गुरुवार, 17 मार्च 2011

दामोदर लाल जांगिड़ की होली विशेष हास्य-व्यंग्य कुंडलियाँ

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कुण्डलियाँ 1

पति को जब हो पीटना, अंदर लेंहीं बुलाय।

ताकि मुई पड़ोसिनें, देवे नहीं छुड़ाय॥

देवे नहीं छुड़ाय, छोड़ दें जब थक लाएं।

इतना रखिये याद, कहीं तर ही न जाए ॥

झिझकें पहली बार, याद करना दुर्मति को।

लग जायगा शौक, पीटना रोज पति को ॥

 

कुण्डलियाँ 2

ख़त आने में बलम का,लागे इतने साल।

गौरी बूढ़ी हो गयी, श्‍वेत आगये बाल॥

श्‍वेत आ गये बाल,चले हैं लाठी ले कर।

दांत बचे दो चार,चढ़ा चश्‍मा आंखों पर॥

पोती बांच सुनाय, लिखा क्‍या परवाने में।

लागे इतने साल, बलम का ख़त आने में॥

 

कुण्डलियाँ 3

होली सिर पे आगयी,नहीं जेब में दाम।

डर वर्दी का ना रहा, हैं डण्‍डा नाकाम॥

हैं डण्‍डा नाकाम, डराते हैं अपराधी।

जेब तराश भी नहीं, देते कमाई आाधी॥

घरवाली भी आज, खसम निखठ्‌ठू बाली।

जुगत करो कुछ सा'ब, आ गयी सिर पे होली॥

 

कुण्डलियाँ 4

मोबाइल इक हाथ में, हैण्‍डल पर इक हाथ।

मोटर साइकिल चढ़े, वाक मेन लें साथ॥

वाकमेन लें साथ, रेस मन चाही खींचें।

न खुदा करे आ जाय, आप फिर ट्रक के नीचे॥

न्‍यूज और तस्‍वीर, छपेगी दाद के काबिल।

बीच सड़क के लाश,पास बजता मोबाइल॥

 

कुण्डलियाँ 5

आज इलैक्‍सन लगे रहे, राजनीति में खाज।

पांच बास बीते नहीं, आन पड़े ये गाज॥

आन पड़े ये गाज, करो फिर वही मसक्‍कत ।

मजलिस, भाषण, रैलियां, जान को लगती आफत॥

हो जाएं इक बार सदा के लिए सलेक्‍सन।

कर लें ये बिल पास, नहीं हो रोज इलैक्‍सन॥

 

कुण्डलियाँ 6

नेता मेरे देश में, कितने बड़े हैं चोर।

अफसर सब के सब हुए, पक्‍के रिश्‍वतखोर॥

पक्‍के रिश्‍वतखोर, कि धन सरकारी आये ।

वार्डपंच सरपंच, बांट आपस में खायें॥

खाकर इतना माल, पचा भी तो लेता ।

भारत माता देख, यहां पर कैसे नेता॥

 

दामोदर लाल जांगिड़

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