बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

अमिता कौंडल की कविता

कब

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दिल दहल सा जाता है
यह भयंकर
हिंसा देख कर
क्यूँ खेलता है
इंसान
अपने ही
खून की होली?
क्यूँ बोलता है
यह मौत की बोली?


क्या हम इतने
विकसित हो गये हैं
कि मानवता की
सीमा लाँघ गये?
कब तक
रोते अनाथ
बच्चों,
विधवाओं का
रुदन सुनेगें?


कब तक
अपने ही
खून से सनी
धरती देखेंगे?
कब अंत होगा
मानव की बढ़ती
तृष्णा का?
कब रुकेंगे
भटके कदम?


कब आएगी
मानव को
मानवता की
समझ?

--

3 blogger-facebook:

  1. मानव बदलेगा तब युग बदलेगा
    मानव बदलेगा जब भीतर जाना सीख लेगा
    बाहर देखना सीख लेगा

    उत्तर देंहटाएं
  2. rachana10:44 pm

    क्या हम इतने
    विकसित हो गये हैं
    कि मानवता की
    सीमा लाँघ गये?
    कब तक
    रोते अनाथ
    बच्चों,
    विधवाओं का
    रुदन सुनेगें?
    kash hum sun sakte .aaj hum apne ander hi aawaj hi nahi sunte.shayad isiliye hum maavta se door hain
    bahut sunder baat likhi aap ne
    achchhi kavita ke liye badhai amita ji
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. अमिता3:00 am

    स्वार्थ जी, रचना जी सुंदर टिप्पणियों के लिए धन्यवाद .
    सादर
    अमिता

    उत्तर देंहटाएं

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