मनोज अग्रवाल की कविता - मेरा पुण्य

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मेरा पुण्य

अंधेरी रात में जब भी

किसी चौराहे के बिजली के खंभे की

लंबी लकीर की ओट में खड़ा

मैं, प्रकाश को बीनता रहता हूं.

मुझे लगता है मैं पुण्य कर रहा हूं.

 

किसी ठंडी रात में

अविश्वास की ठंड से ठिठुरते

असंय लोगों पर जब मैं

विश्वास का कंबल

नीले आसमान सा

फैला देता हूं,

तब मुझे लगता है मैं पुण्य कर रहा हूं.

 

किसी एक पथिक को,

जिसे हर चौराहा अपनी मंजिल लगता है.

हर चमकता हुआ कांच का घर

सूरज का घर लगता है.

चौराहों से बचाते हुए

संकीर्ण कंटकमय रास्ते से

उसकी मंजिल तक पहुंचाता हूं,

तब मुझे लगता है मैं.............

 

दानवता के हाथों मसली गई कलाई की चूड़ियाँ

जो टूट-टूट कर बिखरी पड़ी है.

जब कभी उसे फिर से संजोता हूं,

चटकी हुई हड्डी पर प्लास्टर बांधता हूं.

हमदर्दी नहीं दिखाता

तब मुझे लगता है मैं.............

 

हर वृक्ष की फुनगी,

पुष्प, कलियों पर बैठ

जब भी मैं उन्हें भोर होने की सूचना देता हूं.

मुर्गे की तरह बांग कर नहीं

हौले से

यदि समझे तो इशारे से,

तब मुझे लगता है.........

 

किसी तराशे हुए पत्थर को

मंदिर में न रख कर

मानवता की बुनियाद के लिए

जब भी मैं सहेजकर रखता हूं

मुझे लगता है मैं पुण्य कर रहा हूं.

 

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-मनोज अग्रवाल

03/02/2011

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(चित्र - नीरज अहिरवार की कलाकृति)

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1 टिप्पणी "मनोज अग्रवाल की कविता - मेरा पुण्य"

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