मनोज अग्रवाल की ग़ज़लें

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(1)

जुर्म आपका बेहद संगीन है हुजूर,

इसीलिए आप चैन से सोये हैं हुजूर।

 

इक कंकाल मरा है रियासत में आपकी,

फिर भी आपकी रात रंगीन है हुजूर।

 

वायदों की फसल लहलहा रही है देश में,

आपके चेहरे पर भी हरियाली छाई है हुजूर।

 

इक चोर को सब साहूकार लूट ले गये,

सब कुछ ठीक आपकी रहनुमाई में है हुजूर।

 

सिले हैं सब जुबान आंखें भी बंद हैं,

बहुत वफादार आपकी फौज है हुजूर।

 

इस अभागी जनता से जुड़े हुए हैं आप,

आपकी जर्रानवाजी का गजब नमूना है हुजूर।

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(2)

कैसे नए-नए अर्थ ये बनाने लगे हैं,

कि नीम को मीठा बताने लगे हैँ।

 

जिंदगी की बातों को नारों में दबा,

गड़े मुर्दों को फिर से जिलाने लगे हैं।

 

अधर में महल बात धरती की कर,

ये लोगों को फिर फुसलाने लगे हैं।

 

जबानी जमा खर्च से काम कैसे चले,

बिना समझे ये नाटक दिखाने लगे हैं।

 

ग्यारह घोड़ों पे फिर भी कहें एक हैं,

बेढब गणित ये सबको सिखाने लगे हैं।

 

कैसे लोगों को ये सब स्वीकार हो,

लाश सिद्धांतों की जब ये जलाने लगे हैं।

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(3)

नेवले भी सर्प का करने लगे गुणगान है,

आज के युगधर्म की बस सही पहचान है।

 

मरूथलों में हरियाली का वे दावा करें,

अपनी हालत %यों गुलामों की कटी जुबान है।

 

हर तरफ सुख-शांति का झण्डा गड़ा रखे हैं वे,

और हालत ये कि वे खुद एक कब्रिस्तान हैं।

 

खुद बने हैं आप आका मुफलियों के,

हर तरफ बिखरे हुए बस अखबारी बयान हैं।

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(4)

जब से जिंदगी के सूरजमुखी उसूल हो गए,

हमको जीने के सभी रास्ते कुबूल हो गए।

 

स्वार्थ के तराजू में तौला जबसे जीवन,

हुक्काम तो क्या अर्दली भी जी-हुजूर हो गए।

 

परजीवी बनकर फैलाए जब स्वार्थ-पाश,

तिरस्कृत सब शिखंडी बेहद करीब हो गए।

 

कौवे की जाति से नाता जब जोड़ लिया,

कोयल की भाषा से बहुत दूर हो गए।

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मनोज अग्रवाल

मुंगेली,जिला-बिलासपुर

छत्तीसगढ़

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1 टिप्पणी "मनोज अग्रवाल की ग़ज़लें"

  1. स्वार्थ के तराजू में तौला जबसे जीवन,
    हुक्काम तो क्या अर्दली भी जी-हुजूर हो गए।

    अच्छा प्रयास। बेहतर।

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