प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल गीत - यादों की नौका में बचपन

हा हा ही ही से स्वागत

यादों की नौका में बचपन

जब भी कभी सवार हुआ ,

भूली बिसरी सब यादों ने

आँखों में आकार लिया |

 

नदी नहाने जाते थे सब

मित्रों को संग में लेकर ,

यही देखते भरी नदी को

किन मित्रों ने पार किया |

 

नदी किनारे रखकर कपड़े

जी भर के स्नान किया ,

पता नहीं किस सेंध मार ने

पर्स रुपयों का मार दिया |

 

जिस पाकिट में पर्स रखा था

वह पाकिट ही गायब था ,

पकिट था जिस जींस मे

पेंट किसी ने मार दिया |

 

अब तो हम थे बिना पेंट के

चड्डी में ही घर आये ,

हा हा ही ही से सबने

मेरा स्वागत सत्कार किया |

2 टिप्पणियाँ "प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल गीत - यादों की नौका में बचपन"

  1. हास्य से लबरेज़ अच्छी अभिव्यक्ति, बधाई।

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  2. कमेंट्स देने के लीये धन्यवाद‌

    प्रभुदयाल‌

    उत्तर देंहटाएं

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