रविवार, 27 फ़रवरी 2011

विजय वर्मा की रचनाएँ

vijay verma

कहानी

लौट आओ दीदी

बात उन दिनों की है जब आम आदमी तक टीवी-कंप्यूटर की पहुँच तो नहीं ही हुई थी,रेडियो-ट्रांजिस्टर भी अपनी पहुँच सर्व-सुलभ नहीं बना सके थें.छपरा शहर के मुख्य-मार्ग पर--जो गुदड़ी -बाज़ार से साहेबगंज तक जाती है--यातायात के मुख्य साधन टमटम और बैल-गाड़ी ही थें.बैल-गाड़ी तो खैर सामान ढोने के लिए ही थे ,लेकिन उसपर लटककर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने से बच्चों को भला कौन रोक सकता था.

तो उन दिनों साहेबगंज में आज की भांति इतने सारे ठेले,मोबाइल की दुकानें ,सड़क पर सजी दुकानें तो नहीं ही थे,इतना भीड़-भाड़ भी नहीं था.

जिला मुख्यालय होते हुए भी उसका स्वरुप एक कस्बे से ज्यादा नहीं था.फिर भी लगता है कि जब से सृष्टि बनी है तब से इस शहर का मुख्य-बाज़ार साहेबगंज ही रहा है.हथुआ महाराज का बसाया हुआ हथुआ-मार्केट तब भी शहर का शान था,आज भी है.

एक मुख्य बात यह थी कि गेहूं पिसाने की चक्की साहेबगंज में ही थी इसलिए दहियावां -टोला तक के लोगो को भी इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए साहेबगंज ही आना पड़ता था.

आज जो कलेक्टर्स -कम्पौंड में स्टेडियम और उसके चारो तरफ इतने सारे घर बने हुए है,तब उस सब का अस्तित्व ही नही था .पूरे मैदान में पेड़-पौधे एवं ऊंची-ऊंची झाड़ियों का साम्राज्य था.शाम होते ही उस रास्ते पर लोगों का चलना बंद हो जाता था और उस समय के जितने भी बुद्धिमान लोग थे उनका निश्चित मत यह था कि रात होते ही उस मैदान में भूत-प्रेतों का डेरा जम जाता था.बच्चे तो खैर दिन में भी उधर जाने से डरते थे.

इसी शहर के दहियावां मोहल्ले में एक ५-६ साल का लड़का रहता था अपने से २-३ साल बड़ी बहन के साथ वैसे तो उस घर में तीन सदस्य थे--जो मोटे -ताजे अधेड़ उम्र के पुरुष प्राणी थे,उन्हें बच्चे पिताजी कह कर बुलाते थे.वे घर के नियमित सदस्यलगते नहीं थे क्योंकि हर २-४ दिनों पर वे शहर से बाहर चले जाते थे--कुछ काम धंधे के लिए.

नाम तो बताया नहीं अभी तक उस लड़के और उसकी बहन का,चलिए लड़के का नाम रोशन और लड़की का नाम दुलारी रख लेते है.

रोशन को दिन-भर मटरगस्ती करना और जो भी रुखा-सूखा मील जाए उसे खाकर मस्त रहना---इससे ज्यादा उसका कोई काम ना था ना ही उसकी चाह ही थी.

गरीबी और मज़बूरी समय से पहले ही जीवन-निर्वाह के लिए जरूरी कार्यों को सिखा देती है,इसलिए भले ही दुलारी सिर्फ ८-९ साल कि थी पर तवे पर रोटियां सेंकना सीख गयी थी.तो घर में आटा रहने पर इस बात की गारंटी रहती थी की दोनों बच्चों को भूखो पेट सोने की नौबत नहीं आएगी.,वैसे मोहल्लेवाले भी कभी-कभी उन बच्चो को रोटी-सब्जी की दावत दे ही दिया करते थे.

तो गेंहू पिसाना रोशन का काम था ,और रोटियां सेंकना दुलारी का और इसके लिए दोनों में से किसी को भी एक दूसरे को रिमाइन्डर नहीं देना पड़ता था.

घर क्या था बस झोपड़ी से थोडा बेहतर ,बेहतर इसलिए कि एक आँगन था उसमें पीने के पानी के लिए एक बड़ा सा घड़ा था रसोईघर में जिसमे साप्ताहिक रूप से पानी भरा जाता था.उस ज़माने में शायद बेक्टीरिया गणों को यह मालूम ना था कि पानी प्रदूषित करने की जिम्मेवारी उनकी ही है,क्योंकि कभी यह सुना नहीं गया कि उस पानी को पीकर बच्चे कभी बीमार पड़े हो.

उनके घर में एक टूटी हुई कुर्सी भी थी ,टूटी हुई विशेषण पर ज्यादा ध्यान मत दीजिये क्योंकि उसकी इज्ज़त कम नहीं थी.किसी विशेष अतिथि के आगमन पर उसे ही विक्रमादित्य के सिंहासन की तरह पेश किया जाता था.

घर से करीब १०० मीटर की दूरी पर एक नदी बहती थी,गंगा तो नहीं थी लेकिन उसकी जलधारा में डुबकी लगाने के पहले लोगो को 'जय गंगा मैया 'बोलने की आदत पड़ी हुई थी.अगर उस बे-जुबान नदी में बोलने की शक्ति होती तो अवश्य बताती कि उसे नाम बदल कर जीना पसंद है कि नहीं

बच्चे आचार-रोटी ,गुड-रोटी खाते ठंडा पानी पीते और दिनभर मोहल्ले के हम-उम्र बच्चों के साथ खेलते रहते.पढाई-लिखाई उन लोगों के लिए शौकिया चीज थी.

बहुत से माता-पिताओं का यह मानना था कि ज्यादा लिखने-पढने से आँखें खराब हो जाती है.ऐसा ही विचार उन बच्चों के पिता का भी था.

वैसे उन बच्चों ने मोहल्ले वालों से यह कहते भी सुना था कि ये बच्चे अगर उसके अपने होते तो क्या वह इन्हें स्कूल नहीं भेजता.

दशहरे कि धूमधाम बीत जाने के बाद आज भी लोगों को सोनपुर मेले का इंतज़ार रहता है,उस ज़माने में भी रहता था.रोशन और दुलारी को सोनपुर मेला देखना तो नसीब नहीं हुआ था लेकिन उसका वर्णन सुनने में भी बहुत मज़ा था.इतने हाथी,इतने ऊँट,घोडा बैल,इतनी दुकानें ---बाप रे बाप.जौनपुर कि नौटंकी! खुरमे और गाजे की दुकानें.

जिंदगी ऐसे ही चलती जा रही थी.

एक दिन रोशन गेंहूं पिसाने के अपने कर्तव्य का निर्वाह करने साहेबगंज जा रहा था.श्रम बचाने के लिए झोले को बैल-गाड़ी पर रखकर पीछे-पीछे चला जा रहा था तभी उसकी नज़र दूर से आते हुए पिताजी पर पड़ी..पिताजी के साथ एक बड़ी लड़की ,दुलारी से भी बड़ी,ये कौन आ रही है?इसे पहले कभी देखा तो नहीं.

जब वह वापस घर लौटा तो वो लड़की घर में ही एक कोने में गुमसुम खड़ी थी इतना सुंदर चेहरा होने पर भी चेहरे पर जिंदगी के कोई लक्षण नहीं!कोई ख़ुशी नहीं चेहरे पर,जब की वह तो जानता ही नहीं था कि खुश होकर रहने के अलावे और किसी ढंग से भी जिया जा सकता है..

आँगन में प्रवेश करते ही पिताजी ने उसे बताया 'यह तुम्हारी नई दीदी है,यही रहेगी.'इतना कहकर पिताजी कही चले गए.

रोशन और दुलारी तो बहुत खुश हुए कि चलो दो से भले तीन !और यह नई दीदी काफी होशियार भी लगती है---कितने अच्छे ढंग से कपडे पहनी है,पैरों में हवाई चप्पल भी है.वे यह सोच कर काफी खुश थे कि नयी दीदी ढेर सारी कहानियां सुनाएगी ,बहुत सी नई -नई बातें बताएगी. पर यह क्या,जब से आयी है या तो रोते रहती है या गुमसुम रहती है.

इस दीदी का नाम क्या है?,कहाँ से आयी है यह दीदी?पिताजी ने कभी इसका जिक्र क्यों नहीं किया?.......,इत्यादि बहुत सारे सवाल उसके जेहन में तैर रहे थे. वह पिताजी से नहीं पूछ सका,सोचा क्यों ना सीधे दीदी से ही पूछ लिया जाए.पर दीदी के आँसू रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

दुलारी भी दीदी को रोते देखकर उदास थी लेकिन कुछ समझने की कोशिश कर रही थी.

आखिर वह हिम्मत करके नई दीदी के पास जाकर बोला;'बोलो ना दीदी,तुम क्यों रो रही हो?क्या भूख लगी है?तुम अभी तक कहाँ थी दीदी?नई दीदी ने सस्नेह नज़रों से उसे देखा पर बोली कुछ नहीं.दुलारी दो रोटियाँ और थोडा सा गुड लेकर आयी ,दीदी ने उसे अपने पास बैठा लिया पर स्थाई दर्द का भाव बना रहा.

रोशन और दुलारी अपने अनुभव से समझ गए कि पिताजी आज रात को घर नहीं लौटने वाले .ऐसी धुप्प अँधेरे में बच्चे दरवाज़ा खोल कर इधर-उधर ढूंढें ऐसा ना कभी हुआ था,ना आज जरूरत थी.कमरे के एक कोने में दिया जल रहा था बच्चों के लिए अभी यही सबसे महत्वपूर्ण बात थी.रोटी का एकाध टुकड़ा सबने निगला और बिस्तर पर लेट गए.नई दीदी को भी उसमें जगह मिल गयी.बच्चो ने फिर से दीदी से अपने बारे में बताने की जिद की, और इस बार दीदी ने मुंह खोला ;

मै अपने माता-पिता के सोनपुर मेला देखने आयी थी ,मेले में एक हाथी के सनक जाने के कारण भगदड़ मच गयी. मै अपने माता-पिता से बिछड़ गयी.लाखों लोगों के भीड़ में मैंने बहुत खोजा उन लोगों को लेकिन उन लोगों का पता नहीं चल सका.मेरे पिताजी के उम्र के एक आदमी ने मुझे आश्रय देने के लिए अपने घर चलने को कहा .आखिर रात तो कहीं काटनी थी सो मैं उनके साथ चल दी.लेकिन उन्होंने तुम्हारे पिताजी से पैसा लेकर मुझे बेच दिया.दूसरे दिन तुम्हारे पिताजी डरा धमका कर मुझे यहाँ ले आये.आज यहाँ आते समय तुम्हारे पिताजी ने रास्ते में ही एक और आदमी के हाथो बेचने के लिए मेरा सौदा पक्का कर लिया.कल दोपहर को वह आएगा और तुम्हारे पिताजी को पैसा देकर मुझे ले जाएगा.

रोशन बोल उठा ,'नहीं दीदी हम आपको कही नहीं जाने देंगे.दीदी आप हम लोगों को छोड़ कर कहीं नहीं जाइएगा. हमलोग उस आदमी को मार कर भगा देंगे. नई दीदी उसकी बात पर फीकी हँसी हँसकर रह गयी.

सुबह उठकर रोशन झाड़ियों की तरफ खेलने चला गया.एकाध घंटे बाद लौटा.उसके हाथो में पत्थर थे,ईंट का टुकड़ा था और एक डिबिया भी थी.

९ बजते-बजते वह नया खरीदार आ धमका.वह आदमी बेतकल्लुफी से कुर्सी पर बैठ गया औत अजीब-अजीब नज़रों से दीदी को घूरने लगा.

रोशन उठा , डिबिया खोला और उसे उस आदमी के बंडी के अंदर पीठ के तरफ उलट दिया.वह आदमी दर्द से बिलबिलाने लगा. समझ नहीं सका कि आखिर हुआ क्या,तभी रोशन तली बजा-बजा कर हँसने लगा और कहने लगा 'और ले जाओ मेरी दीदी को ,बिच्छू काट रहा है तब कैसा मज़ा आ रहा है.

वह आदमी बंडी उतारते हुए उठकर भगा वहां से पर जाते-जाते धमका गया 'छोडूंगा नहीं तुझे,पैसा खर्च किया है.देखता हूँ कब तक बचती है और कहाँ तक भागती है'

रोशन अपनी जीत पर खुश होकर फिर दोस्तों के साथ खेलने चला गया,शायद अपनी बहादुरी के किस्से सुनाने.

दुलारी भी तुरंत कोई विपदा नहीं देखकर रसोईघर के कामों में व्यस्त हो गयी.

खेलते-खेलते जब रोशन को भूख-प्यास लगी तब वह घर कि ओर दौड़ा.घर पर आकार उसने सबसे पहले नयी दीदी को ढूँढा. कहीं अता-पता नहीं चला.दुलारी से पूछा,दोनों मिलकर खोजने लगे,पर पता नहीं चला.दोनों का मन घबराने लगा.घर से बाहर खोजा,चारो तरफ खोजा ,कही पता नहीं चला.

जब वह बहुत उदास होता था तो नदी के किनारे जाकर बैठ जाता था.----घंटों एकांत में.आज भी वह नदी के किनारे की तरफ चल दिया.नदी के तट जाते ही उसे दिखाई दिया कि दीदी नदी के अन्दर की तरफ बढ़ते जा रही है.वह पूरा जोड़ लगाकर चिल्लाया 'दीदी!आगे मत बढ़ो दीदी! लौट आओ.लौट आओ दीदी.दीदी.....दीदी........

लेकिन दीदी तो जैसे सुन ही नहीं रही थी.एकबार मुड़कर भी नहीं देखा दीदी ने .वह चिल्लाता रहा पर दीदी बढती रही.धीरे-धीरे कमर तक फिर कंधे तक और फिर गर्दन तक पानी में दूब गयी.फिर अहिस्ता-अहिस्ता नज़रों से ओझल हो गयी.वह वही पर बैठ कर बुक्का -फाड़ कर रोता रहा.

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कविता

मुखर-मौन

मौन ही संवाद है,

शब्द,अर्थ और अनुभूति

सारे उसके बाद है.

मूक निगाहें,निशब्द याचना

पलकों का उठना

होंठ विलगना

बिना शब्द विचार तरंगे

अश्रुपूरित नयन

यमुना और गंगे

यहीं थमी है पूरी श्रृष्टि

बस यही तो ब्रम्ह-नाद है.

यह विफलता भावों की है

गर शब्द-प्रयोग जरूरी है.

मौन अगर हो पायी मुखर तो

तुम्हे कोटि-कोटि धन्यवाद है.

नोट --शब्दों से तो प्राय

अर्थ का अनर्थ हुआ है,

दिल से अगर निकले तो

खामोशी भी एक दुआ है.

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

5 blogger-facebook:

  1. बेनामी4:23 pm

    excellent story and elobrating the past chapra and current chapra

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  2. humko to pata hi nahi tha ki aap itna acha kavita bhi likh sakte hai...and story is too emtional...keep it up chacha..proud to be a own bhatija....

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  3. humko to pata hi nahi tha ki aap itna acha kavita bhi likh sakte hai...and story is too emtional...keep it up chacha..proud to be a own bhatija....

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