संजय दानी की ग़ज़ल - तेरी जुल्फ़ों की फ़िजाओं से घिरा हूँ...

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तेरी ज़ुल्फ़ों की फ़िज़ाओं से घिरा हूं
बेअता बारिश को सजदे कर रहा हूं।


ये मुहब्बत भी अंधेरी इक गली है ,
ठोकरें खाने अकेले चल पड़ा हूं।


तेरी आंखों की नदी भी बेसुकूं है ,
दर्द के दरिया में फ़िर भी डूबता हूं।


कब मिलेगी दीद मुझको बेरहम की,
मैं पतंगा, शमा के घर पे खड़ा हूं।


फ़िर चरागों का हवाओं से मिलन है,
क़ब्र अपना ,अपने हाथों खोदता हूं।


आंखों पे काजल लगाया ना करो ,
मैं उजालों की निज़ामत में फ़ंसा हूं।


सरहदों की बंदगी से  मै डरूं क्यूं ,
दुश्मनों के कारवां से जा मिला हूं।


वो दग़ाबाज़ों के मंदिर में फ़ंसी है ,
मैं वफ़ा की राह में तन्हा हुआ हूं।


सुर्ख़ तेरे व्होंठ माशा अल्ला दानी ,
फिर नदी के तट पे प्यासा मरा हूं।

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5 टिप्पणियाँ "संजय दानी की ग़ज़ल - तेरी जुल्फ़ों की फ़िजाओं से घिरा हूँ..."

  1. वो दग़ाबाज़ों के मंदिर में फ़ंसी है ,
    मैं वफ़ा की राह में तन्हा हुआ हूं।
    bahoot sunder,as usual.

    उत्तर देंहटाएं
  2. amita6:30 am

    फ़िर चरागों का हवाओं से मिलन है,
    क़ब्र अपना ,अपने हाथों खोदता हूं।
    bahut khub likha hai.........

    उत्तर देंहटाएं
  3. विजय जी , सुशान्त जी और अमीता जी का आभार।

    उत्तर देंहटाएं

  4. सुर्ख़ तेरे व्होंठ माशा अल्ला दानी ,
    फिर नदी के तट पे प्यासा मरा हूं।

    वाह...

    उत्तर देंहटाएं

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