इलाज ही नहीं हो पाता तथा जिन्हें कोई बीमारी ही नहीं है उसके इलाज पर लाखों खर्च किया जाता है। जो वास्तव में भूखा है मतलब जो भोजन दिए जाने योग्य है उसे भोजन नहीं मिल पाता। और जो अघाये हुए ही नही बल्कि भंडारण किये हुए हैं वो दो रूपये किलो अनाज वाली योजना का लाभ उठा रहे हैं। जो घर दिए जाने योग्य हैं मतलब जिन्हें रहने के लिए घर नहीं है। उन्हें आवासीय योजना का लाभ नहीं मिलता। वहीं जिनके पास एक मंजिला इमारत पहले से ही है उसे दो मंजिला बनवाने के लिए इन्दिरा आवास योजना का एक बार नही चार-चार बार लाभ दिया जाता है।

कई लड़के-लड़कियाँ विवाह के योग्य नहीं होते लेकिन उनका विवाह कर दिया जाता है। वहीं कई लोग विवाह के योग्य होते हुए भी अविवाहित रह जाते हैं। कई लोग तो भाग जाने व भगा लाने की हद तक पहुँच जाते हैं। बहुत सी लड़कियाँ व महिलाएं माँ बनने के लिए सब तरह से योग्य होते हुए भी माँ नहीं बनती। वहीं दूसरी ओर कई तरह से अयोग्य होते हुए भी कई लड़कियाँ व महिलाएं माँ बन जाती हैं।

कई विद्यार्थी जो पास होने के भी योग्य नहीं होते उनको टॉप करा दिया जाता है ( पिछले साल परीक्षा में माथुर जी के लड़के की कॉपी बदली जा चुकी है )। कई लोग जो कभी विद्यार्थी बनने के भी योग्य नहीं रहे वो शिक्षक बना दिए जाते है। ऐसे लोगों के कोचिंगों में भी बहुत भीड़ जमा होती है। जबकि पास में ही सारी पढ़ाई पढ़े पर कढे न होने के कारण पढ़ाकू जी के कोचिंग में हवा दौड़ती है।

घर के पूजने योग्य जोगी को जोगड़ा (नाम तक नहीं जानते) और बाहर के जोगड़ों को बड़ा सिद्ध समझकर लोग ‘घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध’ वाली उक्ति को चरितार्थ करते हैं। जहाँ अपने बाप को बाप कहने तक में शर्म लगती है वहीं दूसरे के बाप का सत्कार किया जाता है। अपना बाप कब आया कब गया पता ही नही चलता। और दूसरे के बाप के आगमन पर पार्टी दी जाती है, जश्न मनाया जाता है। अपने बाप को इस कदर भूलते जा रहे हैं कि उनका नाम तक याद नहीं रहता और दूसरे के बाप की जीवन गाथा तक लिख डालते हैं।

कहाँ तक बताएं इसी तरह की हजारों बातों का दस्तावेज बनाकर माथुर साहब सरकार के पास भेज दिए हैं। सरकार ने उसके अध्ययन के लिए कई टीमें गठित कर दी है। जिस पर रोज लाखों रूपये का खर्चा आ रहा है। दो बार अध्ययन की समय सीमा भी बढ़ाई जा चुकी है। जब तक उनका फैसला आये हम फैसला पाठकों पर छोड़ते हैं।

--------

एस के पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।
URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

*********

दोहे-

1- तू भी पाएगा कभी फूलों की सौगात।

धुन अपनी मत छोड़ना सुधरेंगे हालात।

 

2- बने विजेता वो सदा ऐसा मुझे यकीन।

आँखों आकाश हो पांवों तले जमीन।।

 

3- जब तुमने यूँ प्यार से, देखा मेरे मीत।

थिरकन पांवों में सजी, होंठों पे संगीत।।

 

4- तुम साथी दिल में रहे, जीवन भर आबाद।

क्या तुमने भी किया, किसी वक्त हमें याद।।

 

5- लिख के खत से तुम कभी,भेजो साथी हाल।

खत पाए अब आपका, बीते काफी साल।।

 

6- हिन्दी हो हर बोल में,हिन्दी पे हो नाज।

हिन्दी में होने लगे,शासन के सब काज।।

 

7- हिन्दी भाषा है रही,जन-जन की आवाज।

फिर क्यों आंसू रो रही,राष्ट्रभाषा आज।।

 

8- मन रहता व्याकुल सदा,पाने माँ का प्यार।

लिखी मात की पातियां,बांचू बार हजार।।

 

9- बना दिखावा प्यार अब, लेती हवस उफान।

राधा के तन पे लगा, है मोहन का ध्यान।।

 

10-आपस में जब प्यार हो, फ ले खूब व्यवहार।

रिश्तों की दीवार में, पड़ती नहीं दरार।।

 

11-चिट्ठी लायी गांव से, जब राखी उपहार।

आँखें बहकर नम हुई,देख बहना का प्यार।।

 

12-लोकतंत्र अब रो रहा,देख बुरे हालात।

संसद में चलने लगे, थप्पड़-घूंसे-लात।।

 

13-नहीं रहे मुंडेर पे, तोते-कौवे-मोर।

डूब मशीनी शोर में, होती अब तो भोर।।

 

14-सूना-सूना लग रहा, बिन पेड़ों के गांव।

पंछी उड़े प्रदेश को, बांधे अपने पांव।।

 

15-ख़त वो पहले प्यार का, देखूं जितनी बार।

महका-महका-सा लगे, यादों का गुलजार।।

 

16-बन के आंसू बह चले, जब हृदय की पीर।

तनवा काशी-सा लगे, मनवा बने कबीर।।

 

17-अपना सब कुछ त्याग के, हरती नारी पीर।

फिर क्यों आँखों में भरा,आज उसी के नीर।।

 

18-कलयुग के इस दौर में, ये कैसा बदलाव।

सगे-संबंधी दे रहे, दिल को गहरे भाव।।

 

19-मात-पिता के वेश में, जानो तुम रे राम।

पाएगा तू क्या भला, जाकर काशी-धाम।।

 

20-आजादी के बाद भी,देश रहा कंगाल।

जेबें अपनी भर गए, नेता और दलाल।।

----

vijay verma

कहानी

लौट आओ दीदी

बात उन दिनों की है जब आम आदमी तक टीवी-कंप्यूटर की पहुँच तो नहीं ही हुई थी,रेडियो-ट्रांजिस्टर भी अपनी पहुँच सर्व-सुलभ नहीं बना सके थें.छपरा शहर के मुख्य-मार्ग पर--जो गुदड़ी -बाज़ार से साहेबगंज तक जाती है--यातायात के मुख्य साधन टमटम और बैल-गाड़ी ही थें.बैल-गाड़ी तो खैर सामान ढोने के लिए ही थे ,लेकिन उसपर लटककर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने से बच्चों को भला कौन रोक सकता था.

तो उन दिनों साहेबगंज में आज की भांति इतने सारे ठेले,मोबाइल की दुकानें ,सड़क पर सजी दुकानें तो नहीं ही थे,इतना भीड़-भाड़ भी नहीं था.

जिला मुख्यालय होते हुए भी उसका स्वरुप एक कस्बे से ज्यादा नहीं था.फिर भी लगता है कि जब से सृष्टि बनी है तब से इस शहर का मुख्य-बाज़ार साहेबगंज ही रहा है.हथुआ महाराज का बसाया हुआ हथुआ-मार्केट तब भी शहर का शान था,आज भी है.

एक मुख्य बात यह थी कि गेहूं पिसाने की चक्की साहेबगंज में ही थी इसलिए दहियावां -टोला तक के लोगो को भी इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए साहेबगंज ही आना पड़ता था.

आज जो कलेक्टर्स -कम्पौंड में स्टेडियम और उसके चारो तरफ इतने सारे घर बने हुए है,तब उस सब का अस्तित्व ही नही था .पूरे मैदान में पेड़-पौधे एवं ऊंची-ऊंची झाड़ियों का साम्राज्य था.शाम होते ही उस रास्ते पर लोगों का चलना बंद हो जाता था और उस समय के जितने भी बुद्धिमान लोग थे उनका निश्चित मत यह था कि रात होते ही उस मैदान में भूत-प्रेतों का डेरा जम जाता था.बच्चे तो खैर दिन में भी उधर जाने से डरते थे.

इसी शहर के दहियावां मोहल्ले में एक ५-६ साल का लड़का रहता था अपने से २-३ साल बड़ी बहन के साथ वैसे तो उस घर में तीन सदस्य थे--जो मोटे -ताजे अधेड़ उम्र के पुरुष प्राणी थे,उन्हें बच्चे पिताजी कह कर बुलाते थे.वे घर के नियमित सदस्यलगते नहीं थे क्योंकि हर २-४ दिनों पर वे शहर से बाहर चले जाते थे--कुछ काम धंधे के लिए.

नाम तो बताया नहीं अभी तक उस लड़के और उसकी बहन का,चलिए लड़के का नाम रोशन और लड़की का नाम दुलारी रख लेते है.

रोशन को दिन-भर मटरगस्ती करना और जो भी रुखा-सूखा मील जाए उसे खाकर मस्त रहना---इससे ज्यादा उसका कोई काम ना था ना ही उसकी चाह ही थी.

गरीबी और मज़बूरी समय से पहले ही जीवन-निर्वाह के लिए जरूरी कार्यों को सिखा देती है,इसलिए भले ही दुलारी सिर्फ ८-९ साल कि थी पर तवे पर रोटियां सेंकना सीख गयी थी.तो घर में आटा रहने पर इस बात की गारंटी रहती थी की दोनों बच्चों को भूखो पेट सोने की नौबत नहीं आएगी.,वैसे मोहल्लेवाले भी कभी-कभी उन बच्चो को रोटी-सब्जी की दावत दे ही दिया करते थे.

तो गेंहू पिसाना रोशन का काम था ,और रोटियां सेंकना दुलारी का और इसके लिए दोनों में से किसी को भी एक दूसरे को रिमाइन्डर नहीं देना पड़ता था.

घर क्या था बस झोपड़ी से थोडा बेहतर ,बेहतर इसलिए कि एक आँगन था उसमें पीने के पानी के लिए एक बड़ा सा घड़ा था रसोईघर में जिसमे साप्ताहिक रूप से पानी भरा जाता था.उस ज़माने में शायद बेक्टीरिया गणों को यह मालूम ना था कि पानी प्रदूषित करने की जिम्मेवारी उनकी ही है,क्योंकि कभी यह सुना नहीं गया कि उस पानी को पीकर बच्चे कभी बीमार पड़े हो.

उनके घर में एक टूटी हुई कुर्सी भी थी ,टूटी हुई विशेषण पर ज्यादा ध्यान मत दीजिये क्योंकि उसकी इज्ज़त कम नहीं थी.किसी विशेष अतिथि के आगमन पर उसे ही विक्रमादित्य के सिंहासन की तरह पेश किया जाता था.

घर से करीब १०० मीटर की दूरी पर एक नदी बहती थी,गंगा तो नहीं थी लेकिन उसकी जलधारा में डुबकी लगाने के पहले लोगो को 'जय गंगा मैया 'बोलने की आदत पड़ी हुई थी.अगर उस बे-जुबान नदी में बोलने की शक्ति होती तो अवश्य बताती कि उसे नाम बदल कर जीना पसंद है कि नहीं

बच्चे आचार-रोटी ,गुड-रोटी खाते ठंडा पानी पीते और दिनभर मोहल्ले के हम-उम्र बच्चों के साथ खेलते रहते.पढाई-लिखाई उन लोगों के लिए शौकिया चीज थी.

बहुत से माता-पिताओं का यह मानना था कि ज्यादा लिखने-पढने से आँखें खराब हो जाती है.ऐसा ही विचार उन बच्चों के पिता का भी था.

वैसे उन बच्चों ने मोहल्ले वालों से यह कहते भी सुना था कि ये बच्चे अगर उसके अपने होते तो क्या वह इन्हें स्कूल नहीं भेजता.

दशहरे कि धूमधाम बीत जाने के बाद आज भी लोगों को सोनपुर मेले का इंतज़ार रहता है,उस ज़माने में भी रहता था.रोशन और दुलारी को सोनपुर मेला देखना तो नसीब नहीं हुआ था लेकिन उसका वर्णन सुनने में भी बहुत मज़ा था.इतने हाथी,इतने ऊँट,घोडा बैल,इतनी दुकानें ---बाप रे बाप.जौनपुर कि नौटंकी! खुरमे और गाजे की दुकानें.

जिंदगी ऐसे ही चलती जा रही थी.

एक दिन रोशन गेंहूं पिसाने के अपने कर्तव्य का निर्वाह करने साहेबगंज जा रहा था.श्रम बचाने के लिए झोले को बैल-गाड़ी पर रखकर पीछे-पीछे चला जा रहा था तभी उसकी नज़र दूर से आते हुए पिताजी पर पड़ी..पिताजी के साथ एक बड़ी लड़की ,दुलारी से भी बड़ी,ये कौन आ रही है?इसे पहले कभी देखा तो नहीं.

जब वह वापस घर लौटा तो वो लड़की घर में ही एक कोने में गुमसुम खड़ी थी इतना सुंदर चेहरा होने पर भी चेहरे पर जिंदगी के कोई लक्षण नहीं!कोई ख़ुशी नहीं चेहरे पर,जब की वह तो जानता ही नहीं था कि खुश होकर रहने के अलावे और किसी ढंग से भी जिया जा सकता है..

आँगन में प्रवेश करते ही पिताजी ने उसे बताया 'यह तुम्हारी नई दीदी है,यही रहेगी.'इतना कहकर पिताजी कही चले गए.

रोशन और दुलारी तो बहुत खुश हुए कि चलो दो से भले तीन !और यह नई दीदी काफी होशियार भी लगती है---कितने अच्छे ढंग से कपडे पहनी है,पैरों में हवाई चप्पल भी है.वे यह सोच कर काफी खुश थे कि नयी दीदी ढेर सारी कहानियां सुनाएगी ,बहुत सी नई -नई बातें बताएगी. पर यह क्या,जब से आयी है या तो रोते रहती है या गुमसुम रहती है.

इस दीदी का नाम क्या है?,कहाँ से आयी है यह दीदी?पिताजी ने कभी इसका जिक्र क्यों नहीं किया?.......,इत्यादि बहुत सारे सवाल उसके जेहन में तैर रहे थे. वह पिताजी से नहीं पूछ सका,सोचा क्यों ना सीधे दीदी से ही पूछ लिया जाए.पर दीदी के आँसू रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

दुलारी भी दीदी को रोते देखकर उदास थी लेकिन कुछ समझने की कोशिश कर रही थी.

आखिर वह हिम्मत करके नई दीदी के पास जाकर बोला;'बोलो ना दीदी,तुम क्यों रो रही हो?क्या भूख लगी है?तुम अभी तक कहाँ थी दीदी?नई दीदी ने सस्नेह नज़रों से उसे देखा पर बोली कुछ नहीं.दुलारी दो रोटियाँ और थोडा सा गुड लेकर आयी ,दीदी ने उसे अपने पास बैठा लिया पर स्थाई दर्द का भाव बना रहा.

रोशन और दुलारी अपने अनुभव से समझ गए कि पिताजी आज रात को घर नहीं लौटने वाले .ऐसी धुप्प अँधेरे में बच्चे दरवाज़ा खोल कर इधर-उधर ढूंढें ऐसा ना कभी हुआ था,ना आज जरूरत थी.कमरे के एक कोने में दिया जल रहा था बच्चों के लिए अभी यही सबसे महत्वपूर्ण बात थी.रोटी का एकाध टुकड़ा सबने निगला और बिस्तर पर लेट गए.नई दीदी को भी उसमें जगह मिल गयी.बच्चो ने फिर से दीदी से अपने बारे में बताने की जिद की, और इस बार दीदी ने मुंह खोला ;

मै अपने माता-पिता के सोनपुर मेला देखने आयी थी ,मेले में एक हाथी के सनक जाने के कारण भगदड़ मच गयी. मै अपने माता-पिता से बिछड़ गयी.लाखों लोगों के भीड़ में मैंने बहुत खोजा उन लोगों को लेकिन उन लोगों का पता नहीं चल सका.मेरे पिताजी के उम्र के एक आदमी ने मुझे आश्रय देने के लिए अपने घर चलने को कहा .आखिर रात तो कहीं काटनी थी सो मैं उनके साथ चल दी.लेकिन उन्होंने तुम्हारे पिताजी से पैसा लेकर मुझे बेच दिया.दूसरे दिन तुम्हारे पिताजी डरा धमका कर मुझे यहाँ ले आये.आज यहाँ आते समय तुम्हारे पिताजी ने रास्ते में ही एक और आदमी के हाथो बेचने के लिए मेरा सौदा पक्का कर लिया.कल दोपहर को वह आएगा और तुम्हारे पिताजी को पैसा देकर मुझे ले जाएगा.

रोशन बोल उठा ,'नहीं दीदी हम आपको कही नहीं जाने देंगे.दीदी आप हम लोगों को छोड़ कर कहीं नहीं जाइएगा. हमलोग उस आदमी को मार कर भगा देंगे. नई दीदी उसकी बात पर फीकी हँसी हँसकर रह गयी.

सुबह उठकर रोशन झाड़ियों की तरफ खेलने चला गया.एकाध घंटे बाद लौटा.उसके हाथो में पत्थर थे,ईंट का टुकड़ा था और एक डिबिया भी थी.

९ बजते-बजते वह नया खरीदार आ धमका.वह आदमी बेतकल्लुफी से कुर्सी पर बैठ गया औत अजीब-अजीब नज़रों से दीदी को घूरने लगा.

रोशन उठा , डिबिया खोला और उसे उस आदमी के बंडी के अंदर पीठ के तरफ उलट दिया.वह आदमी दर्द से बिलबिलाने लगा. समझ नहीं सका कि आखिर हुआ क्या,तभी रोशन तली बजा-बजा कर हँसने लगा और कहने लगा 'और ले जाओ मेरी दीदी को ,बिच्छू काट रहा है तब कैसा मज़ा आ रहा है.

वह आदमी बंडी उतारते हुए उठकर भगा वहां से पर जाते-जाते धमका गया 'छोडूंगा नहीं तुझे,पैसा खर्च किया है.देखता हूँ कब तक बचती है और कहाँ तक भागती है'

रोशन अपनी जीत पर खुश होकर फिर दोस्तों के साथ खेलने चला गया,शायद अपनी बहादुरी के किस्से सुनाने.

दुलारी भी तुरंत कोई विपदा नहीं देखकर रसोईघर के कामों में व्यस्त हो गयी.

खेलते-खेलते जब रोशन को भूख-प्यास लगी तब वह घर कि ओर दौड़ा.घर पर आकार उसने सबसे पहले नयी दीदी को ढूँढा. कहीं अता-पता नहीं चला.दुलारी से पूछा,दोनों मिलकर खोजने लगे,पर पता नहीं चला.दोनों का मन घबराने लगा.घर से बाहर खोजा,चारो तरफ खोजा ,कही पता नहीं चला.

जब वह बहुत उदास होता था तो नदी के किनारे जाकर बैठ जाता था.----घंटों एकांत में.आज भी वह नदी के किनारे की तरफ चल दिया.नदी के तट जाते ही उसे दिखाई दिया कि दीदी नदी के अन्दर की तरफ बढ़ते जा रही है.वह पूरा जोड़ लगाकर चिल्लाया 'दीदी!आगे मत बढ़ो दीदी! लौट आओ.लौट आओ दीदी.दीदी.....दीदी........

लेकिन दीदी तो जैसे सुन ही नहीं रही थी.एकबार मुड़कर भी नहीं देखा दीदी ने .वह चिल्लाता रहा पर दीदी बढती रही.धीरे-धीरे कमर तक फिर कंधे तक और फिर गर्दन तक पानी में दूब गयी.फिर अहिस्ता-अहिस्ता नज़रों से ओझल हो गयी.वह वही पर बैठ कर बुक्का -फाड़ कर रोता रहा.

---

कविता

मुखर-मौन

मौन ही संवाद है,

शब्द,अर्थ और अनुभूति

सारे उसके बाद है.

मूक निगाहें,निशब्द याचना

पलकों का उठना

होंठ विलगना

बिना शब्द विचार तरंगे

अश्रुपूरित नयन

यमुना और गंगे

यहीं थमी है पूरी श्रृष्टि

बस यही तो ब्रम्ह-नाद है.

यह विफलता भावों की है

गर शब्द-प्रयोग जरूरी है.

मौन अगर हो पायी मुखर तो

तुम्हे कोटि-कोटि धन्यवाद है.

नोट --शब्दों से तो प्राय

अर्थ का अनर्थ हुआ है,

दिल से अगर निकले तो

खामोशी भी एक दुआ है.

---

v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

Malini gautam new (Custom)

स्वर्ण मृग


बहुत हुआ ! बस !

अब और नहीं !

नहीं बनना है उसे

नींव का पत्थर

उसे तो बनना है

शिखर पर विराजमान

स्वर्णिम कलश !

सदियों से देवी बनकर

नींव में डालती रही

त्याग, समर्पण

प्रेम,आदर्श

और तप के पत्थर !

हर बार उसे ही

छला

जाता रहा

कुंती, गांधारी,

अनुसूया और सावित्री

के नाम पर !

और हर बार

स्वर्ण कलश बन

शिखर पर

जगमगाता रहा

कोई और !

हर बार एक सीता

अपना सर्वस्व

समर्पित कर

अनुकरण करती रही

अपने ही राम का

और हर बार

ली गई उसी सीता की

अग्नि परीक्षा !

पर कर लिया है

उसने अब संकल्प

कि नहीं चलेगी वह

किसी राम के

बताये हुए पथ पर

उसे तो चलना है

अपने ही

बनाये हुए रास्ते पर !

नहीं देगी वह अवसर

किसी को

लक्ष्मण रेखा खींचने का

क्योंकि कर लिया है

उसने निश्चित

कि वह स्वयं

ही मारेगी

अपने हिस्से के

स्वर्ण मृग को !

डॉ. मालिनी गौतम

hindi filmi geetkaar Indeevar

गीतकार इंदीवर सिनेजगत के उन नामचीन गीतकारों में से एक थे जिनके लिखे सदाबहार गीत आज भी उसी शिद्‌दत व एहसास के साथ सुने व गाए जाते हैं, जैसे वह पहले सुने व गाए जाते थे।

इंदीवर जी ने चार दशकों में लगभग एक हजार गीत लिखे जिनमें से कई यादगार गाने फिल्‍मों की सुपर डुपर सफलता के कारण बने। उत्तर प्रदेश के झाँसी जनपद मुख्‍यालय से बीस किलोमीटर पूर्व की ओर स्‍थित बरूवा सागर कस्‍बे में आपका जन्‍म कलार जाति के एक निर्धन परिवार में 15 अगस्‍त, 1924 ई. में हुआ था। आपका मूल नाम श्‍यामलाल बाबू राय है। स्‍वतंत्रता संग्राम आन्‍दोलन में सक्रिय भाग लेते हुए आप ने श्‍यामलाल बाबू ‘आजाद' नाम से कई देश भक्‍ति के गीत भी अपने प्रारम्‍भिक दिनों में लिखे थे।

श्‍यामलाल को बचपन से ही गीत लिखने व गाने का शौक था। जल्‍दी ही आपको स्‍थानीय कवि सम्‍मेलनों में शिरकत करने का मौका मिलने लगा। स्‍व. इंदीवर के बाल सखा रहे स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी स्‍वर्गीय श्री रामसेवक रिछारिया एवं स्‍वर्गीय श्री आशाराम यादव से लेखक ने उनके जीवनकाल में इंदीवर जी के बारे में कई जानकारियाँ प्राप्‍त की थीं, जैसे श्री रिछारिया जी ने लेखक को बताया था कि इनके पिता श्री हरलाल राय व माँ का निधन इनके बाल्‍यकाल में ही हो गया था। इनकी बड़ी बहन और बहनोई घर का सारा सामान और इनको लेकर अपने गाँव चले गये थे। कुछ माह बाद ही ये अपने बहन-बहनोई के यहाँ से बरूवा सागर वापस आ गये थे। बचपन था, घर में खाने-पीने का कोई प्रबन्‍ध और साधन नहीं था। उन दिनों बरूवा सागर में गुलाब बाग में एक फक्‍कड़ बाबा कहीं से आकर एक विशाल पेड़ के नीचे अपना डेरा जमाकर रहने लगे थे। वे कहीं भिक्षा माँगने नहीं जाते थे। धूनी के पास बैठे रहते थे। बहुत अच्‍छे गायक थे। वे चंग पर जब गाते और आलाप लेते थे, तो रास्‍ता चलता व्‍यक्‍ति भी उनकी स्‍वर लहरी के प्रभाव में गीत की समाप्‍ति तक रूक जाता था। जब लोग उन्‍हें पैसे भेंट करते थे तो वह उन्‍हें छूते तक नहीं थे। फक्‍कड़ बाबा के सम्‍पर्क में श्‍यामलाल को गीत लिखने व गाने की रूचि जागृत हुई। फक्‍कड़ बाबा गांजे का दम लगाया करते थे। अतः बाबा को भेंट हुये पैसों से ही श्‍यामलाल चरस और गांजे का प्रबन्‍ध करते थे। श्‍यामलाल उन बाबा की गकरियाँ (कण्‍डे की आग में सेंकी जाने वाली मोटी रोटी) बना दिया करते थे, स्‍वयं खाते और बाबा को खिलाते फिर बाबाजी का चिमटा लेकर राग बनाकर स्‍वलिखित गीत भजन गाया करते थे।

राष्‍ट्रीय विचारधारा और सुधार की दृष्‍टि से रामसेवक रिछारिया ने उन्‍हें साहित्‍य की ओर मोड़ा। उनकी रचनाओं को सुधारते रहे। एक बार कालपी के विद्यार्थी सम्‍प्रदाय के सम्‍मेलन में श्‍यामलाल ‘आजाद' ने जब मंच पर कविता पाठ किया तो श्रोताओं द्वारा उन्‍हें काफी सराहा गया और बड़े कवियों की भाँति विदाई के समय उन्‍हें इक्‍यावन रूपया की भेंट प्राप्‍त हुई। इन इक्‍कयावन रूपयों से सबसे पहले नई हिन्‍द साइकिल खरीदी। तब हिन्‍द साइकिल छत्‍तीस रूपये में आती थी। सम्‍मेलनों में जाने योग्‍य अचकन और पाजामा सिलवाए। फिर भी उनकी जेब में काफी रूपये बचे रहे। उन दिनों एक रूपया की बहुत कीमत थी।

बरूआ सागर नगर पालिका परिषद के अध्‍यक्ष श्री मेहेर सागर इंदीवर जी के संस्‍मरण सुनाते हुए कहते हैं कि वे हमारे घर अक्‍सर मट्‌ठा पीने आया करते थे। इंदीवर जी को मट्‌ठा पीने और बाँसुरी बजाने का बहुत शौक था। वे बेतवा नदी के किनारे, बरूवा तालाब के किनारे घण्‍टों बाँसुरी बजाते हुए मदमस्‍त रहते थे। इन्‍दीवर जी हमारे कस्‍बे के गौरव है, वे हमारी थाती हैं, उनके जीवनकाल से ही यहाँ पर प्रत्‍येक वर्ष विशाल कवि सम्‍मेलन का आयोजन किया जाता रहा है। नगर पालिका द्वारा स्‍व. इन्‍दीवर जी के नाम से एक मुहल्‍ले का नाम इंदीवर नगर कर दिया गया है। नगर पालिका परिषद प्रांगण में निर्माणाधीन वातानुकूलित सभागार का नाम भी हम लोग इंदीवर जी के नाम से रखने जा रहे हैं। एक प्रसंग का जिक्र करते हुए वह सगर्व बताते है कि युवा श्‍यामलाल ‘आजाद' को एक बार बरूवा सागर में हुए कवि सम्‍मेलन में अंग्रेजी सत्ता को कटाक्ष कर उनके गाए गाने ‘ओ किराएदारों कर दो मकान खाली....' पर जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। इन्‍होंने स्‍वतंत्रता संग्राम व देश भक्‍ति के कई गीत लिखे, कई स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आप निकटस्‍थ साथी रहे हैं जिन्‍हें अपने रचे शौर्य पूर्ण गीत सुना कर वे जोश से भर देते थे। देश की स्‍वतंत्रता के 20 वर्ष के बाद राष्‍ट्र द्वारा उन्‍हें स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा दिया गया। बरूवा सागर मोटर स्‍टैण्‍ड में लगे स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानियों के शिला लेख में आपका नाम सम्‍मान के साथ अंकित है।

युवा होते श्‍यामलाल ‘आजाद' की शोहरत स्‍थानीय कवि सम्‍मेलनों में बढ़ने लगी और उन्‍हें झाँसी, दतिया, ललितपुर, बबीना, मऊरानीपुर, टीकमगढ़, ओरछा, चिरगाँव, उरई में होने वाले कवि सम्‍मेलनों में आमंत्रित किया जाने लगा जिससे इन्‍हें कुछ आमदनी होने लगी। इसी बीच इनकी मर्जी के बिना इनका विवाह झाँसी की रहने वाली पार्वती नाम की लड़की से करा दिया गया। जिससे वह अनमने रहने लगे और जबरदस्‍ती की गई शादी के कारण रूष्‍ट होकर लगभग बीस वर्ष की अवस्‍था में मुम्‍बई भागकर चले गए जहाँ पर इन्‍होंने दो वर्ष तक कठिन संघर्षों के साथ सिनेजगत में अपना भाग्‍य गीतकार के रूप में आजमाया। वर्ष 1946 में प्रदर्शित फिल्‍म ‘डबल फेस' में आपके लिखे गीत पहली बार लिए गए किन्‍तु फिल्‍म ज्‍यादा सफल नहीं हो सकी और श्‍यामलाल बाबू ‘आजाद' से ‘इंदीवर' के रूप में बतौर गीतकार अपनी खास पहचान नहीं बना पाए और निराश हो वापस अपने पैतृक गाँव बरूवा सागर चले आए। वापस आने पर इन्‍होंने कुछ माह अपनी धर्मपत्‍नी के साथ गुजारे। इस दौरान इन्‍हें अपनी पत्‍नी पार्वती से विशेष लगाव हो गया जो अंत तक रहा भी। पार्वती के कहने से ही ये पुनः मुम्‍बई आने जाने लगे और बी व सी ग्रुप की फिल्‍मों में भी अपने गीत देने लगे। यह सिलसिला लगभग पाँच वर्ष तक चलता रहा। इस बीच इन्‍होंने धर्मपत्‍नी पार्वती को अपने साथ मुम्‍बई चलकर साथ रहने का आग्रह किया परन्‍तु पार्वती मुम्‍बई में सदा के लिए रहने के लिए राजी नहीं हुई। उनका कहना था, ‘रहो बरूवा सागर में और मुम्‍बई आते जाते रहो।' इंदीवर इसके लिए तैयार नहीं हुए और पत्‍नी से रूष्‍ट होकर मुम्‍बई में रह कर पूर्व की भाँति फिल्‍मों में काम पाने के लिए संघर्ष करने लगे। इनकी मेहनत रंग लाई और वर्ष 1951 में प्रदर्शित फिल्‍म ‘मल्‍हार' के गीत ‘बडे़ अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम' ने सिने जगत में धूम मचा दी। फिल्‍म इस गीत के कारण काफी चली और इंदीवर स्‍वयं की पहचान बतौर गीतकार बनाने में सफल हुए।

अपनी धर्मपत्‍नी पार्वती से, जिसे वह ‘पारो' कहकर सम्‍बोधित करते थे, इन्‍हें बहुत प्‍यार था। तमाम प्रयासों के बाद भी वह पारो को मुम्‍बई नहीं ला सके और यहीं से इनके गीतों में विरह, वेदना, दर्द का एक अजीब पैनापन देखा जाने लगा, इनके बचपन के मित्र स्‍व. आशाराम यादव बताया करते थे ‘‘जबईं से श्‍यामलाल बाबू रोउत गाने लिखन लगो तो, वो दुःखी मन से गाने लिखे करत तो।''

जिंदगी के अनजाने स़फर से बेहद प्‍यार करने वाले हिन्‍दी सिने जगत के मशहूर शायर और गीतकार इंदीवर का जीवन से प्‍यार उनकी लिखी हुई इन पंक्‍तियों में समाया हुआ है-

जिंदगी से बहुत प्यार हमने किया

मौत से भी मोहब्बत निभाएंगे हम

रोते रोते जमाने में आए मगर

हंसते-हंसते जमाने से जाएंगे हम

वर्ष 1963 में बाबू भाई मिस्‍त्री की संगीतमय फिल्‍म ‘पारसमणि' की सफलता के बाद इंदीवर शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुँचे। इंदीवर के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी निर्माता निर्देशक मनोज कुमार के साथ खूब जमी। मनोज कुमार ने सबसे पहले इंदीवर से फिल्‍म ‘उपकार' के लिए गीत लिखने की पेशकश की। कल्‍याण जी आनंद जी के संगीत निर्देशन में फिल्‍म उपकार के लिए इंदीवर ने ‘कस्‍में वादे प्‍यार वफा...' जैसे दिल को छू लेने वाले गीत लिखकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इसके अलावा मनोज कुमार की फिल्‍म ‘पूरब और पश्‍चिम' के लिये भी इंदीवर ने ‘दुल्‍हन चली वो पहन चली' और ‘कोई जब तुम्‍हारा हृदय तोड़ दे' जैसे सदाबहार गीत लिखकर अपना अलग ही समां बांधा। ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश' ‘चन्‍दन सा बदन' ‘छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए' जैसे इंदीवर के लिखे न भूलने वाले गीतों को कल्‍याण जी आनंद जी ने संगीत दिया।

वर्ष 1970 में विजय आनंद निर्देशित फिल्‍म जॉनी मेरा नाम में ‘नफरत करने वालों के सीने में.....' ‘पल भर के लिये कोई मुझे...' जैसे रूमानी गीत लिखकर इंदीवर ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। मनमोहन देसाई के निर्देशन में फिल्‍म ‘सच्‍चा झूठा' के लिये इंदीवर का लिखा एक गीत ‘मेरी प्‍यारी बहनियां बनेगी दुल्‍हनियां..' को आज भी शादी के मौके पर सुना जा सकता है। इसके अलावा राजेश खन्ना अभिनीत फिल्‍म ‘सफर' के लिए इंदीवर ने ‘जीवन से भरी तेरी आँखें...' और ‘जो तुमको हो पसंद....' जैसे गीत लिखकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया।

जाने माने निर्माता निर्देशक राकेश रोशन की फिल्‍मों के लिये इंदीवर ने सदाबहार गीत लिखकर उनकी फिल्‍मों को सफल बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके सदाबहार गीतों के कारण ही राकेश रोशन की ज्‍यादातर फिल्‍में आज भी याद की जाती है। इन फिल्‍मों में खासकर कामचोर, खुदगर्ज, खूनभरी मांग, काला बाजार, किशन कन्‍हैया, किंग अंकल, करण अर्जुन और कोयला जैसी फिल्‍में शामिल हैं। राकेश रोशन के अलावा उनके पसंदीदा निर्माता निर्देशकों में मनोज कुमार, फिरोज खान आदि प्रमुख रहे हैं। इंदीवर के पसंदीदा संगीतकार के तौर पर कल्‍याणजी-आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है। कल्‍याण जी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में इंदीवर के गीतों को नई पहचान मिली। सबसे पहले इस जोड़ी का गीत-संगीत वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्‍म ‘हिमालय की गोद' में पसंद किया गया। इसके बाद इंदीवर द्वारा रचित फिल्‍मी गीतों में कल्‍याण जी आनंदजी का ही संगीत हुआ करता था। ऐसी फिल्‍मों में उपकार, दिल ने पुकारा, सरस्‍वती चंद्र, यादगार,सफर, सच्‍चा झूठा, पूरब और पश्‍चिम, जॉनी मेरा नाम, पारस, उपासना, कसौटी, धर्मात्‍मा ,हेराफेरी, डॉन, कुर्बानी, कलाकार आदि फिल्‍में शामिल हैं।

कल्‍याणजी आनंदजी के अलावा इंदीवर के पसंदीदा संगीतकारों में बप्‍पी लाहिरी और लक्ष्‍मीकांत प्‍यारेलाल जैसे संगीतकार शामिल हैं। उनके गीतों को किशोर कुमार, आशा भोसले, मोहम्‍मद रफी, लता मंगेश्‍कर जैसे चोटी के गायक कलाकारों ने अपने स्‍वर से सजाया है। इंदीवर के सिने कैरियर पर यदि नज़र डाले तो अभिनेता जितेन्‍द्र पर फिल्‍माये उनके रचित गीत काफी लोकप्रिय हुआ करते थे। इन फिल्‍मों में दीदारे यार, मवाली, हिम्‍मतवाला, जस्‍टिस चौधरी, तोहफा, कैदी, पाताल भैरवी, खुदगर्ज, आसमान से ऊँचा, थानेदार जैसी फिल्‍में शामिल हैं।

वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म 'अमानुष' के लिए इंदीवर को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया

इंदीवर ने अपने सिने कैरियर में लगभग 300 फिल्‍मों के लिए गीत लिखें। इंदीवर के गीतों की लंबी फेहरिस्‍त में.. मैं तो भूल चली बाबुल का देश..., फूल तुम्‍हें भेजा है खत में, ताल मिले नदी के जल में..., मेरे देश की धरती सोना उगले.... जिन्‍दगी का सफर है ये कैसा सफर...... तेरे चहरे में वो जादू है........ दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा...... आप जैसा कोई मेरी जिन्‍दगी में आये.... होठों को छू लो तुम..... दुश्‍मन न करे दोस्‍त ने वो काम किया है..... हर किसी को नहीं मिलता...... रूप सुहाना लगता है..... जाती हूँ मैं जल्‍दी है क्‍या...... तुम मिले दिल खिले..... ये तेरी आँखें झुकी-झुकी...... न कजरे की धार न मोतियों का हार.... आदि हैं।

इन्‍दीवर से उनका पैतृक गाँव बरूवासागर क्रमशः छूटने लगा और उनके लिखे गीत नित नई-नई ऊँचाइयाँ पाने लगे। नाम, शोहरत, शराब और पैसा ने इन्‍हें क्रमशः भटकाया भी, पहले पंजाबी मूल की एक स्‍त्री इनके जीवन में आई जिससे बाद में अनबन हुई और पुत्र के उत्तराधिकार के लिए मुकदमेबाजी भी हुई। फिर दूसरी महिला जो गुजराती मूल की थी एवं मलयालम फिल्‍मों की हीरोइन भी रही और जिसके पहले से एक बेटी भी थी, इंदीवर के जीवन में आई जिसने इनको प्‍यार किया व समर्पित भी रहीं फिर भी इंदीवर अपनी पहली धर्मपत्‍नी पार्वती को नहीं भूल पाए। पार्वती बहुत स्‍वाभिमानी स्‍त्री थी, उसने इंदीवर के लाख चाहने पर भी कभी भी उनसे एक पैसा अपने भरण-पोषण के लिए नहीं लिया और इनकी प्रतीक्षा में बरूवा सागर में एक छोटी-सी दुकान आजीवन चलाकर अपना गुजर-बसर किया। बताते है कि इंदीवर ने स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी की हैसियत से मिलने वाली पेंशन पार्वती के लिए कर दी थी।

बरूवा सागर के प्रतिष्‍ठित कवि डॉ. ओमप्रकाश दीक्षित ‘पागल' के अनुसार इंदीवर जी के गीतों में बुन्‍देलखंड विशेषकर बरूवा सागर, झाँसी, ओरछा के प्राकृतिक दृश्‍यों, व धर्मपत्‍नी ‘पारो' का नाम चित्रित होता है। पार्वती का निधन 2005 में हो चुका है। वह निःसंतान थी। पार्वती के भाई को इंदीवर की सम्‍पत्ति का एक हिस्‍सा प्राप्‍त हुआ। पार्वती के भतीजे श्री रामेश्‍वर राय अपने स्‍वर्गीय फूफाजी की सांस्‍कृतिक धरोहर संजोए हुए हैं। श्री रामेश्‍वर राय के अनुज श्री आनन्‍द राय इंदीवर का नाम आगे बढ़ाते हुए मुम्‍बई में रहकर गानों के एलबम, सीरियल व फिल्‍म निर्माण के कार्य में पूरे मनोयोग से लगे हुए हैं जिनसे बहुत सी उम्‍मीदें बधीं हुई हैं। कवि डॉ. ओमप्रकाश दीक्षित ‘पागल' ने पूछने पर बताया कि इंदीवर के जन्‍मस्‍थान वाला भवन वर्तमान में श्री ओमप्रकाश रिछारिया के स्‍वामित्‍व में है।

स्‍थानीय प्रशासन व सरकार को चाहिए कि वह स्‍वर्गीय गीतकार इंदीवर के नाम से उनके जन्‍मस्‍थान बरूवासागर में एक पुस्‍तकालय की स्‍थापना करे, प्रमुख मार्ग का नाम उनके नाम से रखा जाए, नगर के प्रमुख चौराहे पर उनकी एक भव्‍य मूर्ति की स्‍थापना की जाए, बल्‍कि बरूवासागर में स्‍थित अंग्रेजी दासता के प्रतीक कम्‍पनी बाग का नाम बदलकर गीतकार इंदीवर के नाम से ‘स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी इंदीवर बाग' रखा जाना चाहिए।

इंदीवर  26 फरवरी, 1997 को अपने पैतृक नगर बरूवा सागर में होने वाले एक सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में सम्‍मिलित होने मुम्‍बई से आ रहे थे तभी रास्‍ते में उन्‍हें हृदयाघात पड़ा और वह वापस मुम्‍बई लौट गये। लगभग चार दशक तक अपने गीतों से हम लोगों को भावविभोर करने वाले इंदीवर 28 फरवरी 1997 को सदा के लिए अलविदा कह गए।

---

डी - 5 बटलर पैलेस ऑफीसर्स कॉलोनी लखनऊ-1 4

व्यंग्य

शहर में भैंस

डॉ.आर.वी.सिंह

भैंस और शहर का रिश्ता बहुत पुराना है। इधर पश्चिमी तर्ज़ के पब्लिक स्कूलों में पढ़े-लिखे नौकरशाहों को यह ऐतिहासिक तथ्य कभी-कभी विस्मृत हो जाता है, तो वे अपनी झख में आदेश जारी कर देते हैं कि इन भैंसों को शहर से निकाल बाहर करो। लेकिन शुक्र है कि अपने नेताओं को भैंस से बड़ा प्यार है। उनमें से अधिकतर का डील-डौल भी भैंसों जैसा ही होता है और वे जानते हैं कि शहर और भैंस का नाता बहुत गहरा है। इसलिए शहर में अब भी भैंसें कायम हैं, पूरी शान-ओ-शौकत के साथ।

हिन्दी में कहावत मशहूर है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। अब आप सोचिए कि यदि शहर में भैंस न हो तो दबंग लोग अपनी लाठी का इस्तेमाल कहाँ और किस पर करेंगे? जिसके पास लाठी हो, उसके आस-पास हाँकने के लिए भैंस तो होनी ही चाहिए। यदि मौके पर भैंस नहीं मिली और लाठी वाले के मन में हाँकने का विचार आ गया तो भले आदमियों की तो शामत ही समझिए। इसलिए बेहतर है कि जब तक लाठी कायम है तब तक भैंस को भी कायम रहने दें। इधर सुनने में आता है कि अमुक-अमुक जगह पर पुलिस वालों ने लोगों की भीड़ पर लाठियाँ बरसाईं। यही तो परेशानी है कि शहर में सही मौके पर भैंसें नहीं उपलब्ध होती हैं तो पुलिस वाले आम जनता को ही भैंस की तरह धुनने लगते हैं। इसका एक ही उपाय है कि पुलिस थानों के बगल में भैंसों की खटाल बनाई जाएँ और जब-जब पुलिस वालों को डंडा भांजने का मन करे वे भैंसों पर अपनी भड़ास निकाल लिया करें।

वैसे बताते चलें कि अपने अधिसंख्य पुलिस सिपाही जब भर्ती होते हैं तो छैल-छबीले, बांके जवान होते हैं। लेकिन धीरे-धीरे इतनी चर्बी चढ़ा लेते हैं कि मोटापे में उनकी प्रतिस्पर्धा केवल भैंस से ही हो सकती है। अभी हाल में उत्तर प्रदेश में सिपाहियों की दीवान के रूप में पदोन्नति के लिए शर्त रखी गई- जो सिपाही नब्बे मिनट में दस किलोमीटर की दौड़ पूरी करेगा, उसी को पदोन्नति मिलेगी। सच कहें तो नब्बे मिनट में दस किलोमीटर का फासला तय करने के लिए दौड़ने की जरूरत ही नहीं है। कुछ तेज कदम बढ़ाकर चलने से भी यह काम पूरा हो जाएगा। और मोटी से मोटी भैंस भी इसे अंजाम दे सकती है। लेकिन जिन पुलिस वालों का काम ही अपराधियों के पीछे दौड़ना है, वे यह शर्त पूरी नहीं कर पाए। दो लोग तो इस कोशिश में जान से ही हाथ गंवा बैठे। अपने यमराज भी भैंसे की सवारी करते हैं। अब आप सोचें कि मिथकीय दृष्टि से भी भैंस का कितना महत्त्व है। लिहाजा भैंस की स्पृहणीयता में कोई कमी नहीं है।

अब दिक्कत यह है कि भैंस जैसे भारी-भरकम जानवर को रखा कहाँ जाए। शहरों में आदमियों के रहने के लिए ही जगह कम पड़ने लगी है। नगरों के विकास प्राधिकरण और निजी बिल्डर, दोनों अब प्लॉट और स्वतंत्र मकान बेचने के बजाय फ्लैट बनाकर बेचने में अधिक रुचि लेने लगे हैं। ऐसे में हम अपनी भैंस को कहाँ रखेंगे? उसे लिफ्ट में घुसा नहीं सकते, और सीढियों के रास्ते ऊपर ले जा नहीं सकते। मान लें कि किसी तरह पार्किंग लॉट में या सीढ़ी के नीचे या गली में भैंस को रख भी लिया तो उसे क्या खिलाएँगे? क्या पिलाएँगे? और कैसे नहलाएँगे?

भैंस पिजा-बर्गर तो खाती नहीं। चाउमिन और मंचूरियन से भी उसका पेट नहीं भरने वाला। पानी हम लोग खुद बोतल वाला पीते हैं। भैंस के लिए कहाँ से लाएंगे? यही हालत नहाने की है। अपने नहाने के लिए पानी ही नहीं मिलता। तो भैंसिया को कौन से तालाब में ले जाएंगे नहलाने?

इस सब असुविधा के बावजूद शहर में भैंस का होना बहुत जरूरी है। अपने देश में और सारी बातों पर बहुत बल दिया जा रहा है। बस पढ़ाई-लिखाई वाला विभाग थोड़ा पिछड़ गया है। स्कूल और शिक्षक तो बहुत हो गए हैं। सरकारी स्कूल भी खूब बन गए हैं। और उनको बनाने की प्रक्रिया में बहुत से लोग खुद बन गए। लेकिन इन दो कमरे की इमारतों में पढ़ाई के अलावा और सब कुछ होता है। पुरुषार्थी गुरुजी लोगों की मेहरबानी से अब भी अपने देश में लगभग पैंतीस से चालीस प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। ऐसे लोगों के लिए मुहावरा प्रचलित है- काला अक्षर भैंस बराबर। अब आप सोचें कि यदि भैंस ही न रही तो काला अक्षर किसके बराबर होगा? एक मुहावरा यों ही डिक्शनरी से बाहर हो जाए, यह भला कौन चाहेगा? निरक्षरता तो मानवता का श्रृंगार है। निरक्षर लोग हमारे समाज की शान हैं। निरक्षर हैं तो भैंस की कमी होकर भी महसूस नहीं होती। दोनों को गाहे ब गाहे हाँककर डंडा रखने का शौक पूरा किया जा सकता है। इसलिए निरक्षरों और भैंसों, दोनों को समाज में ज्यादा से ज्यादा संख्या में बनाए रखना बेहद जरूरी है। अनपढ़ आदमी भैंस चराता है और भैंस अनपढ़ आदमी की पूँजी है। दोनों में अन्योन्याश्रय संबंध है। और इसी आधार पर अनपढ़ आदमी की जिससे उपमा दी जाती है, उस भैंस का समाज, गाँव और शहर में रहना भी बेहद जरूरी है। इति सिद्धम।

हिन्दी में एक मुहावरा और है- भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी पगुराए। अब बताइए यदि भैंस न रही तो किसके आगे बीन बजाइएगा? और पगुराने की प्रक्रिया को समझाने के लिए क्या उदाहरण दीजिएगा? हालांकि अपने हिन्दुस्तान में कोई-कोई आदमी भी निरन्तर पान मसाला, तंबाकू आदि का चर्वण ऐसे ही करते रहते हैं, जैसे पगुरा रहे हों। लेकिन भैंस के पगुराने में और इनके पगुराने में अंतर है। भैंस पगुराती है अपने खाए हुए चारे को और बारीक पीसने तथा वापस उसे पेट में पहुँचाने के लिए। इन्सान पगुराता है, इधर उधर गंदगी फैलाने और न पगुराने वाले इन्सानों को वमन कराकर उनके पेट का चारा बाहर निकलवाने के लिए। लिहाजा पगुराने के मामले में इन्सान भैंस से दो कदम आगे, और डार्विन चचा के शब्दों में उच्चतर ऑर्डर की प्रजाति है।

चारा, भैंस और मुष्य- ये एक ही पारितंत्र के तीन महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं। यदि भैंस है तो उसका एक मंत्रालय और एक अदद विभाग है। उसके लिए पशु-चारा है। चारा खरीदने की परिकल्पना है, प्रावधान है। सरकारी निधि है। यह बिल्कुल ऐसे ही है, जैसे बच्चे हैं तो कुपोषण है, पुष्टाहार योजना है, सरकारी बजट है। और जहाँ सरकारी निधि या बजट है, वहाँ घोटाला है। घोटाला अपने देश में वैसे ही सर्वव्यापी है जैसे भगवान। यदि गीता आज के युग में लिखी गई होती तो कृष्ण भगवान अर्जुन से कहते कि हे पार्थ जैसे घोटाला भारत में यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है, वैसे ही मैं भी सर्वत्र व्याप्त हूँ। चूंकि भैंस की खुराक अधिक होती है, इसलिए उसके चारे की मात्रा भी अधिक और चारे से जुड़ा घोटाला भी उसी के आनुपातिक आधार पर बड़ा ही होगा। खाना ही है तो बड़ा खाओ। थिंक बिग। बड़ी सोच का बड़ा जादू। इसलिए शहर में यदि बड़ी सोच का चलता-फिरता कोई प्रतिमान है तो वह भैंस ही है। यदि शहर से भैंस को रुख्सत कर दिया जाए तो बड़े सोच के लिए हम किसका उदाहरण देंगे?

कुछ जो बेहद पिछड़े और गँवार टाइप के लोग हैं, उनके तईं भैंस दूध देनेवाला प्राणी है। बस दूध के लालच में वे सोचते हैं कि भैंस का शहर में होना जरूरी है। भैंस को शहर में रहना ही चाहिए, ऐसा तो हम भी मानते हैं। लेकिन सिर्फ दूध के वास्ते रहना चाहिए, ऐसा सोचने वालों से अपना मत-वैभिन्न्य है। शहर के बच्चों ने दूध पीना अब लगभग छोड़ दिया है। ज्यादातर बच्चे दूध नहीं, बल्कि तरह-तरह के दूसरे पौष्टिक पेय पीते हैं, जिससे उनके शरीर और मस्तिष्क, दोनों का बहुत तेज गति से विकास होता है। कम से कम टेलीविजन पर प्रसारित विज्ञापनों का तो यही दावा है। इसलिए दूध के लिए भैंस रखना कोई समझदारी का काम नहीं है। और सच पूछें तो भैंस पाले बिना यदि दूध मयस्सर हो जाए तो यह जहमत कोई क्यों मोल ले?

हाँ दूध के अलावा और सभी वजूहात से भैंस को शहर में होना ही चाहिए। भैंसें शहर की सड़कों पर वाहन चालकों से प्रतिस्पर्धा करती हैं। इससे लोगों में स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना का विकास होता है। भैंसों के गोबर से शहर की सड़कें बिलकुल द्वापर-कालीन कुंज गलियाँ लगती हैं। भैंसें हमें हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती हैं। अमूमन भैंसों का डील-डौल अच्छा होता है। इसलिए खा-खाकर बेडौल हो चले शहराती अपने माहौल में जब भैंसों को देखते हैं तो उनको अपने मुटापे पर आत्म-ग्लानि नहीं होती। बल्कि तसल्ली होती है कि चलो कम से कम अभी हम भैंस से तो दुबले हैं। इधर सुनने में आ रहा है कि मानव मस्तिष्क पहले के बनिस्बत लगभग दस प्रतिशत सिकुड़ गया है। किन्तु इसमें घबराने की कोई बात नहीं है। भैंस के रहते हमें अपनी अक्ल के छोटा होने की चिंता नहीं है, क्योंकि हिन्दी में प्रश्नसूचक एक मुहावरा है- अक्ल बड़ी या भैंस। यानी अक्ल भैंस से हमेशा बड़ी ही होती है। अब सोचिए.. यदि शहर से भैंस लुप्त हो गई तो हमारी अक्ल कितनी बड़ी है, इसका पैमाना खोजने किस संग्रहालय में जाएँगे?

---0--

आर.वी.सिंह/R.V. Singh
उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in
----

महाप्राण निराला की जयन्ती पर  विशेष

जहाँ किसी को पीड़ित देखा हाथो-हाथ लिया

दीन,दुखी,बुढ़िया, भिखमंगा सबका साथ किया

 

'प्रभापूर्य, शीतलच्छाय, सांस्कृतिक सूर्य' बन

अंधकार का कठिन प्रश्न ही पहले सरल

 

रुद्र रूप था भले, किन्तु वह शांत मनस्वी-

महावीर-सा अपना सब कुछ जग के लिए दिया

 

जो कुछ बोला, लिखा सभी कुछ जग पीड़ा थी

जग के खातिर मरा और वह जग के लिए जिया

 

रहे न कोई दुखी जगत में इसीलिए,बस-

बचा हुआ था शिव से जो,वह सारा गरल पिया

 

सुख अपना औरों को बाँटा बिन माँगे ही

जहाँ मिला दुख का सौदागर अपने लिए लिया

 

'नव नभ के नव विहग वृंद' सब मौन हो गए

असमय पतझर ने वसन्त का सौरभ छीन लिया

 

---

 

डकैत है दिल्ली

खिलन्दड़ी टिकैतों का खेत है दिल्ली

प्यासे मृग भटक रहे, रेत है दिल्ली

 

आग, धुँआ, गोले, कट्टे छुरी और बम

हाथो में थामे हुए डकैत है दिल्ली

 

राजनय, राजधानी, संसद की बोली में

हर दम सिपहसालार-सी मुस्तैद है दिल्ली

 

आयकर, बिक्री कर, और भी अनेक कर

करों की कारा में हुई कैद है दिल्ली

 

जाति, धर्म, क्षेत्रवाद कोई भी असाध्य रोग

किसिम-किसिम रोगों की बैद है दिल्ली

                            ------

 

---

चलो चलें हम पेंच लड़ाने

जर्सी पहन के सर्दी रानी

सूरज दादा के घर आईं ।

वह भी ओढ़े ठिठुर रहे थे

कोहरे वाली झक्क दुलाई।

 

बोली सर्दी सूरज से तब

हमसे तुम लगते घबराए।

चलो चलें हम अंतरिक्ष में

खूब मजे से पेंच लड़ाएँ।

 

उत्तरायण में बड़ी शान से

बगुले जैसा ध्यान लगाए।

बैठे हो तुम बड़ी देर से

किस मछली पर घात लगाए।

 

सूरज दादा चुपके-चुपके

चुटकी ले धीरे मुस्काए।

कौन मूर्ख है जो सर्दी में

छोड़ दुलाई बाहर आए।

 

सर्दी रानी तभी बिदक कर

लगीं  जोर से पंख डुलाने।

बोले डर कर सूरज दादा

चलो चलें हम पेंच लड़ाने।

 

पर इसका भी ध्यान है रखना

कहीं पेंच से तुम ना कटना।

कहीं कटें ना गले किसी के

और किसी के पाँव  फँसें ना।

 

बिना सुने कुछ सर्दी रानी

लगीं लूटने कटी पतंगें।

फँसा पाँव तो गिरीं धम्म से

दोनों घुटने-टखने फ़ूटे।

 

इसी बात से भरे क्रोध में

लगीं कोसने सर्दी रानी।

टीस भरे शब्दों में चीखीं

सुन लो, गुन लो मेरी कहानी।

 

खूनी हुई पतंगें सारी

धागे सबके सब हत्यारे।

नहीं किसी से इन्हें मुहब्बत

काँच भरे हैं दिल में सारे।

 

इन छलियों के प्रेम में  फँस कर

पागल हो-हो कर  बेचारी।

नाची-नाची घूम रही हैं

आसमान में मारी-मारी।

 

अब तो दादा हमें बचा लो

कटी पतंगें सभी उठा लो।

अब ना तुमको कभी सताऊँ

एक बार बस मुझे बचा लो।

----

कविता की कल-कल रागिनी


-----------------------------------

जब किसी निर्झर की कल-कल रागिनी

या सागर की हलचल

शब्दों में साकार हो

स्वर पाती है

कविता हो जाती है।

जब किसी भगीरथ के श्रम से

पहाड़ों से उतर कोई गंगा

प्यासे अधरों को सींचती है

फ़सलों में लहलहाती है

कविता हो जाती है

जब किसी क्रौंची की कराह

किसी कवि की साँसों में समा 'अनुष्टुप' बन जाती है

और 'अंतरंग प्रिया’ के लिए आकुल हो उठता है कवि मन

अथवा अनावश्यक ही कोई शकुंतला या यक्षिणी

हो जाती है अभिशाप का शिकार

या जब किसी शकुंतला की अँगूठी

कोई मछली निगल जाती है

और,नटता है दुश्यंत

या फिर मथुरा में बैठ

निर्दय योगी

उध्दव से भिजवाता है

संदेश, कोई नटवर नागर कान्हा

तो, कविता हो जाती है

कविता सुकाल में भी होती है

और, अकाल में भी

कविता होती रही है 'अकाल के बाद' भी

छाती पर हिमखंड धरे बैठे बाल्मीकियों से

वैसे सच कहें तो,

कविता को रच ही नहीं सका है कोई

उलटे कविता ही रचती रही है

रूप और आकार देती रही है उन्हें

एक सृजनधर्मी अजन्मा माँ की तरह

कविता कभी करती है शांति का आह्वान

कभी विद्रोह का बिगुल बजाती है

कविता सायास बौध्दिक क्रीड़ा नहीं

यह अनायस आकुल मन की सहज अभिव्यक्ति है

यह कभी 'दिनकर' की उर्वशी

कभी भारती की 'कनुप्रिया'

कभी प्रसाद के 'आँसू' में ढल जाती है

तो कभी 'नीर भरी दु:ख की बदली' बन

'कितनी नावों में कितनी बार' बैठ

'अँधेरे में' करुणा का सागर तिर जाती है,

इस तरह जब भी कुलबुलाती है,

सृजन की कोई पीड़ा और बाहर आती है

कभी-कभी कुछ शेष भी रह जाती है

कविता हो जाती है।

--

गुरुदेव को नमन

image

हे श्रद्धेय गुरुदेव ए स्‍वीकारो हम सब का शत शत नमन।

हे भारत गौरव देशाभिमानी रचा आपने भारत का राष्ट्रगान।

हर भारतवासी को है जिस पर अति अभिमान।

भारत भू के इस यशोगान का करते सब सम्‍मान।

हुई दूर तिमिर छाया पसरा उज्‍जवल आलोकित ज्ञान।

देश देशांतर तक हुआ विस्‍तारित आपका गान।

मिला आपसे ही विश्‍व को गीतांजली सा दिव्‍य उपहार।

मां भारती हुई अति पुलकित सपूत आप सा पाकर।

जननी को देखा आपने माता में जन्‍म भूमि में

ए उससे भी व्‍यापक बनकर देखा समग्र विश्‍व में।

दे गये आप हमें जो साहित्‍य संपदा अनमोल।

कभी न होंगे विस्‍मृत वे शब्‍दरत्‍न अनमोल।

किया बंधन-मुक्‍त शिक्षा को आपने विद्यालय की चारदीवारी से।

शांतिनिकेतन से पाई हमने नई परिभाषा विद्यालय की आपसे।

मन पर अंकित है छवि अब भी

ए चुलबुली मिनी व बातूनी काबुलीवाले की।

दिल को छू लेने वाली छाप उन नन्‍हीं अंगुलियों की।

जिसे देखकर करता काबुली याद अपनी बिटिया की।

मिनी में काबुली देखता छवि अपनी प्‍यारी सी बेटी की।

शांतिनिकेतन की रचना कर किया अपना स्‍वपन साकार।

हुई अनेक प्रतिभायें विकसित प्रेरणा आपसे पाकर।

मिले देश को जिससे विविध प्रतिभा-संपन्‍न व्‍यक्‍तित्‍व।

निखर निखर कर फैले जग भर ये प्रखर व्‍यक्‍तित्‍व।

इच्‍छा प्रबल है देख पाउं मैं उन स्‍थानों को जी भर।

अनुभूति पाउं वहां व्‍याप्‍त आपके अस्‍तित्‍व की जी भरकर।

गर्व करेगा सदा भारत देश हे गुरुदेव आप पर।

नोबल पुरस्‍कार सम्‍मानित हुआ आप-सा विजेता पाकर।

 

यह एक दुखद समाचार है कि अंग्रेजी वर्चस्‍व के चलते भारत समेत दुनिया की अनेक मातृभाषाएं अस्‍तित्‍व के संकट से जूझ रही हैं। भारत की स्‍थिति बेहद चिंताजनक है क्‍योंकि यहां कि 196 भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं। भारत के बाद अमेरिका की स्‍थिति चिंताजनक है, जहां की 192 भाषाएं दम तोड़ रही हैं। दुनियां में कुल 6900 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से 2500 भाषाएं विलुप्‍ति के कगार पर हैं अंतरराष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर भाषाओं की विश्‍व इकाई द्वारा दी गई जानकारी में बताया गया है कि बेलगाम अंग्रेजी इसी तरह से पैर पसारती रही तो एक दशक के भीतर करीब ढाई हजार भाषाएं पूरी तरह समाप्‍त हो जाएंगी। भारत और अमेरिका के बाद इंडोनेशिया की 147 भाषाओं को जानने वाले खत्‍म हो जाएंगे। दुनिया भर में 199 भाषाएं ऐसी हैं जिनके बोलने वालों की संख्‍या एक दर्जन लोगों से भी कम है। ऐसी भाषाओं में कैरेम भी एक ऐसी भाषा है जिसे उक्रेन में मात्र छह लोग बोलते हैं। इसी तरह ओकलाहामा में विचिता भी एक ऐसी भाषा है जिसे देश में मात्र दस लोग बोल पाते हैं। इंडोनेशिया की लेंगिलू बोलने वाले केवल चार लोग बचे हैं। 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्‍हें बोलने वाले लोगों की संख्‍या 150 लोगों से भी कम है। भाषाओं को संरक्षण देने की दृष्‍टि से ही 190 के दशक में 21 फरवरी को हर साल अंतरराष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की गई थी, लेकिन दो दशक बीत जाने के भाषाओं के बचाने के कोई सार्थक उपाय सामने नहीं आ पाए, जबकि अंग्रेजी का मुख विश्‍वग्राम के बहाने सुरसामुख की तरह फैलता ही जा रहा है।

कोई भी भाषा जब मातृभाषा नहीं रह जाती है तो उसके प्रयोग की अनिवार्यता में कमी और उससे मिलने वाले रोजगारमूलक कार्यों में भी कमी आने लगती है। जिस अत्‍याधुनिक पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता पर गौरवान्‍वित होते हुए हम व्‍यावसायिक शिक्षा और प्रौद्योगिक विकास के बहाने अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ाते जा रहे हैं, दरअसल यह छद्‌म भाषाई अहंकार है। क्षेत्रीय भाषाएं और बोलियां हमारी ऐतिहासिक सांस्‍कृतिक धरोहरें हैं। इन्‍हें मुख्‍यधारा में लाने के बहाने, इन्‍हें हम तिल-तिल मारने का काम कर रहे हैं। कोई भी भाषा कितने ही छोटे क्षेत्र में, भले कम से कम लोगों द्वारा बोली जाने के बावजूद उसमें पारंपरिक ज्ञान के असीम खजाने की उम्‍मीद रहती है। ऐसी भाषाओं का उपयोग जब मातृभाषा के रुप में नहीं रह जाता है तो वे विलुप्‍त होने लगती हैं। सन्‌ 2100 तक धरती पर बोली जाने वाली ऐसी सात हजार से भी ज्‍यादा भाषाएं हैं जो विलुप्‍त हो सकती हैं।

जर्मन विद्वान मैक्‍समूलर ने अपने शोध से भारत के भाषा और संस्‍कृति संबंधी तथ्‍यों से जिस तरह समाज को परिचित कराया था, उसी तर्ज पर अब नए सिरे से गंभीर प्रयास किए जाने की जरुरत है, क्‍योंकि हर पखवाड़े भारत समेत दुनिया में एक भाषा मर रही है। इस दायरे में आने वाली खासतौर से आदिवासी व अन्‍य जनजातीय भाषाएं हैं, जो लगातार उपेक्षा का शिकार होने के कारण विलुप्‍त हो रही हैं। ये भाषाएं बहुत उन्‍नत हैं और ये पारंपरिक ज्ञान की कोष हैं। भारत में ऐसे हालात सामने भी आने लगे हैं कि किसी एक इंसान की मौत के साथ उसकी भाषा का भी अंतिम संस्‍कार हो जाए। स्‍वाधीनता दिवस 26 जनवरी 2010 के दिन अंडमान द्वीप समूह की 85 वर्षीया बोआ के निधन के साथ एक ग्रेट अंडमानी भाषा ‘बो' भी हमेशा के लिए विलुप्‍त हो गई। इस भाषा को जानने, बोलने और लिखने वाली वे अंतिम इंसान थीं। इसके पूर्व नवंबर 2009 में एक और महिला बोरो की मौत के साथ ‘खोरा' भाषा का अस्‍तित्‍व समाप्‍त हो गया। किसी भी भाषा की मौत सिर्फ एक भाषा की ही मौत नहीं होती, बल्‍कि उसके साथ ही उस भाषा का ज्ञान भण्‍डार, इतिहास,संस्‍कृति,उस क्षेत्र का भूगोल एवं उससे जुड़े तमाम तथ्‍य और मनुष्‍य भी इतिहास का हिस्‍सा बन जाते हैं। इन भाषाओं और इन लोगों का वजूद खत्‍म होने का प्रमुख कारण इन्‍हें जबरन मुख्‍यधारा से जोड़ने का छलावा है। ऐसे हालातों के चलते ही अनेक आदिम भाषाएं विलुप्‍ति के कगार पर हैं।

अंडमान-निकोबार द्वीप की भाषाओं पर अनुसंधान करने वाली जवाहरलाल नेहरु विश्‍वविद्यालय की प्राध्‍यापक अन्‍विता अब्‍बी का मानना है कि अंडमान के आदिवासियों को मुख्‍यधारा में लाने के जो प्रयास किए गए हैं उनके दुष्‍प्रभाव से अंडमान द्वीप क्षेत्र में 10 भाषाएं प्रचलन में थीं, लेकिन धीरे-धीरे ये सिमट कर ‘ग्रेट अंडमानी भाषा' बन गईं। यह चार भाषाओं के समूह के समन्‍वय से बनीं।

भारत सरकार ने उन भाषाओं के आंकड़ों का संग्रह किया है, जिन्‍हें 10 हजार से अधिक संख्‍या में लोग बोलते हैं। 2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार ऐसी 122 भाषाएं और 234 मातृभाषाएं हैं। भाषा-गणना की ऐसी बाध्‍यकारी शर्त के चलते जिन भाषा व बोलियों को बोलने वाले लोगों की संख्‍या 10 हजार से कम है उन्‍हें गिनती में शामिल ही नहीं किया गया।

यहां चिंता का विषय यह भी है कि ऐसे क्‍या कारण और परिस्‍थितियां रहीं की ‘बो' और 'खोरा' भाषाओं की जानकार दो महिलाएं ही बची रह पाईं। ये अपनी पीढ़ियों को उत्तराधिकार में अपनी मातृभाषाएं क्‍यों नहीं दे पाईं। दरअसल इन प्रजातियों की यही दो महिलाएं अंतिम वारिस थीं। अंग्रेजों ने जब भारत में फिरंगी हुकूमत कायम की तो उसका विस्‍तार अंडमान-निकोबार द्वीप समूहों तक भी किया। अंग्रेजों की दखल और आधुनिक विकास की अवधारणा के चलते इन प्रजातियों को भी जबरन मुख्‍यधारा में लाए जाने के प्रयास का सिलसिला शुरु किया गया। इस समय तक इन समुद्री द्वीपों में करीब 10 जनजातियों के पांच हजार से भी ज्‍यादा लोग प्रकृति की गोद में नैसर्गिक जीवन व्‍यतीत कर रहे थे। बाहरी लोगों का जब क्षेत्र में आने का सिलसिला निरंतर रहा तो ये आदिवासी विभिन्‍न जानलेवा बीमारियों की गिरफ्‍त में आने लगे। नतीजतन गिनती के केवल 52 लोग जीवित बच पाए। ये लोग ‘जेरु' तथा अन्‍य भाषाएं बोलते थे। बोआ ऐसी स्‍त्री थी जो अपनी मातृभाषा ‘बो' के साथ मामूली अंडमानी हिन्‍दी भी बोल लेती थी। लेकिन अपनी भाषा बोल लेने वाला कोई संगी-साथी न होने के कारण ताजिंदगी उसने ‘गूंगी' बने रहने का अभिशाप झेला। भाषा व मानव विज्ञानी ऐसा मानते हैं कि ये लोग 65 हजार साल पहले सुदूर अफ्रीका से चलकर अंडमान में बसे थे। ईसाई मिशनरियों द्वारा इन्‍हें जबरन ईसाई बनाए जाने की कोशिशों और अंग्रेजी सीख लेने के दबाव भी इनकी घटती आबादी के कारण बने।

‘नेशनल ज्‍योग्राफिक सोसायटी एंड लिविंग टंग्‍स इंस्‍टीट्‌यूट फॉर एंडेंजर्ड लैंग्‍वेजेज' के अनुसार हरेक पखवाड़े एक भाषा की मौत हो रही है। सन्‌ 2100 तक भू-मण्‍डल में बोली जाने वाली सात हजार से भी अधिक भाषाओं का लोप हो सकता है। इनमें से पूरी दुनिया में सात्‍ताईस सौ भाषाएं संकटग्रस्‍त हैं। इन भाषाओं में असम की 17 भाषाएं शामिल हैं। यूनेस्‍कों द्वारा जारी एक जानकारी के मुताबिक असम की देवरी,मिसिंग,कछारी,बेइटे,तिवा और कोच राजवंशी सबसे संकटग्रस्‍त भाषाएं हैं। इन भाषा-बोलियों का प्रचलन लगातार कम हो रहा है। नई पीढ़ी के सरोकार असमिया, हिन्‍दी और अंग्रेजी तक सिमट गए हैं। इसके बावजूद 28 हजार लोग देवरी भाषी, मिसिंगभाषी साढ़े पांच लाख और बेइटे भाषी करीब 19 हजार लोग अभी भी हैं। इनके अलावा असम की बोडो, कार्बो, डिमासा, विष्‍णुप्रिया, मणिपुरी और काकबरक भाषाओं के जानकार भी लगातार सिमटते जा रहे हैं। घरों में ,बाजार में व रोजगार में इन भाषाओं का प्रचलन कम होते जाने के कारण नई पीढ़ी इन भाषाओं को सीख-पढ़ नहीं रही है। दरअसल जिस भाषा का प्रयोग लोग मातृभाषा के रुप में करना बंद कर देते हैं, वह भाषा धीरे-धीरे विलुप्‍ति के निकट आने लगती है।

भारत की तमाम स्‍थानीय भाषाएं व बोलियां अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण संकटग्रस्‍त हैं। व्‍यावसायिक, प्रशासनिक, चिकित्‍सा, अभियांत्रिकी व प्रौद्योगिकी की आधिकारिक भाषा बन जाने के कारण अंग्रेजी रोजगारमूलक शिक्षा का प्रमुख आधार बना दी गई है। इन कारणों से उत्‍तरोत्‍तर नई पीढ़ी मातृभाषा के मोह से मुक्‍त होकर अंग्रेजी अपनाने को विवश है। प्रतिस्‍पर्धा के दौर में मातृभाषा को लेकर युवाओं में हीन भावना भी पनप रही हैं। इसलिए जब तक भाषा संबंधी नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन नहीं होता तब तक भाषाओं की विलुप्‍ति पर अंकुश लगाना मुश्‍किल है। भाषाओं को बचाने के लिए समय की मांग है कि क्षेत्र विशेषों में स्‍थानीय भाषा के जानकारों को ही निगमों, निकायों, पंचायतों, बैंकों और अन्‍य सरकारी दफ्तरों में रोजगार दिए जाएं। इससे अंग्रेजी के फैलते वर्चस्‍व को चुनौती मिलेगी और ये लोग अपनी भाषाओं व बोलियों का संरक्षण तो करेंगे ही उन्‍हें रोजगार का आधार बनाकर गरिमा भी प्रदान करेंगे। ऐसी सकारात्‍मक नीतियों से ही युवा पीढ़ी मातृभाषा के प्रति अनायास पनपने वाली हीन भावना से भी मुक्‍त होगी। अपनी सांस्‍कृतिक धरोहरों और स्‍थानीय ज्ञान-परंपराओं को अक्षुण्‍ण बनाए रखने के लिए जरुरी है हम भाषाओं और उनके जानकारों की वंश परंपरा को भी अक्षुण्‍ण बनाए रखने की चिंता करें।

---

pramodsvp997@rediffmail.com 

 pramod.bhargava15@gmail.com

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

हे विकासशील देश के पिछड़े नागरिकों ! सामान खरीदो और खाओ। खाओ पिओ और ऐश करो बाजारवाद का घोड़ा अश्‍वमेघ यज्ञ की तरह दौड़ रहा है। घोड़े की सवारी करना आसान काम नहीं है। अच्‍छे अच्‍छे सूरमा भोपाली धूल चाटते नजर आते है। सर्वत्र बाजारवाद हावी है। बाजार ने सब कुछ बिकाउ माल कर दिया है। आप खरीदे या नहीं बाजार आप के घर में घुस गया है। बाजारवाद रेडियो, टी․वी․ अखबार, इन्‍टरनेट सभी के सहारे आपके जीवन में जहर घोल रहा है।

आप माचिस खरीदने जाते है तो सिगरेट या बीयर आपके गले पड़ जाती है। बाजार पर हावी है बाजार के माफिया, बिक्री माफिया, परचेज माफिया, भूमाफिया, शराब माफिया चमचे माफिया, दवा-माफिया, सरकारी माफिया, गैर सरकारी माफिया, यहाँ तक कि देह -व्‍यापार के माफिया लोगों ने पूरे बाजार को कब्‍जे में कर लिया है। वे सारे साधनों से आप पर हमला कर रहे हैं, आपको क्रेडिट कार्ड, डेबिटकार्ड, लोन, इएमआई के सपने दिखा रहे हैं। खरीदो आप पूरे बाजार को खरीदो। घर को गोदाम बना लो। शोप एलकोहोलिक बन जाओ। कुछ नहीं चाहिये मगर खरीदना पड़ेगा, बाजारवाद सबको खरीदने के लिए मजबूर कर देता है। बाजार ने हमारे मन छोटे कर दिये हैं। और बाजार बड़े है लेकिन दिल छोटे हैं मैं कहता हूं बाजार से गुजरा हूँ मगर खरीदार नहीं हूँ, मगर मेरी कोई नहीं सुनता। सब मुझे नोचने को तैयार खड़े हैं।

किसी भी माल, शोरुम, बड़े बाजार में चले जाईये, हर तरफ खरीदार और बेचने वाले माफिया आप के इर्द गिर्द मण्‍डराने लग जाते हैं नहीं खरीदना चाहते तो बाजार में क्‍या झक मार रहे हो। एक ने कहा, बाबूजी आपका समय गया अब जीवन पद्धति बदल गई है सब बाजारवाद के मारे हैं। अब तो बाजार ही सब कुछ है।

वास्‍तव में बाजारवाद हमारी संकीर्ण मनोवृत्‍ति को दर्शाता है। हर व्‍यक्‍ति स्‍वयं को बेचने के लिए बाजार की तलाश में बाजार में ही भटक रहा है। बेचो खुद को भी बेचो। बाजार साम्राज्‍य बनाते है और साम्राज्‍य बाजारों को ढूंढते रहते हैं। पूंजीवादी प्रजातंत्र की जरुरत है बाजारवाद। अपने व्‍यापार, उद्योग, फेक्‍टरियों, हथियारों को नियमित चलाये रखने तथा बेचने के लिए बाजार आवश्‍यक है। रोज सुबह उठ कर ये व्‍यापारी बाजार ढूंढने निकल पड़ते हैं। उन्‍हें पूरी दुनिया एक बाजार नजर आती है। वे हर किसी को हर कोई चीज बेचने की क्षमता रखते हैं।

बाजारवाद का आकाश अनन्‍त है,असीम है। जो यूरोप में नहीं बिका वो एशिया में बिक जायेगा। जो एशिया में भी नहीं बिका वो अफ्रीका में या लातिन अमरीका में बिक जायेगा। इस सदी का चरम और परम सत्‍य है बाजारवाद। उत्‍तर आधुनिक काल में सब कुछ बाजार है। साहित्‍य, कला, संस्‍कृति, प्‍यार, घृणा, युद्ध, शान्‍ति, देह, ईश्‍वर शैतान, देवी, देवता, भगवान, आत्‍मा शरीर, लोकसंस्‍कृति, भाषा, अक्षर, शब्‍द, नैतिकता, धर्म, अहिंसा, करुणा, गृहस्‍थ, वैराग्‍य, साधुत्‍व, सन्‍तत्‍व, सन्‍यासीत्‍व, स्‍त्रीत्‍व, सतीत्‍व सब बाजार है। सब बाजार के हवाले है, हम सब बाजार है यहाँ तक कि ये व्‍यंग्‍य भी बाजार की मांग के अनुरुप है। क्‍या ख्‍याल है आपका।

0 0 0

यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

रेल बजट आने वाला है अतः आज मैं भारतीय रेलों पर चिन्‍तन करुंगा। जैसा कि आप जानते हैं, चिन्‍तन हमारी राष्ट्रीय बीमारी है। जो कुछ नहीं कर सकता, वह बैठे-ठाले चिन्‍तन करता है। मैं भी आज अरबों रुपयों की लागत के इस विशाल धन्‍धे याने कि भारतीय रेलों पर चिन्‍तन करुंगा। रेल भवन में इन्‍जिन नहीं है, वह पटरी से उतर चुका है, लेकिन भारतीय रेलें हैं कि धकाधक चल रही हैं।

इधर हमारे रेल-विभाग ने कई बड़ी रेलगाड़ियाँ चलाई हैं, और इन गाडि़यों से भी तेज गति से भ्रष्टाचार की रेल चलाई है। रिजर्वेशन के नाम पर खुली लूट, भारतीय रेल-विभाग का एक अत्‍यन्‍त गौरवशाली कीर्तिमान है। जापान में यदि कोई रेल गाड़ी कुछ क्षण भी देर से पहुंचती है तो मुसाफिरों को पूरा पैसा वापस दिया जाता है, लेकिन हमारा रेल-विभाग इतना चुस्‍त-दुरुस्‍त है कि यहां आज तक कोई गाड़ी समय पर नहीं पहुंची।

इधर भारतीय रेलों का एक नया सुखद पक्ष उजागर हुआ है। यदि आप गरीब हैं तो रेलयात्रा करिए, आपको आत्‍महत्‍या की जरुरत नहीं रहेगी किसी न किसी दुर्घटना में आप तो शहीद हो जायेंगे और आपके घर वालों को दो-लाख रुपयों की आमदनी हो जायेगी। इसे कहते हैं रिन्‍द के रिन्‍द रहे, हाथ से जन्‍नत न गयी। इधर रेल सेवा का एक और पक्ष है, आप रेल गाड़ी की छत पर, ठण्‍डी हवा का आनन्‍द उठाते हुए भी यात्रा कर सकते हैं। अगर कभी कभार बिजली के तार के छू जाने से आप मर जाएं तो आपके घर वालों को भी कुछ मिल जायेगा।

वैसे भारतीय रेलें बड़ी नखरीली और नाजुक मिजाज होती हैं आंधी तूफान के हल्‍के थपेड़े से ही नदी-नालों आदि में गिर पड़ती हैं। वास्‍तव में बेचारी रेल का कोई कसूर नहीं, यह उमर ही ऐसी होती है।

हां, हमारे रेल मंत्री के इस बयान पर ध्‍यान दीजिए कि माल गाड़ियाँ चलाने में ज्‍यादा लाभ है। अरे भाई, जो सवारी गाड़ियाँ आप चला रहे हैं, वे किसी मालगाड़ी से कम है ? हर गाड़ी में क्षमता से दो चार गुनी ज्‍यादा सवारियां चढ़ती है। बहुत सारे भारतीय नागरिक बिना टिकट यात्रा करना अपना धर्म समझते है। रेलों में भिखारी, साधु सन्‍त सन्‍यासी, किन्‍नर भी निशुल्‍क यात्रा करते है। अब रेलों में भोजन पानी का लेन देन बन्‍द हो गया है और इसी कारण सामाजिक समरसता भी समाप्‍त हो गयी है।

तो हे जम्‍बू द्वीप के नागरिकों! उठो और रेल रुपी प्रेयसी का आलिंगन कर स्‍वर्गधाम की सैर करो। शुभास्‍ते येन पन्‍थानः सन्‍तु।

0 0 0

-यशवन्‍त कोठारी,

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

· 0

clip_image002

॥ नर के भेष में नारायण ॥

बात पर यकीन नही होता आज आदमी की

नींव डगमगाने लगती है घात को देखकर आदमी के ।

बातों में भले मिश्री घुली लगे तासीर विष लगती है

आदमी मतलब साधने के लिये सम्‍मोहन बोता है।

हार नही मानता मोहपाश छोड़ता रहता है,

तब-तक जब-तक मकसद जीत नही लेता है।

आदमी से कैसे बचे आदमी बो रहा स्‍वार्थ जो

सम्‍मोहित कर लहू तक पी लेता है वो ।

यकीन की नींव नही टिकती विश्‍वास तनिक जम गया

मानो कुछ गया या दिल पर बोझ रख निकाला गया ।

भ्रष्‍टाचार के तूफान में मुस्‍कान मीठे जहर सा

दर्द चुभता हरदम वेश्‍या के मुस्‍कान के दंश सा ।

मतलबी आदमी की तासीर चैन छीन लेती है

आदमी को आदमी से बेगाना बना देती है ।

कई बार दर्द पीये है पर आदमियत से नाता है

यही विश्‍वास अंध्‍ोरे में उजाला बोता है ।

धोखा देने वाला आदमी हो नही सकता है

दगाबाज आदमी के भेष में दैत्‍य बन जाता है ।

पहचान नहीं कर पाते ठगा जाते हैं,

ये दरिन्‍दे उजाले में अंधेरा बो जाते हैं ।

नेकी की राह चलने वाले अंधेरे में उजाला बोते हैं

सच लोग ऐसे नर के भेष में नारायण होते हैं ।

कविताएँ

॥ आशीश की थाती ॥

मां ने कहा था,बेटा मेहनत की कमाई खाना

काम को पूजा, फर्ज को धर्म,

श्रम को लाठी को समझना

यही लालसा है

धोखा-फरेब से दूर रहना ।

लालसा हो गयी पूरी मेरी

जय-जयकार होगी बेटा तेरी

चांद-सितारों को गुमान होगा तुम पर

वादा किया था पूरा करने की लालसा

चरणों में सिर रख दिया था

मां के हाथ उठ गये थे,

लक्ष्‍मी,दुर्गा और सरस्‍वती के ,

परताप एक साथ मिल गये थे ।

आशीश की थाती थामें

कूद पड़ा था जीवन संघर्ष में,

दगा दिया दबंगों ने

श्रम-कर्म-योग्‍यता को न मिला मान

गरजा अभिमान उम्‍मीदें कुचल गयीं

योग्‍यता को वक्‍त ने दिया सम्‍मान ।

मां का आशीश माथे,सम्‍भावना का साथ

हक हुआ लूट का शिकार पसीने की बूंद,

आंखों के झलके आंसू मोती बन गये

विरोध के स्‍वर मौन हो गये

मां की सीख बाप का अनुभव

पत्‍थर की छाती पर दूब उगा गये

उसूल रहा मुस्‍कराता

कैद तकदीर के दामन वक्‍त ने

सम्‍मान के मोती मढ़ दिये ।

हक-पद-दौलत आदमी के कैदी हो गये

जिन्‍दगी के हर मोड़ पर आंसू दिये

सम्‍भावना को ना कैद कर पाई कोई आंधी

बाप के अनुभव मां के आशीष की थी,

जिसके पास थाती ।

॥ आदमी अकेला है ॥

अपनी ही खुली आंखों के ख्‍वाब,डराने लगे हैं

अकेला है जहां में फुफकारने लगे है

फजीहत के दर्द पीये,जख्‍म से वजूद सींचे

भूख पसीने से धोये

सगे अपनों के लिये जीये हैं।

वक्‍त हंसता है,ख्‍वाब डराता है

कहता है जमाने की भीड़ में अकेला है

कैसे मान लूं ,हाड़ निचोड़ा किया-जीया

सगे अपनों के लिये, क्‍या वे अपने सच्‍चे नहीं ?

अपनों के सुख-दुख की चिन्‍ता में डूबा रहा

खुद के सपनों की ना थी फिकर

खुद की आंखों के सपने धूल गये

अपने सपने सगों में समा गये ।

सच है त्‍याग सगे अपनों के लिये

गैर-अपनों के लिये क्‍या किये

कर लो विचार मंथन वक्‍त है

सच कह रहा वक्‍त

आदमी अकेला है,दुनिया का साजो-श्रृंगार झमेला है।

सगे अपनों के लिये दगा-धोखा गैर के हक-लहू से किस्‍मत लिखना ठीक नहीं,

मेहनत-सच्‍चाई-ईमानदारी से

सगे अपनों की नसीब टांके चांद तारे

दुनिया का दस्‍तूर है प्‍यारे

गैरों की तनिक करे फिकर

दान-ज्ञान-सत्‍कर्म हमारे

वक्‍त के आर-पार साथ निभाते

जमाने की भीड़ में हर आदमी अकेला,

ध्‍यान रहे हमारे ।

 

-दौलत ।

मिठाई खाओ हरिबाबू..........

किस खुशी में रमाकान्‍त बाबू ।

एक और नये मकान का सौदा कर लिया ।

कितने घर बना लिये ? क्‍या करोगे इतने मकान और अथाह दौलत जोड़कर ।

जितनी जुड़ जाये कम है आजकल के जमाने मे हरिबाबू ।

कहां ले जाओगे । अरे ले जा भी तो नहीं सकते ।

क्‍या करूं हरिबाबू ?

दान-ज्ञान-सत्‍कर्म । ऐसी दौलत जन्‍म-जन्‍मान्‍तर साथ नहीं छोड़ते रमाकान्‍तबाबू ।

 

-दईजा ।

जमींदार के अहाते में शहनाई गूंज रही थी। दान-दईजा का दौर चल़ रहा था ।लोग आलीशान कुर्सियों पर विराजे कई तरह की मिठाइयाँ प्‍लेट भर-भर खा रहे थे। दईजा डालने के बाद पानी पीने का चलन जो था । राजू दईजा देकर जाने लगा । पीछे से कहारदादा बोले अरे राजू पानी पी कर तो जा। कहारदादा की आवाज छोटे जमींदार रतिन्‍द्र के कानों तक पहुंच गयी वह पूछे कौन राजू है कहार........

सुर्तीलाल का बेटवा और कौन राजू ।

मजदूर सुर्तीलाल के बेटवा को जमींदारी शानो-शौकत । अरे हाथ पर एक मिठाई रखकर भगा देते।

राजू दोनों हाथ पीछे करके कहारदादा से बोला दादा प्‍यास नहीं लगी है और एक झटके मे नौ -दो ग्‍यारह हो गया।

गेट से बंधा कुत्‍ता ।

साहेब ये मालिक थे क्‍या ?

किसके मालिक ?

कम्‍पनी के ।

नही आठवीं पास बिगड़ा हुआ ड्राइवर है ।

आफिस स्‍टाफ से तू-तू कर भौंक रहा था तो मुझे लगा भौंकने वाला व्‍यक्‍ति मालिक है ।

गाड़ी बन्‍द है । काम कोई है नहीं । उच्‍च प‍ढ़े-लिखे स्‍टाफ से होड़, बदतमीजी और इनकी-उनकी शिकायत बस यही काम बचा है ।

बड़ा गाडफादर है क्‍या ?

गाडफादर बदतमीजी करने को नहीं बोलेंगे । यह तो गाडफादर की तौहीनी है । सह है तो क्‍या बदतमीजी करना चाहिये । इज्‍जत से नौकरी करना चाहिये ।

लगता है, उच्‍च सर्वश्रेष्‍ठ साबित करने का भूत सवार है ।

ठीक कह रहे हैं, ये तो वो हाल हुआ जैसे सेठ के गेट पर बंधा डाबरमैन कुत्‍ता ।

नन्‍दलाल भारती 17.02.2011

सम्‍पर्क सूत्र

आजाद दीप, 15-एम-वीणा नगर ,इंदौर ।म.प्र.!

दूरभाष-0731-4057553 चलितवार्ता-09753081066

Email- nlbharatiauthor@gmail.com

http://www.nandlalbharati.mywebdunia.com

http;//www.nandlalbharati.blog.co.in http://www.nandlalbharati.blogspot.com

http:// www.hindisahityasarovar.blogspot.com

http:// /nlbharatilaghukatha.blogspot.com

www.facebook.com/nandlal.bharati

जीवन परिचय /BIODATA

 

नन्‍दलाल भारती

कवि,कहानीकार,उपन्‍यासकार

शिक्षा - एम.. । समाजशास्‍त्र । एल.एल.बी. । आनर्स ।

पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा इन ह्‌यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्‍ट (PGDHRD)

जन्‍म स्‍थान- ग्राम-चौकी ।ख्‍ौरा।पो.नरसिंहपुर जिला-आजमगढ ।उ.प्र।

पुस्‍तकें

उपन्‍यास-अमानत -दमन,चांदी की हंसुली एवं अभिशाप

कहानी संग्रह -मुट्‌ठी भर आग,हंसते जख्‍म, सपनो की बारात

लघुकथा संग्रह-उखड़े पांव / कतरा-कतरा आंसू

काव्‍यसंग्रह -कवितावलि / काव्‍यबोध, मीनाक्षी, उद्‌गार

आलेख संग्रह- विमर्श एवं प्रतिनिधि पुस्‍तके-अंधामोढ कहानी संग्रह-ये आग कब बुझेगी काली मांटी निमाड की माटी मालवा की छावं एवं अन्‍य कविता कहानी लघुकथा संग्रह

सम्‍मान

वरि.लघुकथाकार सम्‍मान.2010,दिल्‍ली

स्‍वर्ग विभा तारा राष्‍ट्रीय सम्‍मान-2009,मुम्‍बइर्, साहित्‍य सम्राट,मथुरा।उ.प्र.

विश्‍व भारती प्रज्ञा सम्‍मान,भोपल,.प्र.,

विश्‍व हिन्‍दी साहित्‍य अलंकरण,इलाहाबाद।उ.प्र.

ल्‍ोखक मित्र ।मानद उपाधि।देहरादून।उत्‍तराखण्‍ड।

भारती पुष्‍प। मानद उपाधि।इलाहाबाद,

भाषा रत्‍न, पानीपत ।

डां.अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान,दिल्‍ली,

काव्‍य साधना,भुसावल, महाराष्‍ट्र,

ज्‍योतिबा फुले शिक्षाविद्‌,इंदौर ।म.प्र.

डां.बाबा साहेब अम्‍बेडकर विश्‍ोष समाज सेवा,इंदौर ,

विद्‌यावाचस्‍पति,परियावां।उ.प्र.

कलम कलाधर मानद उपाधि ,उदयपुर ।राज.

साहित्‍यकला रत्‍न ।मानद उपाधि। कुशीनगर ।उ.प्र.

साहित्‍य प्रतिभा,इंदौर।म.प्र.

सूफी सन्‍त महाकवि जायसी,रायबरेली ।उ.प्र.।एवं अन्‍य

आकाशवाणी से काव्‍यपाठ का प्रसारण । रचनाओं का दैनिक जागरण,दैनिक भास्‍कर,पत्रिका,पंजाब केसरी एवं देश के अन्‍य समाचार irzks@ifrzdvksa वेब पत्र पत्रिकाओं रचनाओं का में निरन्‍तर प्रकाशन। जनप्रवाह।साप्‍ताहिक।ग्‍वालियर द्वारा उपन्‍यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन ।

सदस्‍य

इण्‍डियन सोसायटी आफ आथर्स ।इंसा। नइर् दिल्‍ली

साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक कला संगम अकादमी,परियांवा।प्रतापगढ।उ.प्र.

हिन्‍दी परिवार,इंदौर ।मध्‍य प्रदेश।

अखिल भारतीय साहित्‍य परिषद न्‍यास,दिल्‍ली ।

आशा मेमोरियल मित्रलोक पब्‍लिक पुस्‍तकालय,देहरादून ।उत्‍तराखण्‍ड।

साहित्‍य जनमंच,गाजियाबाद।उ.प्र.

.प्र..लेखक संघ,.्रप्र.भोपाल ,

मध्‍य प्रदेश तुलसी अकादमी,भोपाल, एवं अन्‍य

सम्‍पर्क सूत्र

आजाद दीप, 15-एम-वीणा नगर ,इंदौर ।म.प्र.!

दूरभाष-0731-4057553 चलितवार्ता-09753081066

Email- nlbharatiauthor@gmail.com

Visit:- http://www.nandlalbharati.mywebdunia.com

http;//www.nandlalbharati.blog.co.in/ nandlalbharati.blogspot.com

http:// www.hindisahityasarovar.blogspot.com/ httpp://nlbharatilaghukatha.blogspot.com

www.facebook.com/nandlal.bharati

जनप्रवाह।साप्‍ताहिक।ग्‍वालियर द्वारा उपन्‍यास-चांदी की हंसुली का प्रकाशन

सितारों से मेरी ख़ता पूछ लेना,
अंधेरों  से मेरा पता पूछ लेना।


तेरे हुस्न को देखकर, मेरे हमदम,
ख़ुदाओं का सर क्यूं  झुका पूछ लेना।


मैं तेरे लिये जान दे सकता भी हूं ,
मगर दिल में, मेरी जगह पूछ लेना।


ज़मीं जाह ज़र की इनायत है लेकिन ,
सुकूं मुझसे क्यूं है खफ़ा पूछ लेना।


अदावत,बग़ावत, खयानत,सियासत ,
से इंसानों को क्या मिला पूछ लेना।


चराग़ों की तहज़ीब भाती है मुझको ,
हवाओं का तुम फ़ैसला पूछ लेना।


अभी न्याय की बस्ती मे मेरा घर है ,
ग़ुनाहों का दिल क्यूं दुखा पूछ लेना।


फ़लक को झुकाने की कोशिश थी मेरी
फ़लक खुद ही क्यूं झुक गया पूछ लेना।


समन्दर से मुझको मुहब्बत है दानी,
किनारों का तुम रास्ता पूछ लेना।

---
फ़लक=गगन, जाह=सम्मान, ज़र=धन,अदावत=दुशमनी,।

DSCN5197 (Custom)

ग़ज़ल 1

 

खरपतवारें पाली बाबा।

अज़ब अनाड़ी माली बाबा॥

 

टिड्डे बैठे पात पात पर ,

उल्‍लू डाली डाली बाबा।

 

कुटिल बिल्‍लियां यहां दूध की,

करती हैं रखवाली बाबा।

 

दूनिया बड़ी निराली बाबा ,

अपनी देखी भाली बाबा।

 

भरी रहे र्निनाद हमेशा,

बजती हैं बस खाली बाबा।

 

कहां रखी रहन किसी ने ,

हर घर की खुशहाली बाबा।

 

पाचन तंत्र सुदृढ़ इतना कि ,

वो लेते नहीं जुगाली बाबा।

 

छलनी जैसी कर बैठेगा ,

वो अपनी ही थाली बाबा।

 

धवल वेश में छिपा रखी थी,

कुत्‍सित काया काली बाबा।

 

---

ग़ज़ल 2

क्‍यों आस्‍थाएं दे रही आख्‍यान लड़की ।

कि आज भी दुनिया में हैं भगवान लड़की ॥

 

ये चूड़ियां हैं बेड़ियां नादान लड़की ,

मत बिन्‍धाओ नाक और ये कान लड़की ।

 

नहीं हैं मूंछ ढ़ाढ़ी मर्द की पहचान लड़की ,

वही हैं मर्द तो जो दे तुम्‍हें सम्‍मान लड़की ।

 

सिन हो कमसिन तो कहां इरफान लड़की ,

उत्‍फाल तो हैं नासमझ नादान लड़की ।

 

तू दुख्‍तरे हौवा हैं नातुअरन लड़की ,

हैं वाग्‍देवी तुझपे मेहरबान लड़की ।

 

क्‍यों लोग हैं तुझको पराया धन बताते,

तू बाप की दहलीज की हैं आन लड़की।

----

हा हा ही ही से स्वागत

यादों की नौका में बचपन

जब भी कभी सवार हुआ ,

भूली बिसरी सब यादों ने

आँखों में आकार लिया |

 

नदी नहाने जाते थे सब

मित्रों को संग में लेकर ,

यही देखते भरी नदी को

किन मित्रों ने पार किया |

 

नदी किनारे रखकर कपड़े

जी भर के स्नान किया ,

पता नहीं किस सेंध मार ने

पर्स रुपयों का मार दिया |

 

जिस पाकिट में पर्स रखा था

वह पाकिट ही गायब था ,

पकिट था जिस जींस मे

पेंट किसी ने मार दिया |

 

अब तो हम थे बिना पेंट के

चड्डी में ही घर आये ,

हा हा ही ही से सबने

मेरा स्वागत सत्कार किया |

समीक्षा

रामचरितमानस में पत्रकारिता

clip_image002

प्रमोद भार्गव

समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा है, तुलसी के रामचरितमानस में जितने गोते लगाओ उतनी ही बार सीप और मोतियों की उपलब्‍धियां होती रहती हैं। कुछ इसी तर्ज पर लेखक आरएमपी सिंह ने रामचरितमानस में डूबकियां लगाईं और मानस से पत्रकारिता के वे सूत्र खोज लाए जो सार्थक और समर्थ पत्रकारिता के लिए जरूरी हैं। वैसे भी कई दार्शनिक और मानस के गूढ़ मर्मज्ञ रामचरितमानस को मानव जीवन का संविधान बताते हैं। लिहाजा इसके मंथन से व्‍याख्‍याकार विधायिका, न्‍यायपालिका और कार्यपालिका जैसे तीन स्‍तंभों का अनुसंधान तो पहले ही कर चुके हैं, अब आरएमपी सिंह ने लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ ‘पत्रकारिता' की खोज भी कर डाली। वैसे भी राम संवैधानिक व्‍यवस्‍था में अयोध्‍या के साम्राज्‍यवादी एकतंत्री राजा जरूर थे, लेकिन उनकी कार्यशैली लोकहितैषी प्रजातांत्रिक मूल्‍यों की जीवन पर्यंत संरक्षक व समर्थक रही है। जन इच्‍छा राम के लिए कितनी महत्‍वपूर्ण थी, यह एक साधारण से धोबी के कथन को अमल में लाने से ही पता चल जाता है कि राम लोक मूल्‍यों की रक्षा के लिए पत्‍नी सीता का आनन-फानन में ही परित्‍याग करने का ठोस, निर्मम व हृदयविदारक आत्‍मनिर्णय ले लेते हैं। लोक व्‍यवहार में नैतिक प्रदर्शन का ऐसा यथार्थ आचरण दुनिया के सम्राटों में दूसरा कोई नहीं है।

आरएमपी सिंह की रामचरितमानस के संदर्भ में पत्रकारिता से जुड़ी किताब का शीर्षक है ‘रामचरितमानस में संवाद-संप्रेषण' संवाद-संप्रेषण ही सक्षम पत्रकारिता का मूल तत्‍व है। मानस के शिल्‍प का गठन और उसके विस्‍तार का आधार भी अद्वितीय संवाद शैली पर अवलंबित है। प्रश्‍नोत्तर का आधार बनने वाली इसी बातचीत से लेखक ने बड़ी दक्षता से पत्रकारिता के वे सब गुण ढूंढ़ निकाले जो पत्रकारिता के प्रस्‍थान बिन्‍दु हैं। यही नहीं पात्रों में भी पत्रकार होने की अंतर्वस्‍तु तलाश ली। प्रचार-तंत्र की भूमिका एक संघर्षशील नायक के लिए कितनी महत्‍वपूर्ण हो सकती है यह भी इस पुस्‍तक में निरूपित किया है। पत्रकार वार्ता, पत्रकार, रिर्पोटिंग, संपादन, संवादों का आदान-प्रदान, साक्षात्‍कार, फीडबैंक, संवादहीनता के दुष्‍परिणाम और छवि निर्माण जैसे पत्रकारिता से सभी आधार बिन्‍दुओं का रेखाकन तथ्‍यात्‍मक उदाहरणों के साथ इस किताब के आख्‍यान में दर्ज है। इस रचना की विलक्षणता यह भी है कि यह कथा और पात्रों को मनुष्‍य और मनुष्‍यता के परिप्रेक्ष्‍य में एक मौलिक आयाम देती है। अलैकिक दिव्‍यता की अनंत खोज इसमें नहीं है। शायद इसीलिए लेखक मानस में डूबकी लगाकर पत्रकारिता का यथार्थ सामने रखने में सफल हो पाए हैं।

लेखन ने मानस के गंभीर अध्‍ययन से उन शब्‍दों और उनके प्रभाव को भी मानस के दोहे-चौपाइयों से बीन लिया है जो पत्रकारिता का पर्याय हैं। मानस में पहली बार ‘समाचार' शब्‍द का उपयोग तब हुआ, जब सती अपने पिता के यज्ञ में अपनी आहुति देकर होम हो जातीं हैं। यह उस युग विशेष की विश्‍वव्‍यापी कारूणिक घटना है। क्‍योंकि सती कोई मामूली स्‍त्री नहीं थीं। वे त्रिलोकव्‍यापी भगवान शंकर की पत्‍नी थीं और दिग्‍विजयी सम्राट प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। इसलिए इस घटना को समाचार बनते देर नहीं लगती-

समाचार सब शंकर पाये, वीरभद्र करिकोप उठाये।

जग्‍य विंध्‍वस जाये तिन्‍ह कीन्‍हा, सकल सुरन्‍ह विधिवत दण्‍ड दीन्‍हा।

भै जगविदित दच्‍छ गति सोई, जसि कछु संभु विमुख के होई।

बुरी खबर-अच्‍छी खबर (गुड-न्‍यूज, बैड-न्‍यूज) खबर के एक ही सिक्‍के के दो महत्‍वपूर्ण पहलू हैं। सती का आत्‍मदाह जहां बुरी खबर है, वही मानस में सती पुनर्जन्‍म लेकर पार्वती के रूप में अवतरित होती हैं तो उस कालखण्‍ड में ब्रह्माण्‍ड की यह अच्‍छी खबर बन जाती है। तुलसीदास इस घटना का प्रस्‍तुतिकरण एक ‘समाचार' के रूप में करते हैं-

नारद समाचार सब पाये

कौतुकही गिरि गेह सिधाये

समाचार शब्‍द के बहुल प्रयोग के बाद तुलसीदास ने खबर शब्‍द का उपयोग भी मानस में प्रमुखता से किया है-

असुर तापसिंह ‘खबरि' जनाई

दसमुख कतहूं खबरि असि पाई

सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई।

जब रावण, कुंभकरण और विभीषण संसार में आते हैं तो उन्‍हें खबर मिलती है कि लंका जो मय दानव की परिकल्‍पना के वैशिष्‍ट्‌य का साकार स्‍वरूप है, उसका अधिपति विष्‍णु की अनुकंपा से कुबेर बना बैठा है, क्‍यों न उस पर आक्रमण कर अपने अधिकार में ले लिया जाए।

तुलसीदास ने समाचार का पर्याय ‘सुधि' शब्‍द को भी बनाया है। सुधि का प्रयोग सूचना के रूप में किया गया है।

यह सुधि कोल किरातन्‍ह पाई, हरषे जन नव निधि घर आई।

कंदमूल फल भरि-भरि दोना, चले रंक जनु लूटन सोना॥

इसी तरह राम के वनगमन के बाद जब भरत अयोध्‍या लौटते हैं और उन्‍हें राम द्वारा राजपाट छोड़ने की जानकारी मिलती है तो व्‍यथित भरत राम को लौटा लाने के दृष्‍टि से चित्रकूट की ओर प्रस्‍थान कर जाते हैं। जब भरत मार्ग में ऋषि भारद्वाज के आश्रम में पड़ाव डालते हैं, तब ऋषि भरत से कहते हैं मुझे अयोध्‍या के सब घटनाक्रमों की सूचना है-

सुनहु भरत हम सब सुधि पाई

विधि करतब पर किछुन बसाई।

मसलन त्रेता युग में सूचना जंजाल बहुत व्‍यवस्‍थित था। और सूचना संप्रेषण के लिए स्‍थान-स्‍थान पर विभिन्‍न रूपों में लोग तैनात थे। इसी नजरिये से लंका की ओर से सूर्पनखा, खर और दूषण समुद्र पार खबरचियों और सैनिकों के रूप में अरण्‍यों में तैनात थे। सूर्पनखा जब दंडित होकर लंकापति रावण के पास पहुंचती है तो वह रावण की कमजोर सूचना संरचना पर अफसोस जताती हुई कहती है-

करसि पान सोअसि दिनराती।

सुधि नहीं सिर पर आराति॥

फिर राम-रावण युद्ध की पृष्‍ठभूमि से लेकर युद्ध के अंत तक खबरों के आदान-प्रदान का सिलसिला समाचार, खबर और सुधि शब्‍दों में अभिव्‍यक्‍त है।

लेखक ने बेहद गूढ़ दृष्‍टि अपनाते हुए समाचारों के प्रकार का अनुसंधान भी मानस से ढूंढ़ निकाला है। यथा अंगद जब दूत के रूप में संदेश देकर लंका से वानर शिविर में लौटते हैं तो लंका की कई गोपनीय जानकारियां राम को देते है। लेखक ने इन समाचारों को गोपनीय अथवा खोज-खबर का दर्जा दिया है-

समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालि कुमार।

रिपु के समाचार जब पाये, रामसचिव सब निकट बुलाये॥

समाचार-पत्रों के लिए स्‍टोरी का अपना महत्‍व है। पत्रकारिता की भाषा में स्‍टोरी का पर्याय वृतांत से है। जबकि साहित्‍य में स्‍टोरी कहानी का पर्याय है। हनुमान कालनेमि नामक राक्षस का वध कर संजीवनी बूटी ठीक से न पहचान पाने के कारण पूरा पर्वत उखाड़ लाते हैं। और फिर संजीवनी के सेवन से लक्ष्‍मण की मुर्च्‍छा भंग हो जाती है और वे अगले दिन युद्ध को उद्यत हो जाते हैं तब यह पूरा घटनाक्रम, मसलन वृतांत अर्थात स्‍टोरी बन जाता है। रावण इस वृतांत को सुनकर बेचैन हो जाता है।

लेखक का तो यहां तक दावा है कि राम-युग में एक पूरा सूचना-तंत्र विकसित था। वन-वन पड़ाव डाले ऋषि-मुनि राम के प्रचार का हिस्‍सा थे। युद्ध के दौरान विभीषण ने बाकायदा सूचना अधिकारी का दायित्‍व निर्वहन बड़ी सतर्कता से किया था-

यहां विभीषण सब सुधि पायी।

सपदि जाइ रघुपति हि सुनाई॥

रावण वध उस काल विशेष में जिस दिन रावण वीरगति को प्राप्‍त हुआ शायद त्रिलोक की सबसे बड़ी घटना रही होगी। लेकिन राम के लिए, एक विरही पति के लिए इस घटना की सूचना सबसे पहले अपनी बिछुड़ी पत्‍नी को पहुंचाने की तीव्रतम इच्‍छा है। इसलिए रावण वध के तत्‍क्षण राम हनुमान से कहते हैं-

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना, लंका जाहु कहेउ भगवाना॥

समाचार जानकिहि सुनावहु, तासु कुसल लै तुम्‍हचलि आवहु॥

मानस में जब सूचना है, संदेश है और समाचार है तो फिर इनके कर्ता व कारक के रूप में व्‍यक्‍ति अर्थात पत्रकार भी होना चाहिए। अन्‍यथा पत्रकारिता के कर्म को अंजाम कौन देगा। सो लेखक ने बड़ी गहन कुशलता से पत्रकार और उनके पत्रकारिता मर्म व धर्म को भी ढूंढ़ निकाला है। संदेश-संप्रेषण पत्रकारिता का महत्‍वपूर्ण तथा मूल पहलु है। इसी वजह से व्‍यापार को पत्रकारिता का उद्‌गम माना जाता है। समुद्र मार्ग से व्‍यापारीगण दूसरे देशों में माल बेचने व लेने जाते थे तथा वहां के रहन-सहन घटनाक्रम, दर्शनीय स्‍थल और यात्रा वृतांतों का वर्णन लौटकर करते थे। लेखक पत्रकारिता की शुरूआत देशाटन की इसी स्‍थिति से मानते हैं। भाषा की उत्‍पत्ति के साथ संदेश अथवा संवाद संप्रेषण का सलिसिला शुरू हुआ। प्राग्‍तिैहासिक और रामायण काल में नारद को सबसे प्राचीन और प्रमुख पत्रकार लेखक ने माना है। वे पृथ्‍वी की घटनाओं कीे सूचना इंद्रलोक में और इंद्रलोक के निर्णयों की सूचना पृथ्‍वीवासियों को देते थे। इस कारण वे प्रमुख व प्रखर संवाददाता थे। नारद की सूचनाएं कभी गलत साबित नहीं हुईं, इसलिए वे सच्‍चाई के निकटतम पत्रकार माने गए।

लेखक ने नारद के अलावा सरस्‍वती, हनुमान मंथरा और शूर्पनखा को भी पत्रकारिता की भूमिका निर्वहन की दृष्‍टि से देखा है। विद्या की अधिष्‍ठात्री सरस्‍वती को लेखक तत्‍कालीन मीडिया घराने की स्‍वामिनी मानकर चलते हैं। क्‍योंकि इंद्र सरस्‍वती के माध्‍यम से ही राम के राज्‍याभिषेक में विध्‍न डालते हैं। उन्‍हें देवताओं के इस षड़यंत्र पर पीड़ा भी होती है, जिसे देवता अपने स्‍वार्थपूर्तियों को अंजाम देने में लगे हैं-

बार-बार गहि चरन संकोची, चली बिचारि विपुल मति पोची।

ऊंचनिवास, नीच करतूती, देखि न सकई परायी विभूति॥

अंततः सरस्‍वती मंथरा के जरिये देवताओं की करतूत को गति देती हैं। दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना ऊंचे पदों पर विराजमान लोगों का यथार्थ है। आज उद्योगपति राजनीति में पर्याप्‍त हस्‍तक्षेप मीडिया के बूते ही कर रहे हैं। मंथरा द्वारा कैकेयी को उकसाने के फलस्‍वरूप जब राम का राज्‍य 14 वर्ष के लिए निष्‍कासन हो जाता है। तत्‍पश्‍चात जब भरत और शत्रुध्‍न अयोध्‍या लौटते हैं और जब वे मंथरा की कुचालों से अवगत होते हैं तो फिर मंथरा की धतकर्म के लिए धुनाई करते हैं। पत्रकारों का राजनीतिज्ञों और बाहुबलियों से प्रताड़ित होना आज के दौर में रोजमर्रा की स्‍थिति हो गई है।

लेखक ने हनुमान को रचनात्‍मक पत्रकारिता का पोषक व प्रणेता माना है। वे हनुमान ही थे जो लंका में प्रवेश कर सीता का न केवल पता लगाते हैं बल्‍कि रावण की सैन्‍य शक्‍ति, उसके आयुध भण्‍डार, आंतरिक स्‍थिति और शक्‍ति संपन्‍न राज्‍य व राजाओं से संबंधों की पड़ताल भी करते हैं। एक अन्‍वेषी पत्रकार का राष्‍ट्रहित में यही मंतव्‍य होना चाहिए। लेखक ने हनुमान में खबर को सूंघन (न्‍यूज-नोज) की क्षमता भी दर्शाई है। अंगद को भी सुग्रीव के खबरची के रूप में प्रस्‍तुत किया गया है।

लेखक ने मानस से साक्षात्‍कार भी खोज निकाले हैं और वे रामचरित में पहला साक्षात्‍कार पार्वती द्वारा शंकर से की गई बातचीत को मानते हैं। फिर इन साक्षात्‍कारों का सिलसिला राम-हनुमान के बीच, हनुमान-विभीषण के बीच, वाल्‍मीकि और राम के बीच तथा काग-गरूड़ के बीच देखते हैं। लेखक साक्षात्‍कार लेते समय पत्रकार को संयम बरतने की हिदायत देते हुए कहते हैं, प्रश्‍न हमेशा जिज्ञासा शांत करने के लिए होना चाहिए क्‍योंकि अकसर देखा जाता है घटना से जुड़े व्‍यक्‍ति का कथन लेते वक्‍त ही पत्रकार विवाद व संकट के दायरे में आते हैं।

लेखक ने समीक्षित पुस्‍तक में कहीं भी भाषाई अथवा शिल्‍प वैशिष्‍ट्‌म दिखाने की कोशिश नहीं की है। मूल कथा को विस्‍तार देना भी उनका अभीष्‍ठ नहीं है। इसलिए लेखक सिर्फ अपनी मानस से उन संदभों को उठाते हैं जो पत्रकारिता की पुष्‍टि करने वाले हैं। दिव्‍यता का अलौकिक अनुसंधान कर इहलोक और परलोक सुधारने की बात भी पुस्‍तक में कहीं नहीं है। सीधी सरल भाषा और सपाट बयानी में लिखी इस पुस्‍तक की शैली को भी समाचारीय तर्ज पर प्रस्‍तुत किया गया है। लेखक का प्रमुख व मौलिक ध्‍येय रामचरितमानस से पत्रकारिता से जुड़े संदर्भ खोजना है इसलिए प्रस्‍तुति का क्रम जरूर एक सीधी रेखा में नहीं चलता। इसके बावजूद मानस से लिए उदाहरणों और उनकी विषय सापेक्ष व्‍याख्‍या, लेखक पाठक के अंतर्मन में अपने मंतव्‍य को उतारने में जरूर पूरी तरह सफल रहता है। श्रीकृष्‍ण ने गीता में कहा है, जो मुझे जिस रूप में भजता है, मैं उसे उसी रूप में प्राप्‍त होता हूं। कमोबेश यही स्‍थिति रामचरितमानस के साथ है, उसकी अनंत गहराइयों में वह सब कुछ है, जो आपकी सोच के दायरे में है। जरूरत है लेखक आरएमपी सिंह की तरह गहरे पैठने की, उतरने की अथवा तह में जाकर मोती बटोर लाने की।

पुस्‍तक ः रामचरितमानस में संवाद-संप्रेषण

लेखक ः आरएमपी सिंह

प्रकाशन ः आयम प्रकाशन, 3 अंकुर कॉलोनी,

शिवाजी नगर भोपाल (म.प्र.)

मूल्‍य ः 250/-

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीjाम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224

फोन 07492-232007, 233882

ई-पता pramodsvp997@rediffmail.com

वरिष्ठ और चर्चित कथाकार हरि भटनागर का कहानी संग्रह - सेवड़ी रोटियाँ और जले आलू यहीं पर पढ़िए ई-बुक रूप में या पीडीएफ़ ई-बुक के रूप में डाउनलोड कर पढ़ें-पढ़ाएँ अपने अथवा अपने मित्रों के कंप्यूटर, लैपटॉप अथवा आई-पैड, मोबाइल फ़ोनों में. डाउनलोड के लिए नीचे दिए गए डाउनलोड लिंक पर क्लिक करें


Enlarge this document in a new window
Self Publishing with YUDU

पूरी दुनिया में मानवाधिकारों की वकालत करने वाले व उसकी शर्तें विकासशील देशों पर थोपने की तानाशाही बरतने वाले अमेरिका की सरजमीं पर नस्‍लवाद कितना वीभत्‍स है, यह हाल ही में अमेरिका के ट्राई वैली नामक फर्जी विश्‍व विद्यालय में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के टखनों में ‘वितंतु पट्‌टा' (रेडियो कॉलर) पहनाकर उन पर नजर रखने के पशुवत व्‍यवहार के रूप में सामने आया है। इस दंभी आचरण की कार्यशैली को क्‍या कहा जाए, अमेरिकी मानव प्रजाति को सर्वश्रेष्‍ठ जताने की हठी कोशिश अथवा इस अमानवीय बद्‌तमीजी को नस्‍लभेदी मानसिकता का पर्याय माना जाए ? क्‍योंकि पश्‍चिमी देशों में अब ये घटनाएं रोजमर्रा का हिस्‍सा बनती जा रही हैं।

दरअसल भारतीयों की श्रमसाध्‍य कर्त्तव्‍यनिष्‍ठा का लोहा वैश्‍विक परिप्रेक्ष्‍य में दुनिया मान रही है। परंतु भारतीयों का नियोक्‍ता राष्‍ट्र के प्रति यही समर्पण और शालीन सज्‍जनता कुछ स्‍थानीय चरमपंथी समूहों के लिए विपरीत मनस्‍थितियां पैदा करती है। जिसके तईं स्‍थानीय नागरिक भारतीयों की अपने देशों में प्रभावशाली उपस्‍थिति को मौलिक अधिकारों के हनन के रूप में देखते हैं और जाने अनजाने ऐसा बर्ताव कर जाते हैं जो नस्‍लभेद के दायरे में आता है। अमेरिका और आस्‍ट्रेलिया में जहां ऐसी घटनाओं का अंजाम छात्रों के साथ हिंसक व्‍यवहार के रूप में सामने आ रहा है, वहीं ब्रिटेन में सिख समुदाय के लिए पगड़ी और कटार धारण नस्‍लभेदी संकट का कारक बन रहे हैं। विश्‍वग्राम के बहाने साम्राज्‍यवादी अवधारणा के ये ऐसे सह-उत्‍पाद हैं, जो यह तय करते हैं कि धर्मनिरपेक्षता राष्‍ट्राध्‍यक्षों का मुखौटा है। उसके भीतर जातीय और नस्‍लीय संस्‍कार तो अंगड़ाई लेते ही रहते हैं।

आज कमोबेश पूरी दुनिया में वैश्‍विक व्‍यापार की विस्‍तारवादी सोच की आड़ में राजनैतिक चेतना, समावेशी उपाय करने में पिछड़ती दिखाई दे रही है। परिणामस्‍वरूप सामाजिक सरोकार और प्रगतिशील चेतनाएं हाशिये पर धकेल दी जा रही हैं। उपेक्षापूर्ण कार्यशैली की यही परिणति प्रतिरोधी शंखनाद का ऐसा चेहरा है जो मनुष्‍यताद्रोही है। बाजारवादी संस्‍कृति की यह क्रूरता और कुरूपता सांस्‍कृतिक बहुलतावाद को भी आसन्‍न खतरा है। योरोपीय मूल के लोगों में ही नहीं एशियाई और दक्षिण व मध्‍य एशियाई मूल के लोगों में भी प्रतिरोध की यह धारणा बलवती हो रही है। अरब देशों में हिंसक प्रदर्शन और सूडान का विभाजन इसके ताजा उदाहरण हैं।

अमेरिका में भारतीय छात्रों के साथ घृणा के व्‍यवहार की शुरूआत एक अभियान के तहत आंध्रप्रदेश के छात्र श्रीनिवास चिरकुरी की हत्‍या के साथ करीब डेढ़ दशक पहले हुई थी। दो अज्ञात अमेरिकी युवकों ने उसे जिंदा जलाकर मार डाला था। यह वीभत्‍स घटना उस समय घटी थी जब श्रीनिवास अमेरिका के नेबादा राज्‍य विश्‍वविद्यालय परिसर की प्रयोगशाला में प्रयोगों में तल्‍लीन था। हत्‍यारे हमलावर युवकों ने उसके शरीर पर ज्‍वलनशील पदार्थ डालते हुए कहा भी था कि हम विश्‍वविद्यालय में किसी विदेशी छात्र को नही रहने देना चाहते। अमेरिका में हिंसक हो रही युवा पीढ़ी की यह कुंठा थी, जो आवेग में अनायास ही हत्‍यारे युवकों की जबान पर आ गई थी।

मंदी की जबरदस्‍त मार झेल रहे अमेरिका के मौजूदा हालातों में बेरोजगारी की दर 9 से 15 फीसदी के बीच डोल रही है। ऐसे में रोजगार की हकमारी कर रहे विदेशी युवकों के प्रति अमेरिकी युवकों की दमित कुंठा या अधिकारियों का जंगली व्‍यवहार क्‍या कहर ढाएंगे यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। लेकिन ये घटनाएं ऐसी चेतावनियां है जो नस्‍लभेद और जन्‍मजात जातीय संस्‍कारों के वजूद के प्रति सचेत करती हैं। ये घटनाएं इस बात का भी संकेत हैं कि यदि पूंजीवादी सरकारों के हित साधन के लिए बहुसंख्‍यक समाज को वंचित बनाए जाने की नीतिबद्ध योजनाएं इसी तरह क्रियान्‍वित होती रहीं तो कई देशों में वंचितों की बढ़ती दर जातीय और सांप्रदायिक वैमनस्‍यता के बूते गृहयुद्ध के हालात पैदा कर देगी। भारत में बढ़ता व फैलता नक्‍सलवाद ऐसी ही एकपक्षीय सरोकारों से जुड़ी नीतियों की देन है। इन नीतियों के निहितार्थ दुनिया की आबादी को भोगवादियों की संख्‍या में समेट देने में भी निहित हैं।

अमेरिका में रंगभेद, जातीय भेद व वैमनस्‍य का सिलसिला नया नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। इन जड़ों की मजबूती के लिए इन्‍हें जिस रक्‍त से सींचा गया था वह भी अश्‍वेतों का था। हाल ही में अमेरिकी देशों में कोलंबस के मूल्‍यांकन को लेकर दो दृष्‍टिकोण सामने आए हैं। एक दृष्‍टिकोण उन लोगों का है जो अमेरिकी मूल के हैं और जिनका विस्‍तार व वजूद उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के अनेक देशों में है। दुसरा दृष्‍टिकोण या कोलंबस के प्रति धारण उन लोगों की है जो दावा करते हैं कि अमेरिका का अस्‍तित्‍व ही हम लोगों ने खड़ा किया है। इनका दावा है कि कोलंबस अमेरिका में इन लोगों के लिए मौत का कहर लेकर आया। क्‍योंकि कोलंबस के आने तक अमेरिका में इन लोगों की आबादी बीस करोड़ के करीब थी, जो अब घटकर दस करोड़ से भी कम रह गई है। इतने बड़े नरसंहार के बावजूद अमेरिका में मौजूदा इस हिंसक प्रवृत्ति से अमेरिका अभी भी मुक्‍त नहीं हो पाया है, यह भारतीय छात्रों के टखनों में वितंतु पट्‌टा बांधने की घटना से साबित होता है।

फौरी तौर से इस घटना को न तो राजनीतिक दृष्‍टिकोण से देखना चाहिए और न ही राजनीतिक रंग देने की कोशिश करनी चाहिए। वैसे भी ऊपरी तौर से यह घटना प्रशासनिक अव्‍यवहार से जुड़ी है। हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्‍णा ने इस घटना को अमानवीय बताकर इतिश्री कर ली है। जबकि इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही तरफ से मजबूत प्रतिरोध जाहिर होना चाहिए था। यह इसलिए जरूरी था क्‍योंकि विश्‍वविद्यालय के गैरकानूनी होने की तसदीक केवल अमेरिका के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में था। छात्रों के अपराधी होने का तो कोई आधार ही नहीं बनता। इसके बावजूद उनसे मनुष्‍य विरोधी आचरण किया गया।

राजनेताओं के कमोबेश खामोश रवैये से साबित होता है कि हमारे नेता कितनी सतही, विदेशी दबाव से प्रभावित और पक्षपातपूर्ण राजनीति करते हैं। दरअसल अमेरिका ने भारत और अन्‍य तीसरी दुनिया के देशों को जानवरों की तरह हांक लगाकर दबाव का जो वातावरण बनाया है उससे अमेरिकी जनमानस में इन देशों के प्रति दोयम दर्जे का रूख अपनाने की मनोवृत्ति पनपी है। अमेरिकियों में पैदा हुए इस मनोविज्ञान के चलते भारतीय मूल के छात्रों व अन्‍य अप्रवासियों के खिलाफ वैमनस्‍य का माहौल तैयार हुआ है, जिसकी परिणति अब क्रूरता के रूप में घटित हो रही है।

इस घटना के लिए विदेशी शिक्षा हासिल करने की वह भारतीय मानसिकता भी जिम्‍मेबार है, जो जोखिम उठाने से भी नहीं कतराती। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हमारे देश से जो प्रतिभावान छात्र पलायन कर योरोपीय देशों में पहुंचते हैं, वे जिस किसी भी बौद्धिकता से ताल्‍लुक रखने वाले क्षेत्र में हों अपने विषयी कार्यक्षेत्र में इतने दक्ष और कर्त्तव्‍य के प्रति इतने सजग रहते हैं कि अपनी सफलताओं और उपलब्‍धियों से वे खुद तो लाभान्‍वित होते ही हैं, नियोक्‍ता राष्‍ट्रों को भी लाभ पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। अलबत्ता इतना जरूर है कि इन भारतीयों ने अपनी कर्मठता व योग्‍यता से जो प्रतिष्‍ठा व सम्‍मान अमेरिका, ब्रिटेन अथवा आस्‍ट्रेलिया की धरती पर अर्जित किया, वही अब इनके लिए अभिशाप साबित हो रहा है। क्‍योंकि इन समर्पित भारतीय मूल के बौद्धिकों ने अमेरिकी व ब्रिटेन मूल के बौद्धिकों को कहीं बहुत पीछे खदेड़ दिया हैं। बौद्धिक वजूद की भारतीय और योरोपीय मूल के छात्रों के बीच प्रचलित इस होड़ में जब योरोपीय छात्र पिछड़ रहे हैं तो उनकी मनोवृत्ति में बदलाव आ रहा है। अब ये छात्र हमारी बिल्‍ली हमसे ही म्‍याऊं की तर्ज पर भारतीय छात्रों को आतंकित कर रहे हैं।

जानकारी तो यहां तक मिल रही है कि अमेरिका, ब्रिटेन और आस्‍ट्रेलिया में नस्‍लीय आतंक और हिंसा में लगातार इजाफा हो रहा है। फलस्‍वरूप प्रतिक्रियावादी संगठन भी इन देशों की धरती पर खड़े हो रहे हैं। ‘क्‍लू क्‍लाक्‍स क्‍लोने' और ‘स्‍किन हैड' जैसे हथियारों से लैस संगठन वजूद में आ गए हैं। जो नस्‍लभेद से जुड़ी हिंसक वारदातों को अंजाम देने में लगे हैं। अमेरिका शासन तंत्र को इन कट्‌टर जातिवादी संगठनों की जानकारी है। भारतीय मूल के लोग भी प्रशासन को ज्ञापन देकर ध्‍यान आकर्षित कर चुके हैं।

इस समय तीन चीजें कथित विश्‍वग्राम में तब्‍दील कर दी गई तीसरी दुनिया के देशों को झकझोर रही है। एक एडम स्‍मिथ द्वारा रचित अमेरिकी हित साधक पूंजीवादी अर्थशास्‍त्र, दूसरा नवऔद्योगिक व प्रौद्योगिक साम्राज्‍यवाद और तीसरा विदेशी अंग्रेजी शिक्षा का सम्‍मोहन। इन तीन परिवर्तनकारी कारकों ने इराक, वियतनाम, कोरिया और अफगानिस्‍तान को धूल-ध्‍वस्‍त किया। पाकिस्‍तान और मिश्र इन कारकों की आंधी में झुलस रहे हैं। भारत का परंपरागत समाज इसी प्रगति और विकास के बहाने अपनी अकूत प्राकृतिक संपदा को बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों को दोहन की खुली छूट देकर अपने पैरों में खुद ही कुल्‍हाड़ी मार रहा है। नतीजतन हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को वैश्‍विक आर्थिकी के मायावी छल के चलते 10-12 प्रतिशत की तेज गति से खोते जा रहे हैं। दुनिया में आई आर्थिक मंदी ने वैश्वीकरण के जन विरोधी चेहरे को बेनकाब भी कर दिया है। इसके बावजूद हम हैं कि अमेरिकी पूंजीवादी अर्थशास्‍त्र और विदेशी शिक्षा को राम की खड़ाऊं मानकर चल रहे हैं। इससे मुंह मोड़ने के सार्थक नीतिगत उपाय नहीं किए गए तो पश्‍चाताप के आंसू निकालना भी मुश्‍किल होगा।

----

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224

फोन 07492-232007, 233882

pramodsvp997@rediffmail.com

§

आम शहरी नागरिक की तरह मेरे पास भी एक अदद द्विचक्रवाहिनी नामक वाहन था, जिसे मैं अपने विद्यार्थी काल से ही काम में ले रहा था। इस ऐतिहासिक वाहन पर चढ़ कर ही मैंने एम․एस․सी․ किया। नौकरी शुरू की। शादी की तैयारियां कीं और वे सभी सांसारिक कर्म किये जो इस साईकिल नामक वाहन से संभव था। मगर इधर तेजी से बदलती, बदलती दुनिया और समय की कमी, आपा-धापी से परेशान होकर मैंने भी एक दुपहिया वाहन लेने की सोची। बस मुसीबतों का पहाड़ उसी दिन से गिरना शुरू हुआ पत्‍नी से बात की तो बोली, साईकिल में क्‍या खराबी है इस पर तुम आटा भी पिसवाकर ले आते हो, सब्‍जी भी आ जाती है। स्‍कूटर पर आटा नहीं पिसवा सकोगे और फिर पेट्रोल का खर्चा। इस महंगाई के युग में यह फालतू का खर्चा। कम से कम तीन सौ रुपये माहवार फुंक जायेंगे।

मैंने बात को संभालने की कोशिश की।

- अरे भागवान ! तुम कुछ समझने की कोशिश करो। अगर एक अदद दुपहिया वाहन खरीद लें तो मैं दफ्‍तर से शाम को जल्‍दी घर आ जाऊंगा। बच्‍चों को स्‍कूल छोड़ सकूंगा। और कभी कभार तुम्‍हें भी घुमाने ले जाऊंगा। सच में जब कन्‍धे पर हाथ रखे पीछे महिला को बिठाकर कोई वाहन सर से मेरे पास से गुजरता है तो कलेजे में एक हूक-सी उठती है, काश मेरे पास भी एक दुपहिया वाहन होता। पत्‍नी की आंखों में चमक आई।

मैं समझ गया। अब बात बनने ही वाली है।

अब तुम ही सोचो क्‍या इतने बड़े ससुर का दामाद साईकिल पर जाता अच्‍छा लगता है। और फिर पैसों का प्रबंध, तो तुम चिन्‍ता मत करो। दफ्‍तर से वाहन अग्रिम के रूप में मुझे तेरह हजार रुपये मिल जायेंगे। बोनस भी आगे पीछे मिलने ही वाला है। बस तुम हां कह दो। जैसे-तैसे जुगाड़ करके अपन भी एक दुपहिया वाहन के मालिक बन जायेंगे। और फिर ठाठ से टाटा, बाई-बाई करेंगे। देखा नहीं टी․वी․ पर वाहनों के विज्ञापन में चालक और चालक प्रेमिका कैसी हंसी ठट्टा करते है।

- सो सब तुम जानो। मगर हर महीने उसे क्‍या पानी भर के चलाओगे।

देवी अभी विज्ञान में इतनी उन्‍नति तो नहीं की है कि स्‍कूटर या मोपेड पानी से चले, मगर फिलहाल हम स्‍कूटर को कम चलायेंगे। देखो बच्‍चों के रिक्‍शा को बन्‍द कर देंगे। मैं उन्‍हें छोड़ कर दफ्‍तर जाऊंगा और शाम को आते समय ले आऊंगा। दो सौ रुपये ये बचे। साईकिल पुरानी है सो हर महीने मरम्‍मत में 20-25 रुपये खाती है, सो ये भी बचे। मेरे कार्यालय आने जाने में बस के किराये के प्रतिमाह सत्त्‍ार-अस्‍सी रुपये लग जाते हैं सो भी बचेंगे। सो इस प्रकार भागवान लगभग तीन सौ रुपये प्रतिमाह की बचत से पैट्रोल आ जायेगा। और सुनो, शाम को समय बचेगा तो एक-आध ट्‌यूशन कर लूंगा तो सब ठीक हो जायेगा। तुम चिन्‍ता मत करो।

- मगर लोन की किश्‍त कैसे चुकेगी ?

- तुम नहीं समझोगी, डी․ए․ की किश्‍त तथा सालाना वेतन वृद्धि से दीवाली के बाद लगभग एक सौ रुपयों की वेतन वृद्धि होगी, उसी में से किश्‍त भी चुक जायेगी।

- अब तुम नहीं मानते हो तो ले लो दुपहिया वाहन, मगर हैलमेट पहन कर पूरे कार्टून लगोगे।

- वो तो मैं अभी भी लग रहा हूं।

मैंने हंसते हुए कहा।

अब मैंने एक अपने लायक दुपहिये वाहन की खोज शुरू की। मोटर साईकिल मुझे कभी भी नहीं जंची। क्‍योंकि हमारा दूधवाला भी इसी पर आता है। स्‍कूटर की चर्चा चली तो कीमत सुनकर मैंने विचार निरस्‍त कर दिया। मोपेड लेने का विचार किया तो घर वालों ने एक स्‍वर से विरोध करना शुरू कर दिया। लड़के ने कहा-

मोपेड पर बैठा आदमी तो ऐसा लगता है कि जैसे गधी के कान पकड़ कर कोई जा रहा है। पुत्री ने भी जोड़ा -

मोपेड कोई सवारी है, मेरी सभी सहेलियों के पास स्‍कूटर या कारें हैं।

पत्‍नी ने भी कहा-

मोपेड से तो सेकंड हैन्‍ड स्‍कूटर ही ठीक रहेगा।

यह प्रस्‍ताव सर्व सम्‍मति से पास हुआ। अब मैं एक सेकंड हैन्‍ड स्‍कूटर की तलाश में सेकंड हैन्‍ड बाजारों के चक्‍कर लगाने लगा। जो भी अपना स्‍कूटर बेचने आता यही कहता, अगले महीने कार आ रही है सो इसे बेच रहा हूं। वरना इस शानदार सवारी को कौन बेचता है।

ज्‍योंही मैं पैट्रोल खपत की बात करता तो बोलते, यार पैट्रोल की चिंता करोगे तो जिन्‍दगी भर स्‍कूटर नहीं खरीद सकोगे। इधर मिस्‍त्री कहता, साब आप जो सस्‍ता, सुन्‍दर, टिकाऊ और मजबूत स्‍कूटर ढूंढ़ रहे हैं, वो हमारे पास नहीं है।

घर वालों ने मेरे से बातचीत बंद कर दी। धीरे-धीरे पूरे शहर में यह बात फैल गयी कि इन्‍हें एक ऐसे पुराने स्‍कूटर की तलाश है जो पैट्रोल नहीं खाता हो, देखने में अच्‍छा हो, पुराना नहीं लगता हो और कम कीमत का हो।

सेकंड हेंड स्‍कूटरों के चक्‍कर में मैं मारा-मारा फिरने लगा। शाम को थक हार कर घर आकर बताता, सब कहते। यह तो रोज का किस्‍सा है।

पूरे प्रकरण पर पुनः विचार करने के बाद हमने तय किया कि इस धनतेरस पर एक नया वाहन ले ही लें। मोपेड लेने की मेरी इच्‍छा को मरे मन से सबने स्‍वीकृति दे दी। मैंने मोपेड के साथ ही एक हेलमेट भी खरीद लिया जिसका रंग मेरे दिल के रंग की तरह ही काला था। वैसे भी मेरे पास अब सफेद बालों का ढंकने का यह सबसे सुन्‍दर तरीका था।

मोपेड घर पर आ गयी। साथ में मैं हेलमेट पहनकर आया। सचमुच में मैं एक कार्टून-सा लग रहा था। पुत्री ने इस वाहन की पूजा अर्चना की। पास-पडोस में मिठाई बांटी गयी। मगर अभी तो कई चक्‍कर बाकी थे। परिवहन विभाग में पंजीकरण, मोपेड का बीमा, मिस्‍त्री को दिखाना और गाड़ी के नम्‍बर बनवाना।

इन सब कामों को मैंने स्‍वयं ही करना तय किया। सो सब कार्यों हेतु मुझे दफ्‍तर से छुट्टी लेनी पड़ी। दलालों से बचकर मैंने सब काम तो करा लिए, मगर जब घर आकर हिसाब लगाया तो पता चला कि दलाल से काम सस्‍ते में ही हो सकता था। मगर सिद्धान्‍त भी तो कोई चीज होती है सो मैंने सिद्धान्‍तों की खातिर पैसों की ओर ध्‍यान नहीं दिया।

धीरे-धीरे मैं मोपेड चलाने लगा। कभी किसी पुलिस वाले को देखता तो दिल में धुकधुकी होती, शायद अभी चालान बना देगा। मैं अक्‍सर नियमानुसार चलता, मगर बाकी चालकों को नियम कौन सिखा सकता है, सो एक रोज बड़ी चौपड़ पर एक मोटर साईकिल सवार ने मेरे जोर से टक्‍कर मारी, बमुश्‍किल मैं तो बच गया मगर बेचारी मोपेड का कबाड़ा हो गया। मिस्‍त्री ने देखा और कहा - साहब इस मोपेड को किसी अजायबघर में रखवा दो। दर्शक देखेंगे और खुश होंगे तब से मैं बड़ा उदास हूं। मैंने अपनी पुरानी खटारा साईकिल वापस निकाल ली है और उसे ठीक करा ली है।

क्‍या आपकी वाहन व्‍यथा भी इसी प्रकार की है। लिखियेगा।

दुःख कहने-सुनने से हल्‍का होता है वाहन की व्‍यथा-कथा एक दूसरे से कहते रहें। बाकी सब ठीक है।

0 0 0

यशवन्‍त कोठारी 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget