शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : मैंने भी खरीदा वाहन

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आम शहरी नागरिक की तरह मेरे पास भी एक अदद द्विचक्रवाहिनी नामक वाहन था, जिसे मैं अपने विद्यार्थी काल से ही काम में ले रहा था। इस ऐतिहासिक वाहन पर चढ़ कर ही मैंने एम․एस․सी․ किया। नौकरी शुरू की। शादी की तैयारियां कीं और वे सभी सांसारिक कर्म किये जो इस साईकिल नामक वाहन से संभव था। मगर इधर तेजी से बदलती, बदलती दुनिया और समय की कमी, आपा-धापी से परेशान होकर मैंने भी एक दुपहिया वाहन लेने की सोची। बस मुसीबतों का पहाड़ उसी दिन से गिरना शुरू हुआ पत्‍नी से बात की तो बोली, साईकिल में क्‍या खराबी है इस पर तुम आटा भी पिसवाकर ले आते हो, सब्‍जी भी आ जाती है। स्‍कूटर पर आटा नहीं पिसवा सकोगे और फिर पेट्रोल का खर्चा। इस महंगाई के युग में यह फालतू का खर्चा। कम से कम तीन सौ रुपये माहवार फुंक जायेंगे।

मैंने बात को संभालने की कोशिश की।

- अरे भागवान ! तुम कुछ समझने की कोशिश करो। अगर एक अदद दुपहिया वाहन खरीद लें तो मैं दफ्‍तर से शाम को जल्‍दी घर आ जाऊंगा। बच्‍चों को स्‍कूल छोड़ सकूंगा। और कभी कभार तुम्‍हें भी घुमाने ले जाऊंगा। सच में जब कन्‍धे पर हाथ रखे पीछे महिला को बिठाकर कोई वाहन सर से मेरे पास से गुजरता है तो कलेजे में एक हूक-सी उठती है, काश मेरे पास भी एक दुपहिया वाहन होता। पत्‍नी की आंखों में चमक आई।

मैं समझ गया। अब बात बनने ही वाली है।

अब तुम ही सोचो क्‍या इतने बड़े ससुर का दामाद साईकिल पर जाता अच्‍छा लगता है। और फिर पैसों का प्रबंध, तो तुम चिन्‍ता मत करो। दफ्‍तर से वाहन अग्रिम के रूप में मुझे तेरह हजार रुपये मिल जायेंगे। बोनस भी आगे पीछे मिलने ही वाला है। बस तुम हां कह दो। जैसे-तैसे जुगाड़ करके अपन भी एक दुपहिया वाहन के मालिक बन जायेंगे। और फिर ठाठ से टाटा, बाई-बाई करेंगे। देखा नहीं टी․वी․ पर वाहनों के विज्ञापन में चालक और चालक प्रेमिका कैसी हंसी ठट्टा करते है।

- सो सब तुम जानो। मगर हर महीने उसे क्‍या पानी भर के चलाओगे।

देवी अभी विज्ञान में इतनी उन्‍नति तो नहीं की है कि स्‍कूटर या मोपेड पानी से चले, मगर फिलहाल हम स्‍कूटर को कम चलायेंगे। देखो बच्‍चों के रिक्‍शा को बन्‍द कर देंगे। मैं उन्‍हें छोड़ कर दफ्‍तर जाऊंगा और शाम को आते समय ले आऊंगा। दो सौ रुपये ये बचे। साईकिल पुरानी है सो हर महीने मरम्‍मत में 20-25 रुपये खाती है, सो ये भी बचे। मेरे कार्यालय आने जाने में बस के किराये के प्रतिमाह सत्त्‍ार-अस्‍सी रुपये लग जाते हैं सो भी बचेंगे। सो इस प्रकार भागवान लगभग तीन सौ रुपये प्रतिमाह की बचत से पैट्रोल आ जायेगा। और सुनो, शाम को समय बचेगा तो एक-आध ट्‌यूशन कर लूंगा तो सब ठीक हो जायेगा। तुम चिन्‍ता मत करो।

- मगर लोन की किश्‍त कैसे चुकेगी ?

- तुम नहीं समझोगी, डी․ए․ की किश्‍त तथा सालाना वेतन वृद्धि से दीवाली के बाद लगभग एक सौ रुपयों की वेतन वृद्धि होगी, उसी में से किश्‍त भी चुक जायेगी।

- अब तुम नहीं मानते हो तो ले लो दुपहिया वाहन, मगर हैलमेट पहन कर पूरे कार्टून लगोगे।

- वो तो मैं अभी भी लग रहा हूं।

मैंने हंसते हुए कहा।

अब मैंने एक अपने लायक दुपहिये वाहन की खोज शुरू की। मोटर साईकिल मुझे कभी भी नहीं जंची। क्‍योंकि हमारा दूधवाला भी इसी पर आता है। स्‍कूटर की चर्चा चली तो कीमत सुनकर मैंने विचार निरस्‍त कर दिया। मोपेड लेने का विचार किया तो घर वालों ने एक स्‍वर से विरोध करना शुरू कर दिया। लड़के ने कहा-

मोपेड पर बैठा आदमी तो ऐसा लगता है कि जैसे गधी के कान पकड़ कर कोई जा रहा है। पुत्री ने भी जोड़ा -

मोपेड कोई सवारी है, मेरी सभी सहेलियों के पास स्‍कूटर या कारें हैं।

पत्‍नी ने भी कहा-

मोपेड से तो सेकंड हैन्‍ड स्‍कूटर ही ठीक रहेगा।

यह प्रस्‍ताव सर्व सम्‍मति से पास हुआ। अब मैं एक सेकंड हैन्‍ड स्‍कूटर की तलाश में सेकंड हैन्‍ड बाजारों के चक्‍कर लगाने लगा। जो भी अपना स्‍कूटर बेचने आता यही कहता, अगले महीने कार आ रही है सो इसे बेच रहा हूं। वरना इस शानदार सवारी को कौन बेचता है।

ज्‍योंही मैं पैट्रोल खपत की बात करता तो बोलते, यार पैट्रोल की चिंता करोगे तो जिन्‍दगी भर स्‍कूटर नहीं खरीद सकोगे। इधर मिस्‍त्री कहता, साब आप जो सस्‍ता, सुन्‍दर, टिकाऊ और मजबूत स्‍कूटर ढूंढ़ रहे हैं, वो हमारे पास नहीं है।

घर वालों ने मेरे से बातचीत बंद कर दी। धीरे-धीरे पूरे शहर में यह बात फैल गयी कि इन्‍हें एक ऐसे पुराने स्‍कूटर की तलाश है जो पैट्रोल नहीं खाता हो, देखने में अच्‍छा हो, पुराना नहीं लगता हो और कम कीमत का हो।

सेकंड हेंड स्‍कूटरों के चक्‍कर में मैं मारा-मारा फिरने लगा। शाम को थक हार कर घर आकर बताता, सब कहते। यह तो रोज का किस्‍सा है।

पूरे प्रकरण पर पुनः विचार करने के बाद हमने तय किया कि इस धनतेरस पर एक नया वाहन ले ही लें। मोपेड लेने की मेरी इच्‍छा को मरे मन से सबने स्‍वीकृति दे दी। मैंने मोपेड के साथ ही एक हेलमेट भी खरीद लिया जिसका रंग मेरे दिल के रंग की तरह ही काला था। वैसे भी मेरे पास अब सफेद बालों का ढंकने का यह सबसे सुन्‍दर तरीका था।

मोपेड घर पर आ गयी। साथ में मैं हेलमेट पहनकर आया। सचमुच में मैं एक कार्टून-सा लग रहा था। पुत्री ने इस वाहन की पूजा अर्चना की। पास-पडोस में मिठाई बांटी गयी। मगर अभी तो कई चक्‍कर बाकी थे। परिवहन विभाग में पंजीकरण, मोपेड का बीमा, मिस्‍त्री को दिखाना और गाड़ी के नम्‍बर बनवाना।

इन सब कामों को मैंने स्‍वयं ही करना तय किया। सो सब कार्यों हेतु मुझे दफ्‍तर से छुट्टी लेनी पड़ी। दलालों से बचकर मैंने सब काम तो करा लिए, मगर जब घर आकर हिसाब लगाया तो पता चला कि दलाल से काम सस्‍ते में ही हो सकता था। मगर सिद्धान्‍त भी तो कोई चीज होती है सो मैंने सिद्धान्‍तों की खातिर पैसों की ओर ध्‍यान नहीं दिया।

धीरे-धीरे मैं मोपेड चलाने लगा। कभी किसी पुलिस वाले को देखता तो दिल में धुकधुकी होती, शायद अभी चालान बना देगा। मैं अक्‍सर नियमानुसार चलता, मगर बाकी चालकों को नियम कौन सिखा सकता है, सो एक रोज बड़ी चौपड़ पर एक मोटर साईकिल सवार ने मेरे जोर से टक्‍कर मारी, बमुश्‍किल मैं तो बच गया मगर बेचारी मोपेड का कबाड़ा हो गया। मिस्‍त्री ने देखा और कहा - साहब इस मोपेड को किसी अजायबघर में रखवा दो। दर्शक देखेंगे और खुश होंगे तब से मैं बड़ा उदास हूं। मैंने अपनी पुरानी खटारा साईकिल वापस निकाल ली है और उसे ठीक करा ली है।

क्‍या आपकी वाहन व्‍यथा भी इसी प्रकार की है। लिखियेगा।

दुःख कहने-सुनने से हल्‍का होता है वाहन की व्‍यथा-कथा एक दूसरे से कहते रहें। बाकी सब ठीक है।

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यशवन्‍त कोठारी 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

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