गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

एस के पाण्डेय की लघुकथा - अंधेर

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पोस्टमेन ने चिट्ठी रजनी की काकी को थमाते हुए बोला कि अमर बाबू के यहाँ पँहुचा देना। रजनी की काकी सबसे पहले अपने घर गईं और रजनी व उसकी सहेली ने चिट्ठी का कुछ अंश पढ़ भी लिया। चिट्ठी अमर बाबू की बेटी शीला की थी। उसके पति ने दिल्ली से भेजा था।

अभी शादी हुए एक वर्ष भी नहीं हुआ और न ही गौना हुआ है और चिट्ठी-पत्री आने लगी। रजनी की काकी इस अंधेर को घर-घर तक पँहुचाने में देर नहीं किया। शीला के पति की चिठ्ठी आई है, यह बात पूरे गाँव में चर्चा का विषय बन गई।

शीला की मम्मी से नहीं रहा गया। वो भी निकल पड़ी और जोर-जोर से बोलकर लोगों को इकट्ठा कर लिया। रजनी की काकी भी पहुँच गईं। उन्हें देखते ही वे बोलीं कि शीला को चिठ्ठी उसके पति ने भेजा है। जिसके साथ उसने सात फेरे लिए हैं। जिसके साथ उसे जिंदगी गुजारनी है। किसी लुच्चे-लफंगे की चिट्ठी नहीं है। जिसे तुम गाँव भर में भूजा की तरह बाट रही हो।

रजनी की पढ़ाई क्यों बंद हुई, गाँव में कौन ऐसा है जो नहीं जानता। आज तुम्हें यह अंधेर लगता है और जब तुम्हारे घर में रजनी के लिए चिट्ठी गिरती थी, तब वह अंधेर नहीं था।

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डॉ. एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र. )।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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4 blogger-facebook:

  1. सुन्दर लघुकथा ...
    दूसरों पर दोषारोपण से पहले खुद के गिरेबान में झांको...
    सीख देती यह लघुकथा कल चर्चामंच पर होगी... आभार ..
    http://charchamanch.blogspot .com

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  2. बहुत अच्छी प्रेरक लघुकथा ..गाँव की तस्वीर अभी बहुत कुछ नहीं बदल सकी है शिक्षा अभी भी दो जून की रोटी के आगे वेबस है!

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  3. गांवों की तस्‍वीर बयां करती कहानी। हमें अपने गिरेबां में पहले झांकना चाहिए।

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  4. बहुत अच्छी प्रेरक लघुकथा|

    उत्तर देंहटाएं

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