गुरुवार, 3 मार्च 2011

परितोष मालवीय की कहानी - अधःपतन

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इधर कुछ दिनों से लछमना को अपने बड़े भाइयों ग्यासी और बड़ेदा की संगत में रोजाना पीने की आदत लग गई थी। शराब ही ऐसी चीज थी जो तीनों भाइयों को एक साथ ला देती। शाम होते ही तीनों भाई जुगाड़ में घूमते रहते। फसल तो चार महीने में एक बार आती है, पर यह जालिम शाम तो रोज ही आ जाती है। फसल पैदावार में हुई कमाई सूद चुकाने, कपड़े-लत्तों और तीजत्योहार में कब खत्म हो जाती है, पता ही नहीं चलता। तीनों भाइयों के खेत अगल-बगल ही थे। दरअसल उनके मेहनती बाप ने मरने के पहले अपने सामने ही खेतों का बटवारा कर दिया था ताकि उनके मरने के बाद बच्चों में जूतम-पैजार न हो।

शाम को पैसे की जुगाड़ में लगा लछमना दरवाजे पर आकर चिल्ला कर बोला - ऐ गोरी बाई की अम्मा, इतै आओ।

"तो चिल्ला के काए बुला रहे हो, कौन हम अबई से बहरे हो गए" - अपने तीसरे बच्चे घोषीलाल को खाट पर लिटाते हुए गौरा बोली।

"दारी तुमाओ मो आजकल जादा चलन लग गओ है। लिया पचास को नोट जो परसो दओ थो।" - लछमना बोला।

"कौन सो नोट। वो तो तबई खर्च हो गये थे, प्रभा की दवाई में "- गौरा ने उत्तर दिया।

"तोरे पास और भी हुइयें। जल्दी लिया, टैम नहीं है। " - लछमना झुझलाकर बोला।

"हमाये पास कौनऊ पेड़ लगो है जीमे पैसा उगत। हमाए पास नइयां तुमाई दारू के लाने" - गौरा ने साफ मना कर दिया।

दारू की चाह में तमतमाये हुये लछमना ने गौरा की चोटी पकड़कर दो तमाचे रसीद कर दिये - "साली ! कौनऊ काम - धाम की तो है नइयां और जबान डेढ़ गज की। "

पैसे लेने में नाकाम लछमना वहाँ से चल दिया। गौरा ने खुद को संभालने से पहले रोते हुये बच्चों को ढ़ाढस बंधाया। रात को लछमना देर से लौटा, धुत्त। गौरा जाग रही थी, पर बच्चे सो गए थे। गौरा के बगल में लेटते हुए वह बोला - "का करें हम, तुमाओ मुँह इतनो चलत है कि हाथ नई रोक पाऐ। हम तुमे मारवो नहीं चाहत थे। "

पति के भावुक शब्दों से गौरा पिघल गई - "तुमसे कितनी बार कई है कि रोज कलारी नहीं जाऊ करे। पर तुम मानतई नईयां। इत्ते पैसा रोज बचाओ तो साल भर में घर पक्को हो जै।"

लछमना प्रणय मुद्रा में आते हुए बोला - "पैसन की चिंता तुम नई करो। कल देखियो।"

पति के दो मीठे बोल सुनकर गौरा पिघल गयी और इसके बाद गौरा व लछमना के चौथे बच्चे के आगमन की तैयारी हो गई।

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भाग्यवादी लोग तो भाग्य पर यकीन करते ही हैं, कर्मवादियों को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि मनुष्य के जीवन की सबसे पहली घटना यानि उसका जन्म ही विशुद्ध रूप से भाग्य के अधीन होता है। अपवादों को छोड़ दें तो परिवार विशेष में जन्म लेने मात्र से ही आने वाले पूरे जीवन का खाका खिंच कर तैयार हो जाता है। गरीब के घर पैदा होना एक ऐसा अभिशाप है जो जन्मभर साथ चलता है। सारा जीवन अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत रहते हुये निकल जाता है।

पियक्कड़ भूमिहीन मजदूर की लड़की गौरा की शादी सिर्फ बारह वर्ष की अवस्था में लक्ष्मण प्रसाद उर्फ लछमना से हो गयी थी। लछमना अपने तीन जीवित बचे भाईयों में सबसे छोटा था। गौरा का ससुराल उसके मायके की तुलना में दोनों ही दृष्टियों से समृद्ध था, खेती के लिये अपनी जमीन थी और अनगिनत नाते-रिश्तेदार। उसकी दोनों जेठानियों के सात - सात बच्चे थे और उन्होंने अभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी थी। उसकी एक विधवा ननद भी अपने दो बच्चों के साथ उसकी छाती पर मूँग दलने को हर समय उपलब्ध थी। शादी के एक माह के गुजरते ही उसे पति के लात-जूतों, जेठानियों के तानों की आदत सी होने लगी थी। रंगरूप और नैननक्श में गौरा को अपने से बेहतर पाकर उसकी दोनो जेठानियों में अचानक एकता हो गयी थी। गौरा को वे सिर्फ यह कहकर निरुत्तर कर पाती थीं कि उसके आने के पहले वे ही लछमना को खाना खिलाती रही थीं और यह अपेक्षा करती थीं कि गौरा उनके एहसान के इस बोझ के तले सदैव दबी रहे।

अगले दिन दोपहर को लछमना नई मोटरसाइकिल घर ले आया। घर पर आते ही उसने नोटों से भरा थैला गौरा के हवाले कर दिया। नोटों के बंडल देख गौरा बदहवास सी हो गई। घबराकर बोली - इतने पैसा कहां से लाए?

"रख ले। कल बैंक में जमा कराने हैं, और बाहर जाके देख। गाड़ी खड़ी है अपनी।"- लछमना इतराता हुआ बोला। गौरा दौड़ कर बाहर गई और वापस लौट आई। इससे पहले कि गौरा कुछ बोल पाती, लछमना ने नया मोबाइल सैट निकाला और गाना बजाने लगा। गौरा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो गया है। उसने फिर पूछा - "कहां से मिले पैसे"?

"आधो खेत बेच दओ, लालाजी ने खरीद लओ है।"- लछमना मोबाइल के बटन दबाते हुए बोला।

"तो फिर घर का काम कैसे चलै, खेती का ही आसरा है हम गरीबन को"- गौरा चिंतित होकर बोली।

लछमना तो जैसे कुछ सुनने को तैयार नहीं था। बोला - "बो सब तुम चिंता नई करो। खेती में का धरो है। सालभर में चार-पांच हजार की फसल होत है। ऊपर से दुनिया भर की परेशानी। तैयार हो जाओ, गाड़ी पे घूमन चलने है कि नहीं।"

गौरा कुछ चिंतित तो थी पर अपनी गाड़ी पर बैठकर घूमने का उसका पुराना सपना आज पूरा हो रहा था। अगले छह महीने तक लछमना को पैसों को लेकर कोई समस्या नहीं हुई। रोज शाम को दारू पीना और हर तीसरे चौथे दिन बैंक पहुँच कर पैसे निकालना ही उसका एकमात्र काम बचा था। कभी - कभी मूड हो जाता तो अंग्रेजी शराब भी आ जाती। जो थोड़ी बहुत जमीन बची थी, वह भी ऐसे ही पड़ी थी, बिना खेती के।

इधर गौरा अपने चौथे प्रसव की पीड़ा सह रही थी, उधर लछमना का कलारी पर झगड़ा हो गया। जिस रात गोबरधन पैदा हुआ, लछमना हवालात में था। उस पर दारू पीकर अशांति फैलाने और झगड़ा करने की धारा लगी।

यह भारतीय न्याय व्यवस्था की ताकत ही कही जाएगी कि आम जनता के मन मस्तिष्क पर कोर्ट - कचहरी का इतना भय व्याप्त है कि वहाँ चक्कर न काटने के नाम पर ज्यादातर फैसले कोतवाल साहब की अदालत में ही निपट जाते हैं। दो - चार हजार में लछमना भी बाहर आ गया...... बेदाग। ''जेल रिटर्न'' का तमगा मिल जाने से इलाके में उसकी धाक जम गई थी।

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सर्वेश्वर सक्सेना उर्फ लाला जी इस इलाके के पुराने प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। कहने को तो वे सरकारी महकमे के बाबू थे, पर पुश्तैनी जमीन - जायदाद के बल पर अपने को छोटा - मोटा जमींदार समझने लगे थे। वक्त -बे- वक्त लालाजी आसपास के लोगों को पैसे उधार देते थे। सूद समेत उधार न लौटा पाने पर वही होता था जो लछमना के साथ हुआ। उसकी लाखों की जमीन कुछ हजार में ही लालाजी की हो गई थी। आज सुबह से उनके घर पर सत्यनारायण पूजा की तैयारी चल रही थी, जो उनके द्वारा खरीदे गए नए खेत पर होनी थी।

कथा समाप्त होते ही पंडित जी ने लछमना को देखकर सब लोगों के सामने जोर से कहा - "आ गए छूट कर। मैंने कोतवाल साहब को फोन कर दिया था कि अपना ही आदमी है।"

हवालात से लौटने के बाद इलाके में लछमना का रौब बढ़ गया। वह भी अपनी हवालात यात्रा का वृतांत ऐसे सुनाता जैसे मैडल जीत कर आया हो। अब तक लछमना की पूरा धन समाप्त हो चुका था। शराबी आदमी के पास पैसा न होने का एक ही अर्थ होता है- घरवाली की पिटाई। साथ ही साथ नशे की लत में वह कोई भी काम कर सकता है।

अगले 7 - 8 वर्षों में लछमना की बाकी जमीन भी थोड़ी - थोड़ी करके बिक गई। अब वह पूरी तरह से खाली था- घर से, जमीन से, सेहत से और चरित्र से।

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नशे की लत में सबसे गंभीर बात यह हुई कि लछमना कुछ पैसे प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक गिर गया था। जल्द ही ऐसा समय भी आया कि पांच बच्चों का बोझ गौरा को दिन भर मजदूरी करके उठाना पड़ा। दिनभर की मेहनत के बाद शाम को लछमना की पिटाई और घर संभालना ही अब उसकी दिनचर्या थी।

आज शाम को तो हद ही हो गई। गौरा से पैसे बसूलने में नाकाम लछमना ने बेंत से उसकी पिटाई लगायी। खून से लथपथ गौरा रात को ही भागकर लालाजी के घर पहुँची। लालाजी ने देखते ही कहा - "आ गईं पिट के। अब यहाँ काहे आयी हो?"

गौरा ने बिलखते हुए कहा -"अब आपई का सहारा है लालाजी। तुमाए समझान से जे मान जै।"

लालाजी ने कड़क स्वर में कहा -"यहाँ आके रोने पीटने की जरूरत नहीं है। थाने जाकर रपट लिखवा दो। दो-चार दिन अंदर रहेगा तो साले का सब नशा उतर जायेगा।"

"थानेदार साहब बहुत बुरई मार लगात हैं। वो मर जै।" - गौरा रोते हुए बोली।

लालाजी ने फिरका कसा - "वाह री भारतीय नारी! फिर काहे रो रही हो। जाओ और पिटो उस दारूखोर से। पति की लातें खाकर सीधे बैकुण्ठ मिलेगा।"

गौरा देर रात घर पहुँची। घर में घुसते ही गौरा का स्वागत लछमना की गालियों से हुआ -"आ गई साली रंडी। कौन से खसम के पास गई थी इत्ती रात को।"

अपने चरित्र पर लगे लांछन से गौरा तिलमिला उठी। उसने भी लछमना की मर्दानगी पर वार किया - "तो तुम कौन काम के हो। बस तुमसे तो दारू पिलवा लो।" इतना सुनकर लछमना बिफर गया और घूंसे-लातें चलाने लगा।

प्रभा ने बीच में चिल्ला कर कहा - "दादा बहुत हो गई। बाई को छोड़ दे, नई तो ठीक नई हुइये।"

लछमना ने प्रभा को गालियां बकते हुए कहा - "मोए लग रहो है कि तै भी जवान हो गई। एकाध दिन तुमाओ भी नंबर आन वालो है।"

पर लछमना को रुकते न देख देख प्रभा, देवकी, घोषीलाल और गोबरधन अपने बाप पर टूट पड़े। प्रभा और घोषीलाल अब किशोरवय थे। उनसे पिटने के बाद कुछ ही देर में लछमना को यह समझ आ गया कि मार-पीट कर पैसे बसूलने के दिन अब समाप्त हुए।

चारित्रिक पतन एकाएक नहीं होता, वह भी धीरे-धीरे होता है। पतित व्यक्ति को कई बार यह पता नहीं होता कि वह पतन की राह पर है। प्रायः वह अपने गुनाह के लिए कोई बेहतरीन बहाना खोज कर रखता है। नशे के वशीभूत होकर यह पतन किसी भी हद तक जा सकता है। शेक्सपियर का कथन कि ''समय व्यतीत होने के साथ या तो हम पकते हैं या सड़ते हैं '', लछमना के बारे में बिल्कुल सटीक बैठता है। चोरी, मारपीट, ठगी के रास्तों से होता हुआ लछमना अब अपने नशे की पूर्ति के लिए अवैध शराब बनाने वाले गिरोह में शामिल हो गया था। इस खाते में भी वह पकड़ा गया और दो-चार दिन के लिए जेल हो आया। अब तो यह होने लगा था कि इलाके में किसी भी तरह की वारदात होने पर पुलिस लछमना को पकड़ कर ले जाती। बेचारी गौरा भावनाओं में वह कर दो-एक दिन में उसे छुड़ा लाती। गौरा पर थाने के दरोगा की नजर और नजरे - इनायत थी।

कई दिनों बाद जेल से छूट कर आया लछमना आज शाम से ही गौरा के आगे - पीछे चक्कर काट रहा था। गौरा अब उसे अपने पास नहीं फटकने देती। परंतु शरीर की भूख भी उन्माद का रूप धारण कर सकती है। परिणामस्वरूप गौरा फिर पिटी। कमरा भीतर से बंद होने के कारण कोई बीचबचाव भी नहीं कर सका। पर लछमना अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया। रात भर नशे में चूर वह गौरा और प्रभा को गालियां देता रहा।

दो-चार दिन से लछमना का कोई अता-पता नहीं था। गौरा को भी अब इसकी आदत हो गई थी। कुछ लोग उससे कह जाते कि अभी वह दारू के अड्डे पर मिला था तो उसे संतोष हो जाता कि वह हवालात में नहीं है और जिंदा है।

उस शाम जब गौरा घर लौटी तो प्रभा कोठरी के अंदर जमीन पर पड़ी तड़प रही थी। मुँह से निकलते झाग और गैस की बदबू से गौरा को यह समझते देर नहीं लगी कि उसने सल्फास खा लिया था। तब तक उसने दम नहीं तोड़ा था। गौरा ने उससे वजह पूछने की लाख कोशिश की पर प्रभा के मुँह से सिर्फ दादा......दादा.......ही निकलता रहा। इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, उसने तड़प - तड़प कर दम तोड़ दिया। गौरा ने रो - रोकर सबको यही बताया कि प्रभा अंतिम समय अपने पिता को याद करके कुछ बताना चाह रही थी।

चूंकि यह आत्महत्या का मामला था, इसलिए प्रभा को पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाया गया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में प्रभा के साथ मृत्यु के पूर्व बलात्कार होने की पुष्टि हुई। तब जाकर गौरा को समझ में आया कि मरते समय प्रभा उसे दादा-दादा कहकर क्या बताना चाह रही थी।

28.01.2011

लेखक परिचय:

नाम - डॉ. परितोष मालवीय

शिक्षा - एम. ए. (अंग्रेजी, हिंदी साहित्य),

पीएच.डी. (हिंदी), विषय - स्वातंत्र्योत्तर ग़ज़ल में पर्यावरण चेतना

जन्मतिथि - 18.12.1975

सम्प्रति - रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन, ग्वालियर में हिंदी अनुवादक (विगत 11 वर्ष से)

साहित्यिक योगदान - 1. समीक्षा पुस्तक एवं पत्र - पत्रिकाओं में 20 से अधिक अनुवाद, रचनायें व आलेख प्रकाशित,

2. “विष विज्ञान एवं मानव जीवन” नामक विज्ञान पुस्तक का हिंदी अनुवाद।

3. वैज्ञानिक साहित्य का बड़ी मात्रा में अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद

पत्राचार पता - पी.39/3, डिफेंस कॉलोनी, गांधीनगर, ग्वालियर (म. प्र.)

ई-मेल - malviyaparitosh@rediffmail.com

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    manjari
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  2. बेनामी8:38 am

    परितोष जी बहुत ही उम्दा लिखतें है आप |
    मुंशी प्रेमचन्द्र और यशपाल की याद दिला देते हैं |

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