गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की ग़ज़लें

ग़ज़लें

( १)

तुम जो कहते गर वही सही होता ।

कहीं भी मेरा नामोंनिशां नहीं होता ॥

 

मेरा वज़ूद इस बात का पुख्ता सबूत है,

किसी के कहने से कोई मुर्दा नहीं होता ।

 

यूं तो हर वक्त जलाते रहते हो मुझको,

पर न जाने क्यों मैं फ़ना नहीं होता ।

 

हम सफ़र ज़माने मे बहुत है लेकिन,

आप होते जो सफ़र में तो सही होता ।

 

(२)

यह सच कि सब कुछ मेरे पास है ।

मगर क्या करू दिल बहुत उदास है ॥

 

बीबी, बच्चे,धन दौलत और नहीं कुछ,

ज़िन्दगी के तन को ढ़ंकने के लिबास है ।

 

टूट कर बिखर गयी है ज़िन्दगी यहाँ,

ज़िन्दगी के टूटे टुकड़ों की तलाश है ।

 

रोज़ ही मिलते सिलसिले अन्धेरों के,

अब न जाने किस सहर की तलाश है ।

 

(3)

वही भंवर वही बवाल है ।

मछुआरॊं ने डाला नया जाल है ॥

 

भटकते रहे हम शेर की तलाश में,

हाथ लगी जो,वो भेड़िये की खाल है ।

 

बेगुनाह पिसता है हर रोज़ यहाँ,

आम आदमी का नहीं पुरसाहाल है ।

 

ज़िन्दगी की तलाश में मर गया वो,

जो तब था वही अब भी हाल है ।

 

मछलियाँ आज भी बेहद उदास है,

नीचे काला जल और ऊपर जाल है ।

 

(4)

अन्धेरे में साथ छोड कर, अच्छा नहीं किया।

सामने सबके हमें लूट कर, अच्छा नहीं किया॥

 

मुझे पता था कि वो मुझसे रूठ जाएगा,

आइना उसे दिखा कर, अच्छा नहीं किया ।

 

मेरी बर्बादी का ग़म न कर सके, न कर,

नश्तर मगर चुभो कर, अच्छा नहीं किया ।

 

ज़रा सी बात पर जो धड़क उठता था दिल,

उस दिल को संगदिल कर, अच्छा नहीं किया ।

 

दबी हुई आग हूँ मैं राख़ के भीतर,

बेवज़ह उसे हवा देकर, अच्छा नहीं किया ।

 

पहन लिए बारीक पैरहन तो कोई बात नहीं,

भिगो कर उसे मगर, अच्छा नहीं किया ।

---

 

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

५/२ ए रामानन्द नगर

अल्लापुर, इलाहाबाद

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