विजय वर्मा की ग़ज़ल - आज महफ़िल में सारे बेगाने लगे हैं

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apane aur begane

आज महफ़िल में

आज महफ़िल में  सारे बेगाने लगे हैं

मुझे गर्दिश में देख  मुस्कुराने लगे हैं.

 

जिन-जिन को मैंने दिलों-जाँ से मदद की

अपनी-अपनी मजबूरियां गिनाने लगे हैं.

 

चिंगारी जब भी मेरे आशियाने पे गिरी

वो शोलों को और भी भड़काने लगे हैं.

 

रौंद कर पौधों को,फूलों को मसल कर

आकर उपवन में आँसू बहाने लगे हैं.

 

विष-सिंचित की जड़ों को, पानी पत्तों को दी,

देखो रिश्तों के फूल अब मुरझाने लगे हैं.

 

सब की शक की नज़रों के दायरे में आ गए

हम जब भी जरा कुछ गुनगुनाने लगे हैं

 

सुना हैं धूम से मेरी निकलेगी मैय्यत

किल शय्या के नीचे, कांटे सिरहाने लगे हैं.

 

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,बोकारो 
vijayvermavijay560@gmail.com

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2 टिप्पणियाँ "विजय वर्मा की ग़ज़ल - आज महफ़िल में सारे बेगाने लगे हैं"

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