गुरुवार, 31 मार्च 2011

प्रमोद भार्गव का आलेख : विकीलीक्‍स - मुखौटे उतारने का माध्‍यम

  विकीलीक्‍स एक ऐसी मजबूत तकनीक के रुप में उभर रही है, जो बिना कोई अर्जी लगाए ‘सूचना के अधिकार' का दायित्‍व निर्वहन करती नजर आने लगी ...

अंतस सिंग की प्रेम कविताएँ : नारी पथ भटक गई है...

नारी पथ तुम कभी समानता की बात करती हो तो कभी बदलाव की ... या कभी मर्दों से कंधे से कन्धा मिलाने की ... पर जब में कहता हूँ कि आज सब्जी बा...

प्रमोद भार्गव का आलेख : पुलिस को मानवतावादी बनाने की जरूरत

हाल ही में दिल्‍ली की एक अदालत ने एक न्‍यायसंगत फैसला सुनाते हुए पुलिस का चेहरा बदलने की कोशिश की है। भ्रष्‍टाचार और निर्ममता से पुलिस ये द...

बुधवार, 30 मार्च 2011

सुमित शर्मा की कविता - बचपन

बचपन रेत गिट्टी, ईंट मिट्टी, और तपती धूप तले, झुलसता हुआ बचपन कोई मैं देखता हूँ।   सावन मनभावन, निर्मल जल पावन, और किसी टूटी टपरिया तले,...

सोमवार, 28 मार्च 2011

अमिता कौंडल की कविताएँ

१. लगाने को अपना इक वन सुंदर सा इक मेरा गाँव  पर्वत के आँचल में  चारों और से घिरा हुआ था  हरे भरे वृक्षों से  मेरे मुन्ने को भाते थे  वृक्...

रविवार, 27 मार्च 2011

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की रचनाएँ

टूट गया बंजारा मन ----------------------------   माना रिश्ता जिनसे दिल का दे बैठा मैं तिनका-तिनका   दिल के दर्द,कथाएँ सारी रहा सुनाता ...

शनिवार, 26 मार्च 2011

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता - रोशनी एक वहम...

रोशनी.......एक वहम! सिर्फ अंधेरा..... कई रंगों, कई रूपों में जी हाँ सिनेमा का यही रूप है। सिनेमाई सरोकार की अनूठी पहल गंदामी रंग के कपड़े ...

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

नन्‍दलाल भारती की कहानियाँ

परमार्थ मुरली-क्‍यों मुंशी भईया माथे पर चिन्‍ता और मुट्‌ठी भर आग लिये बैठे हो। कोई नई मुश्‍किल आन पड़ी क्‍या ? मुंशी-मुरली जमाने ने तो म...

यशवन्त कोठारी का आलेख - देह व्‍यापार-विवेचन

इनसाइक्‍लोपेडिया ब्रिटानिका के अनुसार देह व्‍यापार का अर्थ है मुद्रा या धन या महंगी वस्‍तु और शारीरिक सम्‍बन्‍धों का विनिमय। इस परिभाषा मे...

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा लिखित नया भारतीय अराष्ट्रगान

यहां डाल डाल पर रिश्‍वत और दलाली करे बसेरा। अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥   रहे विपक्ष में तब तक है सब सीधे और सयाने। हाथ लगी कुर्सी जिसके भी ...

लक्ष्मीकांत की ग़ज़ल - झुलस रहा है जिगर सर्द चांदनी में

ग़ज़ल 000 हज़ार ज़हमतें हैं यार ज़िन्‍दगी में तमाम ग़म भी छुपे रहते हैं खुशी में   लुका-छुपी का खेल खेलते रहे हरदम कभी तो आ के मिलो मुझसे...

गुरुवार, 24 मार्च 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता - याद आई बीती बातें

      बीती बातें बीते बरस सैकड़ा भर अभी तक नहीं भूला पर | बना रेत का घर घूला , जो थोपा था पंजों पर |   आया शाला से पैदल , झड़ी लगी थी झर...

आर. के. भारद्वाज की लघुकथाएँ

विकास जिस बस्‍ती में मैने अपना झोंपड़ा बनाया है वह अभी विकास की भ्रूण अवस्‍था में है, न बिजली-पानी, न नाली न सड़कें, न फोन, न सीवर लाइन, ल...

विजय वर्मा की ग़ज़ल - बातों बातों में छलने का मौसम है...

    ये मौसम  बातों-बातों में छलने का मौसम है, सर्द-आहों से पिघलने का मौसम है.   झूठ है,फरेब है ,दगा है ,बेईमानी है. आप अब तक बचे है,ये क्य...

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' के दोहे : बड़े-बड़ों की होलिका, कपड़े रही उतार..

तारकोल, कीचड़ सने, चेहरे रूप-कुरूप. होली में सब एक-से, रंक, भिखारी, भूप.. धो सकती है होलिका, सबके मन का मैल. पर धुलने की क्या कहें, और रहा...

बुधवार, 23 मार्च 2011

मालिनी गौतम की रचनाएँ

क्रिसमस ट्री जन्मदिन पर मिले बहुत से तोहफों में एक तोहफा था-‘छोटा सा क्रिसमस ट्री’ बड़े चाव से एक छोटे से गमले में मैनें उस पौधे को लगाया।...

अशोक गौतम का व्यंग्य : संकटमोचक भी अब हारो!

यों ही सोचा जैसे अकसर सोचा करता हूं कि वे आए हैं तो मेरे संकट हरने ही आए होंगे। सच कहूं जबसे होश संभाला है तबसे संकटों से ही दो चार होता र...

पुरुषोत्तम व्यास की कविता - सुना सुना

सुना सुना मन ही मन में बुना बुना मन ही मन में खोये खोये विचार चल रहे अपने आप में अथाह धधकती आग भड़की नस नस में अभाव का घरोंदा विचलित सा...

शेर सिंह की लघुकथा - पुण्‍य लाभ

तीर्थ स्‍थली पुरी में भगवान जगन्‍नाथ के उस बहुत बड़े मंदिर में जा कर, उस ने जहां कहीं भी मूर्तियां, तस्‍वीरें और फल- फूल चढ़ाए हुए स्‍थान दे...

सी.पी. राजू का आलेख : भैरवप्रसाद गुप्त के कथा-साहित्य में बेरोज़गारी का चित्रण

  इक्कीसवीं सदी की ओर अग्रसर विज्ञानी मानव अनेक अभिशापों से ग्रसित है। बेरोज़गारी उनमें से एक भयंकर अभिशाप है। वर्तमान आर्थिक युग में जीविको...

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