रविवार, 13 फ़रवरी 2011

मालिनी गौतम की ग़ज़ल

malini gautam (Custom)

गज़ल

संग दिल इंसान सुधरेगा न आखिर कब तलक

ये दिले नादां मचलेगा न आखिर कब तलक

 

पेड़ देते मौन आमंत्रण खुले आकाश को

बादलों से मेह बरसेगा न आखिर कब तलक

 

मछ्लियाँ बेबस तड़पती हैं अगर जल ना मिले

जल बिना मछ्ली के तड़पेगा न आखिर कब तलक

 

कर गुज़रने का इरादा हो अगर इंसान में

पत्थरों से नीर निकलेगा न आखिर कब तलक

 

दुखों का सैलाब आँखों से निरंतर बह रहा

ये चमन बरबाद सँवरेगा न आखिर कब तलक

 

शाख से बिछ्ड़े हुए कुछ फूल-पत्तों ने कहा

चार दिन का साथ छूटेगा न आखिर कब तलक

 

हर नज़र हर साँस मे बस इक तेरी ही आस है

तू मेरी हालत पे पिघलेगा न आखिर कब तलक

---

डॉ मालिनी गौतम

मंगलज्योत सोसाईटी

संतरामपुर-३८९२६० गुजरात

6 blogger-facebook:

  1. संग दिल इंसान सुधरेगा न आखिर कब तलक

    ये चमन बरबाद सँवरेगा न आखिर कब तलक
    ----शानदार गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  2. Bahut sunder rachna...

    मछ्लियाँ बेबस तड़पती हैं अगर जल ना मिले

    जल बिना मछ्ली के तड़पेगा न आखिर कब तलक

    Ma`m Din a gaye hai, Jal ab tadapane laga hai bin machhli ke..

    कर गुज़रने का इरादा हो अगर इंसान में

    पत्थरों से नीर निकलेगा न आखिर कब तलक

    Bahut gahra kathan hai.

    दुखों का सैलाब आँखों से निरंतर बह रहा

    ये चमन बरबाद सँवरेगा न आखिर कब तलक

    Isme me दुखों kis tarah prayukt hua h samaj me nahi aya. Vajan k hisab se...

    उत्तर देंहटाएं
  3. मालनी जी आपकी ग़ज़ल संगदिल इंसान को तड़पने पर अवश्य मज़बूर करेगी। विसंगतियां संगतियों में ज़ुरूर परिवर्तित होंगी गर इतना ही पक्का यकीं रहा।
    बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  4. डॉक्टर साहिबा ! गजल को गुनगुना कर आनंद लिया ......."दुखों का सैलाब" की जगह यदि "दर्द का सैलाब" कर देंगी तो मीटर में आ जाएगा ...आप ज़रा गुनगुना कर देखिये न !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेनामी10:53 am

    wonderful. thought mam.

    Chirag

    उत्तर देंहटाएं

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