शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

राजीव श्रीवास्तवा की कविता : अमर जवान ज्योति !

 

amar jawan jyoti

सदियों से खड़ा है खामोश, हज़ारों कहानियाँ समेटे हुए ,

थक चुका है लोगो को देश प्रेम का संदेश देते हुए ,

चीख-चीख के ये हमे शहीदों की याद दिलाता है,

उनके बलिदान और सरफरोशी के किस्से सुनता है !

 

इसमे छुपी हज़ारों लोगों की लाखों अनकही कहानी है ,

पर लागत है अब ये सब बेमतलब है ,बातें पुरानी है ,

ये वो शहीद है जो हँस के देश से रुखसत हो गये ,

चुप- चाप जान दे धरती माँ की गोद मे जा के सो गये !

 

कई लोग यहाँ रोज आते है और यूँ ही चले जाते हैं ,

बिरले ही कुछ लोग अपने शीश को नवाते हैं ,

कौन चंद पल खड़ा हो शहीदों को याद करता है ,

बस यहाँ खड़े होकर राजनीति की बात करता है !

 

इस पवित्र ज़मीन पर जहाँ श्रद्धा की गंगा बहती थी ,

लोगो के मन मे देश भक्ति की प्यास रहती थी ,

ये तो बस अब सैर सपाटे की जगह बन गयी ,

आज वास्तव मे शहीदों की अंतिम साँसे भी रुक गयी !

 

ये आज बेबस और परेशान सा दिखता है ,

क्योकि इसके ठीक सामने देश का ईमान बिकता है ,

यदा कदा ही यहाँ पुष्प भेंट ,और सलामी बजती है ,

और दिन तो यहाँ चना और मूँगफली ही बिकती है !

 

मत और अपमान करो,इसे और ना शर्मसार करो ,

यहाँ बस देश भक्ति की बात करो, इतना उपकार करो ,

वही यहाँ आए जिसके दिल मे धरती माँ बसती है ,

यही एक छोटे सी बात मेरी ये रचना कहती है---

मेरी ये रचना कहती है !

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

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