त्रिवेणी तुरकर की कविता : गुरूदेव को नमन

गुरुदेव को नमन

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हे श्रद्धेय गुरुदेव ए स्‍वीकारो हम सब का शत शत नमन।

हे भारत गौरव देशाभिमानी रचा आपने भारत का राष्ट्रगान।

हर भारतवासी को है जिस पर अति अभिमान।

भारत भू के इस यशोगान का करते सब सम्‍मान।

हुई दूर तिमिर छाया पसरा उज्‍जवल आलोकित ज्ञान।

देश देशांतर तक हुआ विस्‍तारित आपका गान।

मिला आपसे ही विश्‍व को गीतांजली सा दिव्‍य उपहार।

मां भारती हुई अति पुलकित सपूत आप सा पाकर।

जननी को देखा आपने माता में जन्‍म भूमि में

ए उससे भी व्‍यापक बनकर देखा समग्र विश्‍व में।

दे गये आप हमें जो साहित्‍य संपदा अनमोल।

कभी न होंगे विस्‍मृत वे शब्‍दरत्‍न अनमोल।

किया बंधन-मुक्‍त शिक्षा को आपने विद्यालय की चारदीवारी से।

शांतिनिकेतन से पाई हमने नई परिभाषा विद्यालय की आपसे।

मन पर अंकित है छवि अब भी

ए चुलबुली मिनी व बातूनी काबुलीवाले की।

दिल को छू लेने वाली छाप उन नन्‍हीं अंगुलियों की।

जिसे देखकर करता काबुली याद अपनी बिटिया की।

मिनी में काबुली देखता छवि अपनी प्‍यारी सी बेटी की।

शांतिनिकेतन की रचना कर किया अपना स्‍वपन साकार।

हुई अनेक प्रतिभायें विकसित प्रेरणा आपसे पाकर।

मिले देश को जिससे विविध प्रतिभा-संपन्‍न व्‍यक्‍तित्‍व।

निखर निखर कर फैले जग भर ये प्रखर व्‍यक्‍तित्‍व।

इच्‍छा प्रबल है देख पाउं मैं उन स्‍थानों को जी भर।

अनुभूति पाउं वहां व्‍याप्‍त आपके अस्‍तित्‍व की जी भरकर।

गर्व करेगा सदा भारत देश हे गुरुदेव आप पर।

नोबल पुरस्‍कार सम्‍मानित हुआ आप-सा विजेता पाकर।

2 टिप्पणियाँ "त्रिवेणी तुरकर की कविता : गुरूदेव को नमन"

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