सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

एस के पाण्डेय का व्यंग्य : नार्थ इंडियन

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रामू को अपने घर-प्रदेश से बहुत दूर एक छोटी सी नौकरी मिली। सुदूर दक्षिण में, जहाँ न कोई उसका मित्र था और न ही शत्रु, जाने से पहले उसने सोचा कि ‘ईश्वरः सर्वभूतानां’। अतः परेशानी की बात नहीं है। जाने के पहले मम्मी ने टोका कि बेटा उतनी दूर जा रहा है। वहाँ तेरा कोई नहीं है। ठीक से रहना। रामू ने अपनी आदत के मुताबिक ऊँगली ऊपर उठा दी। मम्मी को रामू का तकियाकलाम याद आ गया। यानी ऊपर वाले और कौन ? चक्रधारी ! रामू मम्मी को प्रणाम करके चल दिया।

इस दुनिया में एक अच्छा मित्र बना पाना अथवा मिल पाना कठिन होता है। परन्तु एक शत्रु बनाना अथवा शत्रु का मिल जाना बहुत आसान होता है। बहुत से लोग नाहक ही शत्रुता करने लगते हैं। कुछ लोग मित्र बनकर शत्रुता निभाते हैं और कुछ लोग शत्रु बनकर। पहले कोटि वाले शत्रु ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं। और आज के समय में बहुतायत मिलते हैं। रामू को भी ऐसे ही दो मित्र मिल गए। जब अपने गाँव-घर में ही तमाम शत्रु होते हैं। तो किसी सुदूर प्रदेश में, जहाँ बहुत से लोग क्षेत्रवाद और भाषावाद जैसे रोगों से पीड़ित हों, शत्रु का मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

रामू के ये दो मित्र उसकी मदद करते थे। जिसमें मित्रता के कारण मदद कम, परन्तु यह दिखाने के लिए बहुत की जाती थी कि हम लोग बहुत नेक हैं। पर ये नेक लोग रामू को उसके सामने ही अपनी भाषा में गाली देते थे। जिससे सभी लोग हँसने लगते थे। जब रामू कुछ जानने की कोशिश करता तो इसको समझा देते कि हम लोग इन्जॉय कर रहें हैं। ‘वी आर जस्ट जोकिंग’। आपके बारे में कोई बात नहीं चल रही है।

धीरे-धीरे रामू को कुछ संदेह होने लगा। इसके अलावा भी बहुत सी बातें उसे अखरती थीं। इसलिए वह न बहुत पास और न बहुत दूर के सिद्धांत पर चलने लगा। यानी अपने काम से काम रखने लगा। कोई बात करना चाहता तो उससे बात करता अन्यथा चुपचाप ही रहा करता था। विभाग में कोई आ जाय तो सभी लोग उसका परिचय सबसे पहले यह बता कर देते थे कि यह बाहरी है। यहाँ का नहीं है। नॉर्थ-इंडियन- यू पी वाला। लोग नॉर्थ इन्डियन इस लहजे में कहकर मुस्कराते कि रामू को लगता कि वह न ही इंडियन है और न ही इंडिया में है।

लोग अक्सर उससे पूछते कि यहाँ कैसे आ गए ? क्या वहाँ काम नहीं है ? रामू कहता कि काम तो बहुत है। लेकिन मैं यहाँ आना चाहता था। मुझे भारत बहुत पसंद है। मैं इसके हर कोने में जाना चाहता हूँ। रहना चाहता हूँ। भले ही थोड़े दिन ही सही। लोग तो विदेश भी घूमने जाते हैं। लेकिन मैं सोचता हूँ कि कम से कम अपना देश तो घूम लिया जाय। अपने को जानो नहीं और चल दो दूसरे से पहचान बढ़ाने । पहले खुद को देखो तब दूसरे को। मेरा यही मानना है। भारत में क्या नहीं है ?

लोग पूछते कि आपको कैसा लगा यह प्रदेश ? रामू कहता कि बहुत अच्छा, मैंने कहा नहीं कि मुझे पूरा भारत पसंद है। लोग पूछते कि यहाँ के लोग कैसे लगे ? रामू कहता कि बहुत अच्छे। मैंने पहले ही सुन रखा था कि यहाँ के लोग बहुत मिलनसार हैं। सभी का सामने मुस्कराकर स्वागत करते हैं। वे कहते कि लोग यही इम्प्रेशन यहाँ से लेकर जाते हैं। रामू मन में सोचता कि दो-चार दिन अथवा महीने भर के लिए जो आएगा। वह क्या जानेगा ? वह अच्छा इम्प्रेशन लेकर जायेगा ही। सच ही कहा गया है कि किसी को समझना हो तो उसके बहुत पास रहकर समझो। एक नजर में देखने का प्रयास मत करो। नजरें धोखा खा जाती हैं।

धीरे-धीरे रामू के इन मित्रों को खासकर दो मित्रों को भी यह आभास होने लगा कि यह कुछ अलग-थलग रहता है। विभाग में इन दोनों की ज्यादा चलती थी। एक दिन रामू काम पर था। ये दोनों लोग आये। आते ही प्रश्न किया कि अगर तुम्हें यहाँ कुछ हो गया तो कौन मदद करेगा ? यह यू पी नहीं है। रामू बोला कि मुझे कुछ नहीं होगा। वे बोले मान लो कुछ हो गया तो। रामू ने वही उत्तर दुहराया। वे बोले ज्यादा आशावादी न बनो। ‘टेल मी हूँ विल हेल्प यू’। टेल! टेल ! रामू इस बार कुछ नहीं बोला। उसने बस अपने हाथ की एक ऊँगली ऊपर उठा दिया। उनके चेहरे के रंग उड़ गए। उन्होंने जो सोचा था, वह उत्तर नहीं मिला। रामू ने कुछ समय बाद काम छोड़ दिया।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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2 blogger-facebook:

  1. डॉ एस के पाण्डेय जी!
    आपने इस व्यंग्य में क्षेत्रवाद की समस्या को लक्ष्य किया है। व्यंग्य लेखन के लिए साधुवाद! व्यंग्य को रण-मूलक लेखन कहा गया है। यह अन्याय के खिलाफ एक युद्ध है। असंअगतियों-विसंगतियों को बढ़ावा देने वाले तत्वों के लिए मुंहनोचुवा है। पाठकों को जागरूक कर संघर्ष के लिए अभिप्रेरित करना इसका निहितार्थ है। व्यंग्य की कचोट और कुरेद का तीखा और मार्मिक होना स्वाभाविक है। समाज में कुछ ऐसे भी असमाजिक तत्व होते हैं जो पर्दे के पीछे रह कर कानून को अपने पाँव तले रखते हैं। व्यंग्यकार शब्दों की घेराबंदी करके उन्हें जन-अदालत में खड़ा कर वगलें-बगलें झाँकने पर मजबूर कर देता है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक दौर में कबीर ने इस काम को बाखूबी से किया। व्यंग्य को नुकीला और पैना बनाना व्यंग्यकार की साधना का अंग है। इससे उनकी चोट बड़ी मारक बनती है। शब्दों की मितब्ययता के चमत्कार को व्यंग्य में ’विट’ कहा गया है। यह व्यंग्य का प्राण-तत्व है। मंगलकामनाओं सहित....।
    सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

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  2. ब्यंग पढ़ कर बहुत अच्छा लगा धन्यवाद|

    आप को बसंत पंचमी की शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं

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