गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

दामोदर लाल जांगिड़ की कविता - तराशा हुआ पत्थर

तराशा हुआ पत्‍थर

tarasha hua bhagwaan

तुझे कितने परिश्रम से तराशा था अरे पत्‍थर।

बड़ी उम्‍मीद थी आखिर बना दूंगा तुझे ईश्‍वर ॥

रहा पत्‍थर तू पत्‍थर अहा! किससे पड़ा पाला,

किसी शिल्‍पी के सपनों का तो शैशव ही कुचल डाला।

 

गड़ा हैं सरहदों पर जो अरे वो भी तो पत्‍थर हैं।

मिटाता हैं विवादों को तुम्‍हारे से तो बेहतर हैं।

मगर तू हैं जो बनता हैं फसादों का सबब आला।

किसी शिल्‍पी के सपनों का तो शैशव ही कुचल डाला।

 

लगा हैं भोग का चस्‍का सुबहो औ शाम ले लेता।

फ़क़त कुछ आंसुओं के और तू कुछ भी नहीं देता॥

दिलासा दे के हर याचक को खाली हाथ ही टाला।

किसी शिल्‍पी के सपनों का तो शैशव ही कुचल डाला।

 

तुम्‍हें अभिशाप देता हूँ कहीं तू काम ना आये।

नदी के धाट का या मील का पत्‍थर न बन पाये।

किसी प्राचीर में लग कर बनेगा तू न रखवाला।

किसी शिल्‍पी के सपनों का तो शैशव ही कुचल डाला।

--

दामोदर लाल जांगिड़

3 blogger-facebook:

  1. इस कविता को तो विशेष तौर पर लखनऊ भेजना चाहिए, काफी मार्मिक बात कह दी|

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  2. EK PATTHAR JISAKO ME SAZADA KAROON,
    EK PATTHAR JISAKO BOLOON KYON ARE PATTHAR 1

    उत्तर देंहटाएं

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