रविवार, 13 फ़रवरी 2011

दीनदयाल शर्मा की कविता - माँ

माँ

Deendayal Sharma & Maa Mahadevi Joshi (Custom)

अठारह जनवरी ग्यारह को,

चली गई थी माँ।

बचपन मेरा ले गई,

मुझे बड़ा कर गई माँ।।

 

दीनू दीनूड़ा दीनदयाल, 

कह पुकारती थी माँ।

गोद में सिर टेकता,

तो दुलारती थी माँ।।

 

इक माँ ही गुरु थी मेरी,

सच्ची राह दिखाती थी।

करता था गिले-शिकवे,

तो मुझे समझाती थी।।

 

तेईस जनवरी दस को,

इक भाई चला जवाँ।

बेटे के बिछोह से,

तब भर गई थी माँ।।

 

इक साल सदमा ढोया,

ना सहन पाई माँ।

दिल बिंध गया था उसका,

थे रह गये निशाँ।।

 

बारह मार्च छ: की भोर,

पिताजी चले गये।

कहती थी मुझे छोड़कर,

वे चले गये कहाँ।।

 

साथी से पलभर कभी,

न दूर हुई थी माँ।

अब चली गई है माँ,

अनाथ कर गई है माँ।।

---

-दीनदयाल शर्मा,

बाल साहित्यकार

7 blogger-facebook:

  1. दीनदयाल जी यह रचना उनके ब्लॉग पर भी पढ़ी थी ....आज फिर पढ़ी आँखें नम हो जाती हैं ऐसी रचना पढ़कर ...... साझा करने का आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. कोई भी दूसरा अहसास और कुछ भी अन्य मातृ-भाव की बराबरी नहीं कर सकता। ईश्वर मातृ-शोक को सहने की शक्त्ति प्रदान करे।
    बड़े प्रभावी ढ़ंग से शोक को प्रकट किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ma k ahsas sy hi sari parsaniya dur ho jati h.ma pas hoti h to lagta h ki kei bda shara mil gya h. jb ma nhi hoti ya es nasvar sansar ko beda kar jati h tab lagata h ki ham byshara ho gy h. dendyal ji ki rachna yhi samvdna vyakt karti h.
    vipin vishnoi, bhopal mp

    उत्तर देंहटाएं
  4. rachana10:37 pm

    kavita hai ya pura granth.sneh ka ye dariya sa bah gaya hai aap ki kavita me.
    bahut suder kavita hai
    badhai
    saader
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  5. अमिता2:56 am

    माँ के आँचल में सब दुःख, परेशानिया गायब हो जाती हैं और जब वही आँचल गायब हो जाये तो दुःख असहनीय हो जाता है. उस दुःख को दर्शाती सुंदर कविता है.
    सादर
    अमिता

    उत्तर देंहटाएं
  6. दुःख साझा करने का आभार.....

    उत्तर देंहटाएं

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