मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : बाजारवाद का घोड़ा

हे विकासशील देश के पिछड़े नागरिकों ! सामान खरीदो और खाओ। खाओ पिओ और ऐश करो बाजारवाद का घोड़ा अश्‍वमेघ यज्ञ की तरह दौड़ रहा है। घोड़े की सवारी करना आसान काम नहीं है। अच्‍छे अच्‍छे सूरमा भोपाली धूल चाटते नजर आते है। सर्वत्र बाजारवाद हावी है। बाजार ने सब कुछ बिकाउ माल कर दिया है। आप खरीदे या नहीं बाजार आप के घर में घुस गया है। बाजारवाद रेडियो, टी․वी․ अखबार, इन्‍टरनेट सभी के सहारे आपके जीवन में जहर घोल रहा है।

आप माचिस खरीदने जाते है तो सिगरेट या बीयर आपके गले पड़ जाती है। बाजार पर हावी है बाजार के माफिया, बिक्री माफिया, परचेज माफिया, भूमाफिया, शराब माफिया चमचे माफिया, दवा-माफिया, सरकारी माफिया, गैर सरकारी माफिया, यहाँ तक कि देह -व्‍यापार के माफिया लोगों ने पूरे बाजार को कब्‍जे में कर लिया है। वे सारे साधनों से आप पर हमला कर रहे हैं, आपको क्रेडिट कार्ड, डेबिटकार्ड, लोन, इएमआई के सपने दिखा रहे हैं। खरीदो आप पूरे बाजार को खरीदो। घर को गोदाम बना लो। शोप एलकोहोलिक बन जाओ। कुछ नहीं चाहिये मगर खरीदना पड़ेगा, बाजारवाद सबको खरीदने के लिए मजबूर कर देता है। बाजार ने हमारे मन छोटे कर दिये हैं। और बाजार बड़े है लेकिन दिल छोटे हैं मैं कहता हूं बाजार से गुजरा हूँ मगर खरीदार नहीं हूँ, मगर मेरी कोई नहीं सुनता। सब मुझे नोचने को तैयार खड़े हैं।

किसी भी माल, शोरुम, बड़े बाजार में चले जाईये, हर तरफ खरीदार और बेचने वाले माफिया आप के इर्द गिर्द मण्‍डराने लग जाते हैं नहीं खरीदना चाहते तो बाजार में क्‍या झक मार रहे हो। एक ने कहा, बाबूजी आपका समय गया अब जीवन पद्धति बदल गई है सब बाजारवाद के मारे हैं। अब तो बाजार ही सब कुछ है।

वास्‍तव में बाजारवाद हमारी संकीर्ण मनोवृत्‍ति को दर्शाता है। हर व्‍यक्‍ति स्‍वयं को बेचने के लिए बाजार की तलाश में बाजार में ही भटक रहा है। बेचो खुद को भी बेचो। बाजार साम्राज्‍य बनाते है और साम्राज्‍य बाजारों को ढूंढते रहते हैं। पूंजीवादी प्रजातंत्र की जरुरत है बाजारवाद। अपने व्‍यापार, उद्योग, फेक्‍टरियों, हथियारों को नियमित चलाये रखने तथा बेचने के लिए बाजार आवश्‍यक है। रोज सुबह उठ कर ये व्‍यापारी बाजार ढूंढने निकल पड़ते हैं। उन्‍हें पूरी दुनिया एक बाजार नजर आती है। वे हर किसी को हर कोई चीज बेचने की क्षमता रखते हैं।

बाजारवाद का आकाश अनन्‍त है,असीम है। जो यूरोप में नहीं बिका वो एशिया में बिक जायेगा। जो एशिया में भी नहीं बिका वो अफ्रीका में या लातिन अमरीका में बिक जायेगा। इस सदी का चरम और परम सत्‍य है बाजारवाद। उत्‍तर आधुनिक काल में सब कुछ बाजार है। साहित्‍य, कला, संस्‍कृति, प्‍यार, घृणा, युद्ध, शान्‍ति, देह, ईश्‍वर शैतान, देवी, देवता, भगवान, आत्‍मा शरीर, लोकसंस्‍कृति, भाषा, अक्षर, शब्‍द, नैतिकता, धर्म, अहिंसा, करुणा, गृहस्‍थ, वैराग्‍य, साधुत्‍व, सन्‍तत्‍व, सन्‍यासीत्‍व, स्‍त्रीत्‍व, सतीत्‍व सब बाजार है। सब बाजार के हवाले है, हम सब बाजार है यहाँ तक कि ये व्‍यंग्‍य भी बाजार की मांग के अनुरुप है। क्‍या ख्‍याल है आपका।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

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