संजय दानी की ग़ज़ल - तेरे होठों पे जब भी तबस्सुम दिखे, मेरे दिल में ग़ुनाहों का मौसम बने.

तेरे होठों पे जब भी तबस्सुम दिखे,
मेरे दिल में ग़ुनाहों का मौसम बने।


  गेसुयें तेरी लहराती है इस तरह,
गोया बारिश के लश्कर का परचम तने।


  तेरी तस्वीर को जब भी शैदा करूं,
तो मेरी आंखों से सुर्ख शबनम बहे।


दूर हूं तुझसे पर ख्वाहिशे दिल यही,
दिल में तू ही रहे या तेरा ग़म रहे।


तेरे चश्मे समन्दर का है यूं नशा,
इस शराबी के पतवारों में दम दिखे।


चांदनी बेवफ़ाई न कर और कुछ,
चांद का कारवां फ़िर न गुमसुम चले।


मैं चराग़ों की ले लूं ज़मानत सनम,
गर हवायें तेरी सर पे हरदम बहे।


मेरी दरवेशी पे कुछ तो तू खा रहम,
खिड़कियों में ही अब अक्शे-पूनम सजे।


ईद दीवाली  मिल के  मनाया करें,
हश्र तक दानी मजबूत संगम रहे।

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4 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - तेरे होठों पे जब भी तबस्सुम दिखे, मेरे दिल में ग़ुनाहों का मौसम बने."

  1. पहले शे’र से ही आनन्द आ गया.

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. दूर हूं तुझसे पर ख्वाहिशे दिल यही,
    दिल में तू ही रहे या तेरा ग़म रहे।

    बहुत सुन्दर गज़ल..हरेक शेर दिल को छू जाता है ..

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  4. दानी जी आपका ग़ज़ल-दान बहुत रास आया। ध्न्यवाद।

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