सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1

 

खरपतवारें पाली बाबा।

अज़ब अनाड़ी माली बाबा॥

 

टिड्डे बैठे पात पात पर ,

उल्‍लू डाली डाली बाबा।

 

कुटिल बिल्‍लियां यहां दूध की,

करती हैं रखवाली बाबा।

 

दूनिया बड़ी निराली बाबा ,

अपनी देखी भाली बाबा।

 

भरी रहे र्निनाद हमेशा,

बजती हैं बस खाली बाबा।

 

कहां रखी रहन किसी ने ,

हर घर की खुशहाली बाबा।

 

पाचन तंत्र सुदृढ़ इतना कि ,

वो लेते नहीं जुगाली बाबा।

 

छलनी जैसी कर बैठेगा ,

वो अपनी ही थाली बाबा।

 

धवल वेश में छिपा रखी थी,

कुत्‍सित काया काली बाबा।

 

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ग़ज़ल 2

क्‍यों आस्‍थाएं दे रही आख्‍यान लड़की ।

कि आज भी दुनिया में हैं भगवान लड़की ॥

 

ये चूड़ियां हैं बेड़ियां नादान लड़की ,

मत बिन्‍धाओ नाक और ये कान लड़की ।

 

नहीं हैं मूंछ ढ़ाढ़ी मर्द की पहचान लड़की ,

वही हैं मर्द तो जो दे तुम्‍हें सम्‍मान लड़की ।

 

सिन हो कमसिन तो कहां इरफान लड़की ,

उत्‍फाल तो हैं नासमझ नादान लड़की ।

 

तू दुख्‍तरे हौवा हैं नातुअरन लड़की ,

हैं वाग्‍देवी तुझपे मेहरबान लड़की ।

 

क्‍यों लोग हैं तुझको पराया धन बताते,

तू बाप की दहलीज की हैं आन लड़की।

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