शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - भ्रष्टाचार : तुच्छ विचार

भ्रष्टाचार एक तुच्‍छ विचार है। घोटालों पर चर्चा भी तुच्‍छ है। सच पूछो तो भ्रष्टाचार हमारे खून में है। देश भ्रष्टाचार प्रधान है। घोटाला प्रधान है। भ्रष्टाचार है, मगर सरकार कहीं नहीं हैं। सरकार कहाँ गई कोई नहीं जानता। सरकार को ढूंढते रहो कहीं नहीं नजर आती, मगर सर्वत्र भ्रष्टाचार, घोटाले नजर आते हैं। हमारे खून में संस्‍कृति में सर्वत्र भ्रष्टाचार के विषाणु घुस गये हैं। आम आदमी सुबह उठ कर घोटाले की चर्चा करता है और सड़क पर भ्रष्टाचार से रुबरु होता है।

पुलिस वाला किसी बात पर चालान बनाने को कहता है और एक मिनी भ्रष्टाचार की कार्यवाही शुरु हो जाती है। बातचीत चालान से शुरु हो कर पचास रुपये पर खतम हो जाती है। कमिश्‍नर प्रणाली के फायदे अनन्‍त हो गये हैं। आम आदमी पुलिस से बच कर सब्‍जी मण्‍डी में जाता है, फिर महंगाई और भ्रष्टाचार से रुबरु होता है.

प्‍याज आजकल वेलेन्‍टाइन डे में लेन -देन के काम आ रहा है। आप शायद जानना चाहेंगे कि भ्रष्टाचार से क्‍या सबक मिलता है, मेरा निवेदन है कि भ्रष्टाचार के सबक ही सबक है, सबसे बड़ा सबक ये कि भ्रष्टाचार आपको व्‍यावहारिक बनाता है। आपके प्रिय नेता या राष्ट्रनायक के प्रति आपके मन में अविश्‍वास जगाता है।

भ्रष्टाचार का सच जानने के लिए आप स्‍वयं भी भ्रष्टाचार में घुस सकते हैं। जितना गहरा उतरेंगे उतने ज्‍यादा मोती मिलेंगे। जीवन में साफ छवि के लोग हाशिये पर पड़े हैं। उन्‍हें कोई नहीं पूछता। मुख्‍यधारा में दलाल, लाबिस्‍ट, पत्रकार, पी․ए․ पी․एस․, भाई भतीजे, यार दोस्‍त, संगी साथी है, आप भी उनमें मिल सकते हैं।

भ्रष्टाचार का अगला सबक ये है कि आप अपनी समस्‍त जिम्‍मेदारी नीचे वाले पर डाल सकते है। भ्रष्टाचार का एक सबक ये भी है कि आप जांच की सिफारिश कर दे। जांच चल रही है।

भ्रष्टाचार का अगला कदम समिति बनाना भी हो सकता है। भ्रष्टाचार की जांच या समिति का मतलब ये है कि आप भ्रष्टाचार की कब्र बना रहे है हो सके तो एक मूर्ति भी बनवा ले।

भ्रष्टाचार का अगला सबक ये है कि आप स्‍वयं को विपक्षी बना ले। आप विपक्ष में रह कर भी श्रेष्ठ भ्रष्टाचारी हो सकते हैं। खूब बोलिये और पक्ष को पानी पी पीकर कोसिये। आप भ्रष्टाचार की मदद से राजनीतिक माइलेज ले सकते हैं, किसी को आपत्‍ति नहीं होगी। सरकारी भ्रष्टाचार, गैर सरकारी भ्रष्टाचार सभी के लिए व्‍यवस्‍था अंधी, बहरी और गूंगी है, वो न तो कुछ देखती है और न ही बोलती है। मगर क्‍या व्‍यवस्‍था को कभी इतिहास माफ करेगा।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

मो․․09414461207

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