संजय जनागल की लघुकथा - अजीब सा डर

office ka dar

बड़े से सोफे पर बैठते ही तरह-तरह के वाकयात कानों में गूंजने लगे -

''बड़े ऑफिसों के बड़े लफड़े होते हैं।''

‘‘इस ऑफिस में ऐसे-वैसे घूम नहीं सकते है।''

‘‘अरे मैं तो सुबह आठ बजे से रात के 10 बजे तक बैठा रहता हूँ और कहा जाता है कि तुम अभी नये हो जितना टाइम दोगे उतना ही सीखोगे।''

सभी वाकयात सुनकर मैं एक अजीब से डर के घेरे में आ गया। डर नामक ज़हर मेरे पूरे शरीर में फैलने लगा और दिमाग सुन्‍न हो गया।

परंतु जब ऑफिस में एक दिन बिताया और बॉस सुमन कुमार जी ने कहा कि हम सब यहाँ घरवालों की तरह रहते हैं तो पूरा का पूरा डर काफूर हो गया।

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संजय जनागल

बापू नगर, जयपुर

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1 टिप्पणी "संजय जनागल की लघुकथा - अजीब सा डर"

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (10-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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