मालिनी गौतम की कविता - बेशरम के पौधे

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besharam ke paudhe (Custom)

बेशरम के पौधे

कभी-कभी मुझे लगता है

कि मुझमें कहीं

अन्दर उगे हुए हैं

’बेशरम’ के पौधे !

 

ये पौधे बार-बार

सिर उठाकर

पूछते हैं

कुछ विचित्र से प्रश्न.......

वे प्रश्न जो

पूछना मना हैं

एक स्त्री के लिये !

 

वह स्त्री जिसकी

जुबान पर

लगा है ताला

सदियों से........

क्योंकि देवियाँ भी

क्या कभी बोलती हैं?

 

वे तो त्याग

समर्पण,प्रेम

और सहनशीलता की

मूर्ति होती हैं !

 

मैं भी बड़ी

कोशिश करती हूँ

इस देवी स्वरूप को

अपनाने की,

बार-बार कुचल देती हूँ

’बेशरम’ के पौधे

की फुनगियों को !

 

कानों में डाल

देती हूँ उँगलियां

ताकि सुन न सकूँ

वे प्रश्न, जो मुझे

मजबूर करते हैं

मेरे अस्तित्व को

तलाशने पर।

 

मजबूर करते हैं मुझे

देवियों की परछाइयों से दूर

सिर्फ एक स्त्री

बनकर जीने के लिये !

 

प्रश्नों के इस

कोलाहल को

बमुश्किल रोक पाती हूँ

एक-दो या

चार दिन!

और फिर से

फुनगियों में

सुगबुगाहट शुरू

हो जाती है,

 

नई कोंपलें

फूटने लगती हैं

कोलाहल उठने लगता है

हर बार पहले की

अपेक्षा अधिक तेज !

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डॉ. मालिनी गौतम

मंगलज्योत सोसाईटी

संतरामपुर-३८९२६०

गुजरात

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4 टिप्पणियाँ "मालिनी गौतम की कविता - बेशरम के पौधे"

  1. बहुत खूबसूरती से नारी के मनोभावों को लिखा है

    उत्तर देंहटाएं
  2. नारी मन के भावो का शानदार चित्रण किया है।
    महिला दिवस की हार्दिक बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मजबूर करते हैं मुझे

    देवियों की परछाइयों से दूर

    सिर्फ एक स्त्री

    बनकर जीने के लिये !

    આધી દુનિયા કી હકીક્ત કા ફલસફા ......અપની પરછાયિં કો તલાશતી સ્ત્રી કી તડપ.......
    માલિની જી ! દેવી નિરંતર દેતી હૈ .....ક્યોંકિ વહ ઇતની સમર્થ હૈ.....પુરુષ તો યાચક હૈ ...સદા કા ભિખારી ......કિન્તુ યહ કલયુગ કી વિડમ્બના હૈ કિ યાચક ને દેવી કો બંદિની બના લિયા હૈ......સ્ત્રી-પુરુષ કે ઇસ બટવારે મેં હમ તો આપકે પક્ષ મેં ખડે હૈન..........મેરા વામાંગ સ્ત્રી કા જો હૈ ......

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

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